🙏🏻 हर हर महादेव🙏🏻
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌤️ *दिनांक – 31 अगस्त 2025*
🌤️ *दिन – रविवार*
🌤️ *विक्रम संवत – 2082 (गुजरात-महाराष्ट्र अनुसार 2081)*
🌤️ *शक संवत – 1947*
🌤️ *अयन – दक्षिणायन*
🌤️ *ऋतु – शरद ऋतु*
🌤️ *मास – भाद्रपद*
🌤️ *पक्ष – शुक्ल*
🌤️ *तिथि – अष्टमी रात्रि 12:57 तक तत्पश्चात नवमी*
🌤️ *नक्षत्र – अनुराधा शाम 05:27 तक तत्पश्चात ज्येष्ठा*
🌤️ *योग – वैधृति शाम 03:59 तक तत्पश्चात विष्कंभ*
🌤️ *राहुकाल – शाम 05:21 से शाम 06:56 तक*
🌤️ *सूर्योदय – 06:23*
🌤️ *सूर्यास्त – 06:54*
👉 *दिशाशूल – पश्चिम दिशा में*
🚩 *व्रत पर्व विवरण – श्री राधा अष्टमी, महालक्ष्मी व्रत आरम्भ, गौरी-आवाहन*
💥 *विशेष – अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है (ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्म खण्ड: 27,29,34)*
*💥 रविवार के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)*
💥 *रविवार के दिन मसूर की दाल, अदरक और लाल रंग का साग नहीं खाना चाहिए।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75.90)*
💥 *रविवार के दिन काँसे के पात्र में भोजन नहीं करना चाहिए।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75)*
💥 *स्कंद पुराण के अनुसार रविवार के दिन बिल्ववृक्ष का पूजन करना चाहिए। इससे ब्रह्महत्या आदि महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।*
🕉️~*वैदिक पंचांग* ~🕉️
🌷 *कैसा भी बिखरा हुआ जीवन हो, सँवर जायेगा* 🌷
👉🏻 *अगर अशांति मिटानी है तो दोनों नथुनों से श्वास लें और ‘ॐ शान्ति:…… शान्ति:’ जप करें और फिर फूँक मार के अशांति को, बाहर फेंक दें | जब तारे नहीं दिखते हों, चन्द्रमा नहीं दिखता हो और सूरज अभी आनेवाले हों तो वह समय मंत्रसिद्धि योग का है, मनोकामना-सिद्धि योग का है |*
👉🏻 *इस काल में किया हुआ यह प्रयोग अशांति को भगाने में बड़ी मदद देगा | अगर निरोगता प्राप्त करनी है तो आरोग्यता के भाव से श्वास भरें और आरोग्य का मंत्र ‘नासै रोग हरै सब पीरा | जपत निरंतर हनुमत बीरा ||’ जपकर ‘रोग गया’ ऐसा भाव करके फूँक मारें | ऐसा 10 बार करें | कैसा भी रोगी, कैसा भी अशांत और कैसा भी बिखरा हुआ जीवन हो, सँवर जायेगा |*
🙏🏻
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌷 *मनोकामनापूर्ति योग* 🌷
🙏🏻 *देवी भागवत में व्यास भगवान ने बताया है…. भाद्रपद मास, शुक्ल नवमी तिथि हो ….. उस दिन अगर कोई जगदंबाजी का पूजन करता है, तो उसकी मनोकामनायें पूर्ण होती है , और जिंदगी जब तक उसकी रहेगी वो सुखी और संपन्न रहेगा | इस दिन ए मंत्र का जप करें….*
🌷 *ॐ अम्बिकाय नम :*
🌷 *ॐ श्रीं नम :*
🌷 *ॐ ह्रीं नम:*
🌷 *ॐ पार्वेत्येय नम :*
🌷 *ॐ गौराये नम :*
🌷 *ॐ शंकरप्रियाय नम :*
🙏🏻 *थोड़ी देर तक बैठकर जप करना | और जिसको धन धान्य है, वो माँ से कहना मेरी गुरुचरणों में श्रध्दा बढे, भक्ति बढे (ये भी एक संपत्ति है साधक की) मेरी निष्ठा बढे मेरी उपासना बढे |*
💥 *विशेष – 01 सितम्बर 2025 सोमवार को भाद्रपद मास, शुक्ल नवमी तिथि है ।*
🙏🏻
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
मुक्ताभरण व्रत आज
भाद्रपद मास में आने वाली सप्तमी का विशेष महत्व होता है। भाद्रपद सप्तमी तिथि को मुक्ताभरण सप्तमी, संतान सप्तमी और दुबड़ी सप्तमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन महिलाएं अपनी संतान की मंगल कामना के लिए व्रत रखती हैं। साथ ही संतान प्राप्ति की जो महिलाएं कामना रखती हैं वह भी इस व्रत को करती हैं। इस दिन दुबड़ी माता की पूजा की जाती है।
कब है संतान सप्तमी का व्रत?
बता दें कि मुख्य रुप से राजस्थान में इसके दूबड़ी सप्तमी कहा जाता है। जबकि देश के अन्य भागों में इसे संतान सप्तमी और मुक्ताभरण सप्तमी के नाम से जाना जाता है। महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस व्रत को रखती हैं। दुबड़ी सप्तमी का व्रत इस बार 30 अगस्त 2025 शनिवार के दिन रखा जाएगा।
सबसे पहले अपने मंदिर की अच्छे से साफ सफाई के बाद लकड़ी की एक पटरी स्थापित करें। उसपर लाल कपड़ा बिछा दें। इसपर माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें।
फिर एक कलश में पानी भरकर उसपर नारियल रख दें। कलश में आम के पत्ते जरूर लगाएं।
पूजा के लिए आरती की थाली की तैयारी करें। थाली में हल्दी, कुमकुम, चावल, कपूर, फूल, मिठाई, आटे की लोई और उसमें कुछ दक्षिणा रख लें। साथ ही मीठी पूड़ी भी रखें।
इन सबके बाद 7 मीठी पूड़ी को केले के पत्ते में बांधकर उसे पूजा में रखें और संतान की रक्षा की कामना करते हुए भगवान शिव और माता पार्वती को कलावा अर्पित करें।
पूजा करते समय सूती का डोरा हाथ में पहन लें। यह व्रत माता और पिता दोनों ही रख सकते हैं।
इसके बाद संतान सप्तमी की कथा का पाठ करें और अंत में माता पार्वती की आरती जरुर करें।
अंत में अपना व्रत मीठी पूड़ी के साथ अपने व्रत का पारण करें।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन का व्रत करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती हैं। संतान के अच्छे स्वास्थ्य और उसकी लम्बी आयु की कामना के साथ इस व्रत एवं पूजन को करने से संतान का सदा ही शुभ होता हैं। इस व्रत को करने सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती हैं।
हिंदु धर्मग्रंथो के अनुसार एक बार भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को संतान सप्तमी के व्रत की कथा सुनाते हुये कहा कि यह व्रत योग्य संतान प्रदान करने वाला, उसकी रक्षा करने वाला और उसके दुखों का नाश करने वाला हैं। ऋषि लोमेश ने इस व्रत के विधान को माँ देवकी को बताया था।
भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को संतान सप्तमी की व्रत कथा सुनाते हुये कहा- हे धर्मराज! मैं आपको संतान सप्तमी के व्रत की कथा सुनाता हूँ, आप ध्यान से सुनिये। बहुत समय पहले अयोध्या नगरी पर राजा नहुष का राज था। वो बहुत ही प्रतापी और न्यायप्रिय राजा थे। उनकी रानी चंद्रमुखी बहुत ही सुंदर, सुशील और धर्मपरायण स्त्री थी। उनके राज्य में एक विष्णुदत्त नामका ब्राह्मण अपनी भार्या रूपवती के साथ निवास करता था। रानी चंद्रमुखी और ब्राह्मणी रूपवती में बहुत अनुराग था। वो दोनों काफी समय एक दूसरे साथ बिताती थी।
