🙏🏻 जय माता दी🙏🏻
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌤️ *दिनांक – 23 सितम्बर 2025*
🌤️ *दिन – मंगलवार*
🌤️ *विक्रम संवत – 2082 (गुजरात-महाराष्ट्र अनुसार 2081)*
🌤️ *शक संवत – 1947*
🌤️ *अयन – दक्षिणायन*
🌤️ *ऋतु – शरद ऋतु*
🌤️ *मास – आश्विन*
🌤️ *पक्ष – शुक्ल*
🌤️ *तिथि – द्वितीया 24 सितम्बर प्रात: 04:51 तक तत्पश्चात तृतीया*
🌤️ *नक्षत्र – हस्त दोपहर 01:40 तक तत्पश्चात चित्रा*
🌤️ *योग – ब्रह्म रात्रि 08:23 तक तत्पश्चात इन्द्र*
🌤️ *राहुकाल – शाम 03:32 से शाम 05:03 तक*
🌤️ *सूर्योदय – 06:28*
🌤️ *सूर्यास्त – 06:32*
👉 *दिशाशूल – उत्तर दिशा में*
🚩 *व्रत पर्व विवरण – पूज्य बापूजी का 61वां आत्मसाक्षात्कार दिवस, चंद्र-दर्शन (शाम 06:22 से रात्रि 07:05 तक)*
💥 *विशेष – द्वितीया को बृहती (छोटा बैगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
🕉️~*वैदिक पंचांग* ~🕉️
🌷 *शारदीय नवरात्रि* 🌷
🙏🏻 *अश्विन मास के नवरात्रि का आरंभ 22 सितम्बर, सोमवार से हो गया है। मान्यता है कि नवरात्रि में रोज देवी को अलग-अलग भोग लगाने से तथा बाद में इन चीजों का दान करने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है। जानिए नवरात्रि में किस तिथि को देवी को क्या भोग लगाएं-*
🙏🏻 *नवरात्रि की द्वितीया तिथि यानी दूसरे दिन माता दुर्गा को शक्कर का भोग लगाएं ।इससे उम्र लंबी होती है ।*
👉🏻 शेष कल…………
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌷 *शारदीय नवरात्रि* 🌷
🙏🏻 *अश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तिथि तक शारदीय नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस बार शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ 22 सितम्बर, सोमवार से हो गया है, धर्म ग्रंथों के अनुसार, नवरात्रि में हर तिथि पर माता के एक विशेष रूप का पूजन करने से भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है। जानिए नवरात्रि में किस दिन देवी के कौन से स्वरूप की पूजा करें-*
🌷 *तप की शक्ति का प्रतीक है मां ब्रह्मचारिणी*
🙏🏻 *नवरात्रि की द्वितीया तिथि पर मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। देवी ब्रह्मचारिणी ब्रह्म शक्ति यानी तप की शक्ति का प्रतीक हैं। इनकी आराधना से भक्त की तप करने की शक्ति बढ़ती है। साथ ही, सभी मनोवांछित कार्य पूर्ण होते हैं।*
🙏🏻 *मां ब्रह्मचारिणी हमें यह संदेश देती है कि जीवन में बिना