एक दिन वो दोनों सरयू नदी में स्नान करने के लिये गईं। उस दिन संतान सप्तमी थी। उन्होने देखा कि स्त्रियाँ वहाँ पर स्नान करके, वहीं माता पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा बनाकर विधि-विधान के साथ उनकी पूजा-अर्चना कर रही थी। तब उन दोनों ने उन स्त्रियों से उस पूजा-अर्चना के विषय में पूछा, तो उन स्त्रियों ने कहा- हे रानी जी! हम सुख-सौभाग्य और संतान देने वाला संतान सप्तमी व्रत (मुक्ताभरण व्रत) कर रही हैं। इसमें हम भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करके भगवान शिव को धागा बाँधकर जीवन भर यह व्रत करने का संकल्प कर रही हैं। इस प्रकार उन स्त्रियों ने उनको उस व्रत की विधि के विषय में बताया। उन स्त्रियों से उस संतान देने वाले व्रत के विषय में जानकर उन दोनों ने भी भगवान शिव को धागा बाँधकर जीवनभर उस व्रत को करने का संकल्प कर लिया। परंतु दुर्भाग्यवश वो दोनों ही संकल्पित व्रत करना भूल गई। परिणामस्वरूप मरने के बाद उन्हे कुयोनियों में जन्म लेना पड़ा। उन विभिन्न योनियों में दुख भोगकर एक बार फिर उन्हे मनुष्य योनि प्राप्त हुयी।
इस जन्म में रानी चंद्रमुखी ने राजकुमारी ईश्वरी के रूप में जन्म लिया और उनका विवाह मथुरा के राजा पृथ्वीनाथ के साथ हुआ और ब्राह्मणी रूपवती ने भूषणा के रूप में एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लिया और उसका विवाह मथुरा के राजपुरोहित अग्निमुखी के साथ हुआ। पूर्वजन्म की ही भांति इस जन्म में भी उन दोनों में बहुत प्रेम था। पूर्व जन्म में संकल्पित व्रत ना करने के कारण इस जन्म में रानी को संतान सुख प्राप्त नही हो सका। उसने एक मूक-बधिर बालक को जन्म दिया और वो भी अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। इस कारण वो बहुत दुखी रहने लगी। उधर सौभाग्यवश ब्राह्मणी भूषणा को उस व्रत का स्मरण रहा और उसने इस जन्म में उस व्रत का पालन किया। जिसके फलस्वरूप उसको आठ पुत्रों की प्राप्ति हुई। उसके पुत्र स्वस्थ होने के साथ-साथ बहुत ही रूपवान और गुणवान थे।
जब भूषणा को अपनी सखी रानी ईश्वरी के मूक-बधिर पुत्र की मृत्यु का पता चला तो वो रानी को सहानुभूति देने के लिये उससे मिलने गई। पुत्र की मृत्यु के शोक के कारण रानी के हृदय में अपनी सहेली भूषणा के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हो गई। रानी ईश्वरी ने भूषणा के पुत्रों को मारने की इच्छा से उन्हे भोजन के लिये बुलाया और उन्हे भोजन में विष देकर मारने का प्रयास किया। किन्तु उस व्रत के प्रभाव से भूषणा के पुत्रों पर उस विष का कोई प्रभाव नही हुआ।
यह देखकर रानी ईश्वरी क्रोध और ईर्ष्या के मारें जल उठी और उसने सेवकों को आदेश दिया कि वो भूषणा के पुत्रों को यमुना के गहरे पानी में फेंक दे। परंतु इस बार भी उस व्रत के प्रभाव से उन बालकों का बाल भी बांका नही हुआ और वो सुरक्षित रहें। इतना सबकुछ होने के बाद भी रानी ईश्वरी को सब्र नही हुआ और उसने भूषणा के पुत्रों को मारने के लिये जल्लादों को आदेश दे दिया। सेवक उन्हे जल्लादों के पास ले गये। किंतु यहाँ भी भगवान शिव और माता पार्वती ने भूषणा के पुत्रों की रक्षा करी और उन्ही की कृपा से वो इस बार भी पूर्ण रूप से सुरक्षित रहें।
जब यह बात रानी को पता चली की तो उसे आभास हुआ की हो न हो यह कोई ईश्वरीय चमत्कार हैं और उसने भूषणा से अपनी भूल के लिये क्षमा माँगी। रानी ने भूषणा को बताया कि उसने किस-किस प्रकार से उसके पुत्रों को मारने का प्रयास किया, परंतु उसके पुत्र हर बार सुरक्षित रहें। रानी ने भूषणा से उसका कारण जानने चाहा। तब भूषणा ने रानी को पूर्वजन्म के उस व्रत का स्मरण कराया और उसे बताया की वो दोनों पूर्वजन्म में सहेलियाँ थी और उन्होने मुक्ताभरण व्रत का संकल्प लिया था परंतु वो उसे करना भूल गई थी। किंतु इस जन्म में मैंने उस संकल्प को पूर्ण किया और मुक्ताभरण व्रत का पालन किया। यह सब भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद है और उस व्रत का प्रभाव है जिसके कारण मेरे पुत्र हर विपत्ति से सुरक्षित रहें।
भूषणा से यह सबकुछ जानकर रानी ईश्वरी को भी उस व्रत का स्मरण हो आया और रानी ने विधि-विधान के साथ मुक्ताभरण व्रत करना प्रारम्भ कर दिया। उस व्रत के प्रभाव से रानी को भी एक स्वस्थ और सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ। तभी से स्त्रियाँ संतान प्राप्ति और उनकी रक्षा के लिये यह संतान सप्तमी व्रत करती हैं।
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🌷🌷महालक्ष्मी ( हाथीपूजा) व्रत की पूजन विधि🌷🌷
(16 दिवसीय महालक्ष्मी हाथी पूजा व्रत विधि विधान)
🍁भाद्रपद शुक्ल राधा अष्टमी 31 अगस्त 2025 रविवार से
🍁आश्विन कृष्ण अष्टमी 14 सितंबर 2025 रविवार तक
नोट- इस बार पंचाग के अनुसार एक तिथि कम होने से
15 दिन ही पूजा व्रत रहेगा।
🍏🍁माँ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिये करें महालक्ष्मी व्रत
व्रत एवं पूजन की विधि, महत्व, उद्यापन की विधि और महालक्ष्मी व्रत कथा🍁🍏
👉 नोट –(महालक्ष्मी हाथी पूजा व्रत की विभिन्न क्षेत्रों में अलग अलग कथा और पूजन विधि विधान प्रचलित है।जो आपके क्षेत्र में कथा एवं पूजन विधि मान्य हो उसी अनुसार पूजा करें और चाहे तो इस लेख में बताएं पूजा विधि अनुसार भी कर सकते हो।)
🍁इस बर्ष 2025 के महालक्ष्मी व्रत का शुभ मुहूर्त🍁
महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत 31 अगस्त रविवार 2025 से हो रही है इसका समापन 14 सितंबर रविवार 2025 को होगा. भादो के शुक्ल पक्ष की राधा अष्टमी तिथि से महालक्ष्मी व्रत शुरू होते हैं और इनकी समाप्ति 16 दिन बाद अश्विन मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को होती है.
🍁 महालक्ष्मी व्रत शुभ मुहूर्त 🍁
अष्टमी तिथि प्रारम्भ –👇
– 30 अगस्त रात्रि 10:46 PM –से Sep 01 12:58 AM
अष्टमी तिथि समाप्त–👇
– 01 सितम्बर 12:58 AM – Sep 02 02:43 AM
👉🍁उदयकालीन तिथि के अनुसार 31 अगस्त रविवार से व्रत प्रारम्भ होगा।🍁
🍁शुभ काल
अभिजीत मुहूर्त – 12:02 PM – 12:52 PM
अमृत काल – 05:48 AM – 07:35 AM
ब्रह्म मुहूर्त – 04:36 AM – 05:24 AM
🍁आनन्दादि योग
मृत्यु Upto – 05:27 PM
काण
🍁अशुभ काल (त्याज्य काल)
31 अगस्त 2025 रविवार
राहू – 5:08 PM – 6:41 PM
यम गण्ड – 12:27 PM – 2:00 PM
कुलिक – 3:34 PM – 5:08 PM
दुर्मुहूर्त – 05:01 PM – 05:51 PM
वर्ज्यम् – 11:37 PM – 01:23 AM
👉🍁आश्विन कृष्ण अष्टमी 14 सितंबर 2025 रविवार को अंतिम व्रत एवं पूजन है ।
🍁भाद्रपद मास (भादों) के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि यानी राधा अष्टमी से सोलह दिनों का महालक्ष्मी व्रत आरम्भ होता हैं। अश्विन मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि के दिन यह महालक्ष्मी व्रत समाप्त होता हैं। वैसे यह व्रत सोलह दिनों तक किया जाता है।पर व्रत के दिनों की संख्या पंचांग तिथि अनुसार एक दिन घट या बढ़ भी सकती है। किसी बर्ष 14,या15 दिन हो सकते या 17 दिन भी ।
इस साल 2025 में 15 दिन में व्रत पूरा माना जायेगा ।
आश्विन कृष्ण अष्टमी 14 सितंबर 2025 रविवार को अंतिम व्रत पूजन दिवस है ।
🌹🌹महालक्ष्मी हाथी पूजा व्रत का महत्व 🌹🌹
🍁इस दिन माता महालक्ष्मी का पूजन किया जाता हैं और संध्या के समय चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्ध्य देते हैं। महिलायें यह महालक्ष्मी व्रत, माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिये करती है, ऐसी मान्यता है कि इन सोलह दिनों तक महालक्ष्मी व्रत का पालन करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है, धन-धान्य की कोई कमी नही होती, जीवन की सभी परेशानियों का नाश हो जाता है और जीवन सुखमय हो जाता हैं। इस व्रत का पालन करने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
🍁इस पूजा में हाथी पर विराजमान माता लक्ष्मी के स्वरूप की पूजा का बिशेष महत्व है । बहुत से स्थानों पर कच्ची मिट्टी
से निर्मित हाथी पर बैठी हुई माता गजलक्ष्मी की मूर्ति की
पूजा की जाती है ।( सोलह दिन बाद इस मिट्टी की मूर्ति का
विसर्जन घर के गमले रखे या जलाशय में विसर्जित करते हैं।)।इस व्रत को बहुत से लोग हाथी पूजा व्रत भी कहते हैं। मूर्ति के अभाव में चित्र का पूजन भी किया जा सकता है।
🍁महालक्ष्मी व्रत सोलह दिनों करें जाने की परम्परा हैं।
पर बहुत सारे लोग अंतिम एक दिन यानि केवल अश्विन कृष्ण अष्टमी को व्रत कर पूजा करते हैं ।
यह व्रत स्त्री और पुरूष दोनों कर सकते हैं। इस व्रत का पालन करने वाले को सोलह दिनों तक व्रत रखना होता हैं और व्रत के इन सोलह दिनों में संध्या के समय चंद्रमा को अर्ध्य देना होता हैं। अगर कोई सोलह दिनों तक व्रत न कर सकता हो, तो वो अपनी क्षमता के अनसार सोलह दिनों से कम दिन का व्रत रख सकता हैं।
पर अंतिम एक दिन का व्रत अनिवार्य है।सोलह दिनों तक व्रत रखने के बाद इस व्रत का उद्यापन किया जाता हैं। इस व्रत में भोजन में अन्न ग्रहण नही करतें।
बहुत से लोग पूजा के बाद संध्या को एक समय कोई
मीठा पकवान या फलाहार अथवा सात्विक भोजन करते हैं।
1. महालक्ष्मी व्रत का पालन करने से साधक को जीवन के सभी सुख प्राप्त होते हैं।
2. कभी धन-धान्य की कमी नही होती।
3. जीवन की समस्त परेशानियों का नाश हो जाता हैं।
4. माँ लक्ष्मी की कृपा से इस व्रत का पालन करने वाली स्त्री को संतान का सुख और पारिवार का सुख प्राप्त होता हैं। धन-समृद्धि प्राप्त होती हैं।
5. माँ लक्ष्मी की कृपा से इस व्रत का पालन करने वाले पुरुष को रोजगार और व्यवसाय में उन्नति प्राप्त होती हैं।
🍁🍁महालक्ष्मी व्रत की पूजा विधि इस प्रकार हैं-🍁🍁
पूजन की सामग्री
श्री गजलक्ष्मी का चित्र, हल्दी, कुमकुम, अक्षत, आसऩ (बैठने के लिये), रुपया, धूप, दीपक, लाल फूल, लाल रंग का वस्त्र, ताँबे का कलश, कलश को ढ़कने के लिये कटोरी, घी, नैवेद्य, फल, फूल, चन्दन, फूल माला, दूर्वा, धागा (कच्चा सूत), सुपारी और नारियल।
महालक्ष्मी पूजा के लिए पुष्प से निर्मित छत्र (फुलेरा) चढ़ाने का भी बिशेष महत्व है।
अनार के दानों का भी भोग लगाएं ।
दूर्वादल अवश्य चढ़ाएं। इसके अतिरिक्त महालक्ष्मी को
बेलपत्र भी बहुत प्रिय है संभव हो तो नित्य या अंतिम
दिन 16 बेलपत्र भी चढ़ावें या 16 बेलपत्र और 16 कमलगट्टे को घी और शहद में मिलाकर हवन में लक्ष्मी मंत्र पढ़कर आहुति दें। सूखे हुए कमलपुष्प गुलाब, तथा बिल्बफल के गूदे से भी लक्ष्मी हवन किया जाता है।
अंतिम दिन मखाने की खीर का भोग लगाएं।
1. महालक्ष्मी व्रत के आरम्भ के दिन प्रात: काल स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होने के बाद साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
2. चावल के घोल से घर के आंगन में अल्पना बनाएं। और उस अल्पना में मां लक्ष्मी के चरण जरूर बनायें।
3. फिर पूजा स्थान पर आसन बिछा कर बैठ जाये और उसके बाद इस मंत्र का उच्चारण करके व्रत का संकल्प करें।
करिष्यहं महालक्ष्मि व्रतमें त्वत्परायणा।
तदविघ्नेन में यातु समाप्तिं स्वत्प्रसादत:।।
4. फिर सोलह तार का धागा लेकर उसमें सोलह गांठ लगाये और उसे हल्दी से रंग कर अपने हाथ पर बांध ले। स्त्रियाँ अपने बायें हाथ पर और पुरूष अपने दायें हाथ पर धागा बांधे।
5. फिर धान की बालियाँ, आम और आंवले के पत्ते लेकर उनसे माँ लक्ष्मी का आसन सजायें।
6. तत्पश्चात कलश में जल भरकर रखें। और साथ ही भगवान गणेश और माँ गजलक्ष्मी की तस्वीर लगायें।
7. धूप-दीप जलाकर भगवान गणेश की पूजा करें, फिर उसके बाद कलश की पूजा करें।
8. तत्पश्चात् मां गजलक्ष्मी की पूजा करें।
जल के छींटे लगायें, रोली-मोली-चावल लगायें, लाल वस्त्र चढ़ायें, लाल फूल, बेलपत्र, चढ़ायें, फूल माला अर्पित करें, नैवेध चढ़ायें, दूर्वा, नारियल, सुपारी चढ़ायें, सामर्थ्य अनुसार सोना या चाँदी या रूपये चढ़ायें। विधि-विधान के साथ माँ का पूजन करें। भगवान नारायण का भी यथोचित स्मरण पूजन
करें।
इन सोलह दिन तक महालक्ष्मी को उनके वाहन हाथी को
दूर्वा अवश्य चढ़ाएं।
9. पूजन करने के बाद महालक्ष्मी व्रत की कथा पढ़ें या सुनें।
संभव हो तो कथा के साथ १६ दिन भगवती लक्ष्मी के
श्री सूक्त कनकधारा स्तोत्र लक्ष्मी चालीसा, लक्ष्मी सहस्रनाम
या १०८ नाम का पाठ करें।
10. सामर्थ्य अनुसार 11, 21, 51 या 108 बार लक्ष्मी मंत्र का जाप करें।
11. फिर धूप-दीप से माँ लक्ष्मी की आरती करें।
12 सोलहवे दिन पूजन करने के बाद उद्यापन अवश्य करें।
13. माता लक्ष्मी की पूजा में भगवान नारायण का भी स्मरण अवश्य करें। साथ में गणेश सरस्वती,कुबेर का भी नाम
स्मरण करें।
पूजा के प्रारंभ में गणेश, पंचदेव,नवग्रह कुलदेव
पितृदेव हनुमान, स्वर्णाकर्षणभैरव आदि का भी स्मरण करें ।
🍏महालक्ष्मी व्रत के उद्यापन की विधि👉
(आश्विन कृष्ण अष्टमी के अंतिम दिन की पूजा विधि)
1. महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद शुक्लपक्ष की अष्टमी से लेकर आश्विन मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तक चलता है।
(बहुत सारे लोग केवल इस अंतिम दिन ही व्रत और पूजन करते हैं)
।सोलह दिन का व्रत पूर्ण होने के पश्चात अंतिम दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी को वस्त्र से एक मंडप बनायें।
इस दिन हाथी पर सवार गजलक्ष्मी स्वरूप के पूजन का
बिशेष महत्व है।
गजलक्ष्मी व्रत का पूजन शाम के समय किया जाता है. शाम के समय स्नान कर पूजास्थान पर लाल कपड़ा बिछाएं. केसर मिले चन्दन से अष्टदल बनाकर उस पर चावल रखें. फिर जल से भरा कलश रखें. अब कलश के पास हल्दी से कमल बनाएं. इस पर माता लक्ष्मी की कच्ची मिट्टी की मूर्ति रखें. मिट्टी का हाथी बाजार से लाकर या घर में बनाकर उसे स्वर्णाभूषणों से सजाएं. अगर यह संभव न हो तो हो तो इस दिन अपनी श्रद्धानुसार आटे या बेसन से बने (तेल में तलकर) प्रसादस्वरूप स्वर्णाभूषण बनाकर भी चढ़ा सकते हैं गेहूं के आटे से बने 16 दीपक बिशेष रूप से जलाएं।
सोने या चांदी का हाथी भी ला सकते या कच्ची मिट्टी का प्रयोग कर सकते हैं। इस दिन चांदी के हाथी का ज्यादा महत्व माना गया है। इसलिए अगर संभव हो तो पूजा स्थान पर चांदी के छोटे से हाथी का प्रयोग करें। इस दौरान माता लक्ष्मी की मूर्ति के सामने श्रीयंत्र भी रखें. कमल के फूल से मां का पूजन करें. दूर्वा, बेलपत्र गुलाब गेंदा गुड़हल मोगरा चमेली आदि
सुगंधित पुष्प भी चढ़ा सकते हैं।
👉वैसे भगवती महालक्ष्मी के अनंत रूप है। एक मनुष्य अपने जीवन में जो भी भौतिक और आध्यात्मिक रूप से जिस भी वस्तु या तत्व की कामना करता है उसके पीछे लक्ष्मी का कोई न कोई स्वरूप होता है
इस सृष्टि में जो भी शुभ,सुंदर,पवित्र उपयोगी
कल्याणकारी तत्व है वह महालक्ष्मी का ही एक रूप है।
👉🍁कुछ विशिष्ट 16 रूपों के नाम के दो समूह नीचे दिए गए हैं। जिनमे से किसी भी एक समूह के 16 नामो के द्बारा इन 16 दिनों में पूजा कर सकते हैं।
🌹लक्ष्मी के 16 रूप ये हैं- 👇
१.ॐ आदिलक्ष्म्यै नमः। २.ॐ धनलक्ष्म्यै नमः।
३.ॐ , धान्यलक्ष्म्यै नमः। ४.ॐ, गजलक्ष्म्यै नमः।
५.ॐ विद्यालक्ष्म्यै नमः। ६..ॐ गृहलक्ष्म्यै नमः।
७..ॐ भोगवरदा लक्ष्म्यै नमः। ८.ॐ सन्तानलक्ष्म्यै नमः।
९.ॐ विजयलक्ष्म्यै नमः। १०.ॐ सौभाग्यदालक्ष्म्यै नमः।११.ॐ साम्राज्यदालक्ष्म्यै नमः। १२.ॐ , त्रिशक्तिलक्ष्म्यै नमः।१३.ॐ,प्रसन्नवरदालक्ष्म्यै नमः।
१४.ॐ सिद्धियोगलक्ष्म्यै .नमः।
१५.ॐ ॐ अमृतसंजीवनीलक्ष्म्यै नमः।
१६.ॐ मोक्षलक्ष्म्यै नमः।
🍁इसके अतिरिक्त महालक्ष्मी कुछ अन्य कल्याणकारी 16 विशिष्ट नाम भी है ।👇
🍁१.ॐ श्रीदेव्यै नमः।२ ॐ पदमायै नमः।
३.ॐ कमलायै नमः। ४.ॐ रमादेव्यै नमः।
५ .ॐ लक्ष्म्यै नमः। ६.ॐ अम्बुजायै नमः।
७.ॐ इन्दिरायै नमः। ८.ॐ हरिप्रियायै नमः।
९. ॐ हेमामालिन्यै नमः। १०.ॐ कनकप्रभायै नमः।
११. ॐ दारिद्यविनाशिन्यै नमः। १२.ॐ ऋणमुक्तायै नमः।१३.ॐ,धनदात्र्यै नमः।१4..ॐ भाग्येश्वर्यै नमः।
१५..ॐ त्रिभुवनराजराजेश्वर्यै नमः।
१६. ॐ महासुदर्शनायै नमः।
1.आखिर में आटे के 16 दीपक जलाकर पूजा कर कथा सुनें, माता लक्ष्मी की आरती करें और उन्हें भोग लगाएं।
2.माँ लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजन करें। अगर आप स्वयं पूजन नही कर सकते हो तो किसी योग्य पण्ड़ित के द्वारा भी पूजा करा सकते हैं।
3. नया सूप लेकर उसमें सोलह की संख्या में चन्दन, तालपत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल आदि सामग्री रखें और उसे दूसरे नये सूप से ढककर इस मंत्र का उच्चारण करके इसे माँ लक्ष्मी को अर्पित करें।
क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीचन्द्र सहोदरा।
व्रतेनानेन सन्तुष्टा भव भर्तोवपुबल्लभा॥
(इस श्लोक का अर्थ है, क्षीर सागर में उत्पन्न हुई लक्ष्मी, चन्द्रमा की बहन, श्री विष्णु वल्लभा इस व्रत से सन्तुष्ट हों।)
4. अंतिम दिन कम से कम एक ब्राह्मण और एक सुहागिन स्त्री को भोजन कराएं।
5. रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर स्वयं भोजन करें।
👉महालक्ष्मी मंत्र —
१.ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: श्रीं जगतप्रसूत्यै महालक्ष्म्यै नमः।
२.ॐ ह्रीं कमलायै सर्व सुखदायिनी कष्टनाशिनी कमलायै श्रीं
नमः।
👉❤️ महालक्ष्मी कथा का छंद ❤️ 👇
(यह नित्य पूजा कथा में आवश्यक रूप से बोला जाता है )👇
👉🍁ऊंचों सो पोरपाटन गांव, जहां थे राजा मंगलसेन
आमोती दामोती दो रानी, वामन बरूआ कहे कहानी
सुनो महालक्ष्मी महारानी, हमसे कहते तुम सब सुनते।
सोलह बोल की एक कहानी।🍁🙏
(कथा पढ़ने के बाद सोलह दिन इस छंद को सोलह बार पढ़कर महालक्ष्मी को अर्पित करते हुए 16 अखंड चावल के दाने एक जल कलश में डालते जाएं।)
🍏👉महालक्ष्मी व्रत कथा में तीन अलग अलग कथाएं प्रचलित हैं।जो नीचे दी जा रही है।👇
🌷🌷🌷महालक्ष्मी व्रत, कथा १ 🌷🌷🌷🌷🌷🌷
श्री गणेशाय नम:।
एक समय महाराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण भगवान से बोले- ‘हे पुरुषोत्तम! नष्ट हुए अपने स्थान की पुन: प्राप्ति कराने वाले और पुत्र, आयु, ऐश्वर्य तथा मनोवांछित फल देने वाले किसी एक व्रत को मुझसे कहिए।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा- सतयुग के प्रारंभ में जिस समय दैत्यराज वृत्रासुर ने देवताओं के स्वर्गलोक में प्रवेश किया था, उस समय इन्द्र ने यही प्रश्न नारद से किया था।
नारदजी ने कहा- ‘हे इन्द्र! पूर्व समय में अत्यंत रमणीक पुरन्दपुर नामक नगर था। वह नगर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का उत्पत्ति स्थल होने के कारण संसार का भूषण रूप था। उस नगर में मंगल नाम का राजा राज्य करता था। उसकी दो रानियां थीं। एक का नाम चिल्लदेवी तथा दूसरी का नाम चोलदेवी था।
एक समय राजा मंगल रानी चोलदेवी के साथ महल के शिखर पर बैठा था। वहां से उसकी दृष्टि समुद्र के जल से घिरे हुए एक स्थान पर पड़ी। उसे देखकर अति प्रसन्न चित राजा ने हंसकर चोलदेवी से कहा- हे चंचलाक्षि! मैं तुम्हारे लिए नंदन वन को भी लजाने वाला एक बगीचा बनवा दूंगा।
राजा के वाक्य को सुनकर रानी ने कहा- ‘हे कान्त! ऐसा ही करिए। तदनुसार राजा ने उस स्थान पर एक बगीचा बनवा दिया। थोड़े ही समय में वह बगीचा अनेक वृक्षों, लता, फूलों तथा पक्षियों से संपन्न हो गया।
एक समय उस उद्यान में एक विकराल शरीर वाला मेघतुल्य शूकर आ गया। उसने वहां आकर अनेक वृक्षों को तोड़ डाला तथा उस उद्यान को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। कालतुल्य उस शूकर ने कई रखवालों को भी मार डाला। तब उद्यान के रक्षक भयभीत होकर राजा के पास गए और सब हाल कह सुनाया।
यह बात सुनकर राजा ने अपनी सेना को आज्ञा दी कि शीघ्र जाकर उस शूकर को मार डालो। तदंतर राजा भी एक मतवाले हाथी पर सवार होकर उद्यान की ओर चल पड़ा। सेना ने शूकर को चारों ओर से घेर लिया तब राजा ने उच्च घोष करके कहा- जिसके रास्ते से यह शूकराधम निकल जाएगा, उस सिपाही का सिर शत्रु की भांति काट डालूंगा। लेकिन वह शूकर उसी मार्ग से निकल गया, जिस मार्ग में राजा खड़ा तथा।
उस घोर वन में राजा एकाग्रचित होकर उस शूकर को ढूंढ रहा था। एकाएक शूकर से सामना हो गया। तब राजा ने बाण ने उसे घायल कर दिया। बाण के लगते ही शूकर अपने अधम शरीर को छोड़कर दिव्य गंधर्व स्वरूप को धारण कर विमान पर जा बैठा।
गंधर्व बोला- हे महिपाल! आपका कल्याण हो। आपने मुझे शूकर योनि से छुड़ाया, सो बड़ी कृपा हो। अब मेरा हाल सुनिए। एक समय ब्रह्माजी देवताओं से घिरे बैठे थे और मैं उनको तरह-तरह के गुणों से युक्त गीत सुना रहा था। गाते-गाते में ताल-स्वर से भटक गया। इसी कारण ब्रह्माजी ने मुझ चित्ररथ गंधर्व को शाप दे दिया कि तू पृथ्वी पर जाकर शूकर होगा।
जिस समय राजाओं का राजा मंगल तुझे अपने हाथों से मारेगा, उस समय तू शूकर योनि से छूटकर फिर इस गंधर्व योनि को प्राप्त होगा। अतएव हे महिपति! मैं इस योनि में आया था। आज आपके हाथ से मरकर मैं शूकर योनि से छुटकारा पा गया।
अब मैं प्रसन्न होकर देवताओं को भी दुर्लभ एक वर देता हूं, उसे स्वीकार्य करिए। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को देने वाला यह एक महालक्ष्मी व्रत है। इसे करके आप सार्वभौम राजा हो जाएंगे। अब आप प्रसन्नचित होकर अपनी राजधानी को जाइए।
नारदजी कहते हैं- चित्ररथ गंधर्व तत्क्षण अंतर्ध्यान हो गया। राजा मंगल ज्योंही चलने को हुआ, त्योंही एक बटुक बगल में शंबल (मार्ग-भोजन) लिए दिखाई दिया।
राजा ने बटुक से पूछा- तुम कौन हो? यहां किसलिए आए हो?
बटुक बोला- मैं आपके राज्य का एक ब्राह्मण बालक हूं तथा आपके साथ-साथ ही यहां आया हूं। मेरे योग्य कोई कार्य हो तो बताइए।
राजा ने कहा- आज से मैं तम्हें ‘नूतन’ कहूंगा। अगर यहां कोई जलाशय हो तो मेरे लिए थोड़ा जल ले आओ। बटुक राजा को एक बरगद के वृक्ष के नीचे बैठाकर स्वयं घोड़े पर सवार हो जल लेने आगे चल दिया। थोड़ी ही दूर जाने पर उसे एक अति रमणीक तालाब दिखाई दिया। मानो स्वयं भगवान विष्णु एवं लक्ष्मीजी का निवास स्थान हो। वह तालाब स्वच्छ जल से भरा हुआ तथा कमल पुष्पों से सुशोभित हो रहा था। तालाब के किनारे अनेक स्त्रियां कथा कह रही थीं।
बटुक ने स्त्रियों को अपना परिचय दिया तथा उनसे व्रत कथा के बारे में पूछा।
स्त्रियों ने कहा- हमने महालक्ष्मीजी का व्रत किया है, सो उनकी कथा कह रहे हैं। स्त्रियों ने बटुक को व्रत की विधि तथा फल बताया। स्त्रियों ने कहा कि तुम इस उत्तम व्रत को करो तथा अपने राजा से भी कराओ। यदि कोई उत्तम व्यक्ति मिल जाए तो उससे भी व्रत कराओ, किंतु नास्तिकों के सामने यह व्रत कभी न कहना। वह बटुक स्वयं पानी पी एवं घोड़े को पानी पिला राजा के लिए जल लेकर घोड़े पर सवार होकर चल दिया।
राजा को जल देकर उक्त व्रत का महात्म्य बताया और अनेक प्रकार की सामग्री एकत्र करके राजा से व्रत कराया। तदंतर वह राजेन्द्र घोड़े पर सवार होकर ब्राह्मण बटुक के साथ अपनी पुरी के निकट पहुंचा। अपने राजा को आते देखकर पुरवासियों ने तुरही आदि बाजाओं को बजाते, फूलमालाओं से उनका स्वागत किया। स्त्रियों के द्वारा फेंके हुए धान के लावों से पूजित हो उस ब्राह्मण बटुक के साथ राजा मंगल अपनी पटरानी चोलदेवी के महल में गया। जाते ही रानी ने राजा के हाथ में एक डोरा बंधा देखा।
इस पर रानी ने अत्यंत क्रोधित होकर कहा कि मालूम होता है राजा शिकार के बहाने किसी दूसरी स्त्री के पास गया था। उसी के सौभाग्य के लिए राजा ने हाथ में यह डोरा बांध रखा है। उसी का भेजा यह ब्राह्मण बालक भी मुझे देखने यहां आया है।
ऐसा विचार करके चोलदेवी ने राजा के हाथ में बंधा डोरा तोड़कर पृथ्वी पर डाल दिया। संयोगवश उसी समय चिल्लदेवी की एक दासी कुछ देखने आई थी, उसने वह डोरा उठाकर उस ब्राह्मण बटुक से उसका कारण पूछा- बटुक ने दासी को सारी बात बताई और व्रत के बारे में भी बताया। तब दासी ने चिल्लदेवी के पास जाकर वह व्रत बताया और ब्राह्मण को बुलाकर विधिवत महालक्ष्मीजी का उत्तम व्रत व पूजन किया।
एक वर्ष बाद महालक्ष्मी के दिन चिल्लदेवी के महल में बाजाओं का शब्द हुआ। यह शब्द राजा मंगल ने भी सुना। तब राजा को महालक्ष्मी के व्रत का ध्यान आया और वह बटुक से कहने लगा- अरे! आज महालक्ष्मी की पूजा का दिन है। मेरा वह डोरा कहा है? यह पूछने पर बटुक ने चोलदेवी के द्वारा डोरा तोड़े जाने की बात बताई। यह सुनकर राजा चोलदेवी पर कुपित हुआ और कहने लगा- आज मैं चिल्लदेवी के साथ ही पूजन करूंगा। तब राजा बटुक के साथ चिल्लदेवी के महल गया, तब ही लक्ष्मीजी एक वृद्धा का रूप धारण कर चोलदेवी के महल में उसकी परीक्षा लेने गई।
चोलदेवी ने वृद्धा को भला-बुरा कहकर वहां से चले जाने को कहा। तब वृद्धारूपी महालक्ष्मी ने चोलदेवी को श्राप दिया- तू शूकरमुखी हो जा और यह मंगलपुर कोलापुर हो जाए। तभी से यह नगर कोलापुर कहलाने लगा।
लक्ष्मीजी वहां से चलकर चिल्लदेवी के महल में आईं, तो वहां अनेक प्रकार से उनकी सम्मानपूर्वक पूजा हुई। पूजन के बाद चिल्लदेवी ने साक्षात् लक्ष्मीजी का पूजन किया। तब लक्ष्मीजी बोलीं- मैं तुमसे पूर्णत: संतुष्ट हूं। तुम जो चाहो सो वर मांगो। चिल्लदेवी ने कहा- हे सुरेश्वरी! जो आपका उत्तम व्रत करे, उसका घर आप कभी न त्यागें तथा कथा पढ़े या सुने उनको भी आप मनोवांछित फल दें।
महालक्ष्मीजी ‘तथास्थु’ कहकर अंतर्ध्यान हो गईं। राजा ने भी चिल्लदेवी के साथ पूजन की। उसी समय ईर्ष्यावश चोलदेवी भी चिल्लदेवी के यहां चली आई जबकि द्वारपालों ने बहुत मना किया, फिर भी एक न मानी। चोलदेवी ने वहां का हाल देखकर न जाने क्या सोचा और अंगिरा ऋषि के यहां आश्रम में चली गईं। महर्षि ने चोलदेवी का कुरूप चेहरा देखकर उससे महालक्ष्मी का व्रत पूजन कराया। महालक्ष्मी की पूजन व व्रत के प्रभाव से वह लावण्ययुक्त सुंदर स्त्री हो गईं।
किसी समय राजा ने शिकार खेलते हुए अंगिरा मुनि के आश्रम में सुंदर रूपयुक्त तथा चंचल नयनों वाली स्त्री को देखा। उसे देखकर राजा ने पूछा- यह दिव्य रूपधारिणी स्त्री कौन है?
मुनि ने चोलदेवी का सारा हाल बताकर उसे राजा को सौंप दिया। तब राजा नगर में आकर चोलदेवी और चिल्लदेवी के साथ अनेक प्रकार के सुख भोगने लगा। चिरकाल तक राजा सप्त द्वीपों से युक्त पृथ्वी पर राज्य करने लगा। महालक्ष्मी के व्रत के प्रभाव से बटुक राजा का मंत्री बना। वह राजा पृथ्वी के समस्त सुखों को भोगता हुआ अंत में जाकर आकाश में विष्णु देवत (श्रवण) नक्षत्र बनकर स्थित हुआ।
नारदजी बोले- हे इन्द्र! सब व्रतों में उत्तम व्रत मैंने तुमसे कहा है जिसकी कथा मात्र सुनने से मनोवांछित फल प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार तीर्थों में प्रयाग, देवताओं में भगवान और नदियों में गंगा पुनीत मानी जाती है, उसी प्रकार यह व्रत सभी व्रतों में उत्तम है।
हे इन्द्र! धर्म, काम और मोक्ष की इच्छा से तुम भी इस व्रत को करो। इसके करने से महालक्ष्मी धन, धान्य, कीर्ति, आयु, यश, पुत्र-पोत्रादिक सब कुछ देती हैं। श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर से बोले- हे युधिष्ठिर! नारदजी द्वारा कहा गया यह व्रत देवराज इन्द्र ने किया, आप भी इस व्रत को करें तो अवश्य ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी। यह कथा श्रीकृष्ण भगवान ने महाराज युधिष्ठिर से कही थी। अत: मनोकामना सिद्धि के लिए सभी लोगों को यह व्रत करना चाहिए।
‘इति भविष्योत्तर पुराणांतर्गत महालक्ष्मी व्रत कथा संपूर्णनम्।।’
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🌷🌷महालक्ष्मी हाथी पूजा व्रत कथा २🌷🌷
गजलक्ष्मी व्रत कथा : जब कुंती के महल में पूजा गया ऐरावत हाथी
एक समय महर्षि श्री वेदव्यासजी हस्तिनापुर पधारे। उनका आगमन सुन महाराज धृतराष्ट्र उनको आदर सहित राजमहल में ले गए। स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान कर उनका पूजन किया।
श्री व्यासजी से माता कुंती तथा गांधारी ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया- हे महामुने! आप त्रिकालदर्शी हैं अत: आपसे हमारी प्रार्थना है कि आप हमको कोई ऐसा सरल व्रत तथा पूजन बताएं जिससे हमारा राज्यलक्ष्मी, सुख-संपत्ति, पुत्र-पोत्रादि व परिवार सुखी रहें।
इतना सुन श्री वेद व्यासजी कहने लगे- ‘हम एक ऐसे व्रत का पूजन व वर्णन कहते हैं जिससे सदा लक्ष्मीजी का निवास होकर सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। यह श्री महालक्ष्मीजी का व्रत है, इसे गजलक्ष्मी व्रत भी कहा जाता है। जिसे प्रतिवर्ष आश्विन कृष्ण अष्टमी को विधिवत किया जाता है।’
हे महामुने! इस व्रत की विधि हमें विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें। तब व्यासजी बोले- ‘हे देवी! यह व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ किया जाता है। इस दिन स्नान करके 16 सूत के धागों का डोरा बनाएं, उसमें 16 गांठ लगाएं, हल्दी से पीला करें। प्रतिदिन 16 दूब व 16 गेहूं डोरे को चढ़ाएं। आश्विन (क्वांर) कृष्ण अष्टमी के दिन उपवास रखकर मिट्टी के हाथी पर श्री महालक्ष्मीजी की प्रतिमा स्थापित कर विधिपूर्वक पूजन करें।
इस प्रकार श्रद्धा-भक्ति सहित महालक्ष्मीजी का व्रत, पूजन करने से आप लोगों की राज्यलक्ष्मी में सदा अभिवृद्धि होती रहेगी। इस प्रकार व्रत का विधान बताकर श्री वेदव्यासजी अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए।
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जिनका आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं बधाई और शुभ आशीष
दिनांक 31 को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 4 होगा। आपका जीवन संघर्षशील होता है। इनमें अभिमान भी होता है। ये लोग दिल के कोमल होते हैं किन्तु बाहर से कठोर दिखाई पड़ते हैं। इस अंक से प्रभावित व्यक्ति जिद्दी, कुशाग्र बुद्धि वाले, साहसी होते हैं। ऐसे व्यक्ति को जीवन में अनेक परिवर्तनों का सामना करना पड़ता है। इनकी नेतृत्व क्षमता के लोग कायल होते हैं। जैसे तेज स्पीड से आती गाड़ी को अचानक ब्रेक लग जाए ऐसा उनका भाग्य होगा। लेकिन यह भी निश्चित है कि इस अंक वाले अधिकांश लोग कुलदीपक होते हैं।
शुभ दिनांक : 4, 8, 13, 22, 26, 31,
शुभ अंक : 4, 8,18, 22, 45, 57,
शुभ वर्ष : 2031, 2040 2060,
ईष्टदेव : श्री गणेश, श्री हनुमान,
शुभ रंग : नीला, काला, भूरा,
जन्मतिथि के अनुसार भविष्यफल :
परिवारिक मामलों में सहयोग के द्वारा सफलता मिलेगी। नवीन व्यापार की योजना प्रभावी होने तक गुप्त ही रखें। मान-सम्मान में वृद्धि होगी, वहीं मित्र वर्ग का सहयोग मिलेगा। यह वर्ष पिछले वर्ष के दुष्प्रभावों को दूर करने में सक्षम है। आपको सजग रहकर कार्य करना होगा। विवाह के मामलों में आश्चर्यजनक परिणाम आ सकते हैं। नौकरीपेशा प्रयास करें तो उन्नति के चांस भी है। शत्रु पक्ष पर प्रभावपूर्ण सफलता मिलेगी।
मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
आज दिन के आरंभिक भाग को छोड़ शेष दिन आशा के अनुकूल रहेगा। दिन के आरंभ में घरेलू एवं व्यावसायिक उलझनों के कारण दुविधा रहेगी परन्तु शीघ्र ही स्थिति स्पष्ट होने से बनाई हुई योजनाए सही दिशा में आगे बढ़ने लगेंगी। आज महिला एवं पुरुष दोनों ही अपने निखरे हुए व्यक्तित्त्व के बल पर समाज से सम्मान पाने के अधिकारी बनेंगे। आर्थिक लाभ के भी कई अवसर मिलेंगे साथ ही मितव्ययी प्रवृति रहने से बचत भी कर सकेंगे। जोखिम वाले कार्यो से भी अप्रत्याशित लाभ मिलेगा। स्त्री वर्ग भी आज आर्थिक मामलों में परिवार की मदद करेंगी। शारीरिक दर्द एवं सर्दी जुखाम की संभावना है।
वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
आज आपके अधिकांश कार्य बिना मेहनत किये सरलता से बनते चले जायेंगे आज आपको जिस जगह से हानि की उम्मीद रहेगी वहां से भी अकस्मात लाभ के समाचार मिलने पर उत्साहित रहेंगे। खाली समय मे मन पुरानी यादो में खोया रहेगा। व्यवसायी वर्ग व्यापार में निवेश करते समय अनुभवियों की सलाह अवश्य लें धन फंसने की भी संभावना है। दिन भर की गतिविधियों का संध्या के समय आंकलन करने पर संतोष की अनुभूति होगी। संध्या बाद का समय घर मे ही बिताना पसंद करेंगे महिलाओ से आज अच्छी जमेगी मनपसंद वस्तुओं की प्राप्ति सुख बढ़ाने में मददगार रहेगी। ठंडे प्रदार्थो का सेवन संयमित करें।
मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)
आज का दिन आपके लिए कुछ राहत लेकर आएगा फिर भी आज बेतुकी बयानबाजी व आवेश को नियंत्रण में रखे वरना बनते कार्यं अधिक उलझ जाएंगे। कार्य क्षेत्र पर आज लोग आपसे उलझेंगे इसकी अनदेखी कर अपने काम से काम रखें परिस्थिति संध्या बाद बदलने लगेगी। आर्थिक रूप से भी आज दिन मिश्रित ही रहेगा। प्रयास करने पर ही निर्वाह योग्य आय के साधन बन सकेंगे परन्तु आज भविष्य की कार्य योजना बना कर रखें लाभ का समय निकट ही है। महिलाओ का बर्ताव स्नेही जनों के दिल को चोट पहुचायेगा जिससे घर मे विवाद का माहौल बनेगा। संध्या बाद किसी के सहयोग से शांति स्थापित हो सकेगी।
कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
आज के दिन आप का व्यवहार विवेक पूर्ण रहेगा अपने प्रत्येक कार्य को लेकर गंभीर रहेंगे जिसके बाद भी आज लाभ के कम ही अवसर मिलेंगे और जो मिलेंगे उनका भी आशुकूल लाभ नही उठा पाएंगे। आज आपके गंभीर व्यक्तित्त्व में परिवर्तन देखने को मिलेगा हास्य विनोद से आसपास का वातावरण खुशनुमा बनायेगें आपको जानने वाले भी स्वभाव परिवर्तन से आश्चर्य में।रहेंगे लेकिन आज आपके व्यवहार के पीछे स्वार्थ सिद्धि की भावना भी छुपी रहेगी जिसे केवल महिलाये ही पढ़ सकेंगी। संध्या के आसपास कही से अकस्मात धन प्राप्ति हो सकती है। बुजुर्ग आज आपके पक्ष में रहेंगे। खान-पान संयमित रखें।
सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
आज के दिन भी आपकी दिनचार्य अस्त व्यस्त रहेगी जिस भी कार्य को करने का मन बनाएंगे उसी में विलंब होगा फिर भी प्रयास करना ना छोड़े दिन भर की मेहनत का फल संध्या में कम ही सही परन्तु आवश्यकता के समय होने से संतोष होगा। कार्य व्यवसाय में आज सहयोगियों की कमी अखरेगी। महिलाये भी आज शारीरिक समस्याओ के कारण अनमना व्यवहार करेंगी घर के कार्य भी बिखरे रहेंगे। नौकरी वाले जातको एवं बुजुर्गो से कोई हानि होने की संभावना है प्रत्येक कार्यो को जल्दबाजी की जगह आराम से करें। संतानो अंकुश लगाए अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा। संध्या बाद स्थिति सामान्य होने लगेगी।
कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
आज का दिन आपके लिये आर्थिक दृष्टिकोण से पिछले कुछ दिनों की अपेक्षा बेहतर रहेगा। दिन का आरंभिक भाग किसी से किया वादा पूरा करने में व्यतीत होगा लेकिन इसका सकारात्मक परिणाम भी मिलेगा सामाजिक व्यक्तित्त्व में विकास आएगा। आज खर्च ना चाहते हुए भी करना पड़ेगा फिर भी आय का पलड़ा भारी रहने से बजट बिगड़ेगा नही। नौकरी वाले लोगो को ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। व्यवसायी वर्ग भी मध्यान तक खाली रहेंगे इसके बाद ही कार्यो में व्यस्तता बढ़ेगी। सरकारी कार्यो में आज व्यवधान आएंगे कल पर छोड़ना बेहतर होगा। दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा। शरीर मे शिथिलता रहेगी।
तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
आज का दिन आपको मिला जुला फल देगा। दिन के आरंभ में थोड़ा आलस्य प्रमाद रहेगा लेकिन अधूरे कार्यो को पूर्ण करने की चिंता रहने से कार्यो में निष्ठा से लग जाएंगे लेकिन लाभ के लिए संध्या तक इंतजार करना पड़ेगा। सरकारी अथवा अन्य कागजी कार्यवाही भी मध्यान बाद तक लंबित रहेगी संध्या के आस-पास इनमे गति आने लगेगी फिर भी पूर्ण सफलता मिलना आज मुश्किल ही रहेगा। धन लाभ पूर्वनियोजित रहने से प्राप्ति के लिए उत्सुक रहेंगे। पारिवारिक वातावरण आज बिखरा रहने से महिलाओ को समेटने में खासी परेशानी आएगी। थकान को छोड़ सेहत सामान्य रहेगी।
वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
आज के दिन आप ख्याली पुलाव पकाएंगे मन काल्पनिक दुनिया की सैर करेगा जिस वजह से प्रत्येक कार्यो में विलंब होगा किसी से किया वादा सही समय पर पूर्ण ना करने पर खरी-खोटी सुननी पड़ेगी। धन लाभ के लिए आज जोड़तोड़ वाली नीति अपनानी पड़ेगी फिर भी आशाजनक नही रहेगा। संध्या के समय किसी कार्य अथवा परिचित द्वारा अकस्मात धन मिलने से खर्च निकल जाएंगे। नौकरी वाले लोग अधूरे कार्यो को पूर्ण करने में व्यस्त रहेंगे किसी अन्य के हिस्से का कार्य भी आपको करना पड़ेगा जिस वजह से मन मे गुस्सा रहेगा। दाम्पत्य जीवन मे संध्या बाद आत्मीयता बढ़ने से राहत मिलेगी।
धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)
आज का दिन भी आपके लिए घरेलू एवं आर्थिक समस्याओं से भरा रहेगा। परिवार में आज भी किसी ना किसी कारण से आपस खींचतान बनी रहेगी भाई बंधुओ का मनमुटाव महिलाओ के व्यवहार को भी प्रभावित करेगा। कार्य क्षेत्र पर भी इसका असर देखने को मिलेगा बेमन से कार्य करेंगे। धन के मामले में भी आज निराशा ही मिलेगी मेहनत के बाद भी उचित फल नही मिल पायेगा। सहयोगी अथवा अधिकारियों से भी अनबन होने से अव्यवस्था बढ़ेगी। आज क्रोध को वश में रखना अतिआवश्यक है धन सम्बन्धित व्यवहारों में स्पष्टता रखें। संध्या के बाद स्थिति में थोड़ा परिवर्तन आएगा।
मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)
आज का दिन भी आपके अनुकूल रहेगा दिन के मध्यान तक सभी कार्य निर्विघ्न चलते रहेंगे परन्तु इसके बाद कार्यो में विघ्न आने शुरू हो जाएंगे अतिआवश्यक कार्य मध्यान तक पूर्ण कर लें। व्यवसाय में पुराने कार्यो से धन की आमद होगी। नए अनुबंद मिलने में उलझने आएगी अथवा कम लाभ वाले मिलेंगे। व्यवसायी वर्ग आज जोखिम वाले कार्य ना करें निकट भविष्य में हानि हो सकती है। नए व्यापार का आरंभ भी फिलहाल स्थगित ही रखे। सरकारी कार्य भी कागजी कार्यवाही पूर्ण ना होने पर अधूरे रहेंगे। घर का वातावरण मध्यान तक शांत रहेगा इसके बाद महिलाओ की धैर्य हीनता के कारण उथल पुथल मचेगी।
कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)
आज के दिन आप प्रत्येक कार्य को बेहतर करने का प्रयास करेंगे इसमे सफल भी रहेंगे। कार्य व्यवसाय में धन लाभ के साथ ही मान-सम्मान की भी प्राप्ति होगी। महिलाये आज अकस्मात किसी शुभसमाचार मिलने से आनंदित रहेंगी। बेरोजगार लोग भी आज हतोत्साहित ना हो प्रयास करने पर आशाजनक रोजगार से जुड़ सकते है। सार्वजनिक क्षेत्र और नए संबंध बनेंगे जिनसे भविष्य में लाभ कमाने का अवसर मिलेगा। आर्थिक दृष्टिकोण से दिन अच्छा रहेगा खर्च भी आज कम रहने से धन संचय कर पाएंगे। स्वास्थ्य थोड़ा नरम रहेगा। आलस्य के कारण नींद आने की बीमारी से ग्रस्त रह सकते है।
मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
आज के दिन आपका स्वभाव परोपकारी रहेगा किसी अन्य की परेशानी देख कर आपका दिल भी दुखी होगा इस कारण आज आपके साथ धोखा भी हो सकता है सतर्क रहें। महत्त्वपूर्ण कार्यो को आज प्राथमिकता से पूर्ण करने का प्रयास करें संध्या बाद से विघ्न-बाधाएं आने से प्रत्येक कार्य करने में मुश्किल होगी। आर्थिक रूप से दिन संतोषजनक रहेगा आवश्यकता अनुसार धन की प्राप्ति सहज हो जाएगी लेकिन आज महिलाये धन को लेकर परेशान रहेंगी मन की इच्छा पूर्ण ना होने पर झगड़ा भी कर सकती है। संतानो का उत्पाती व्यवहार रहेगा। सेहत संध्या बाद बिगड़ेंगी।

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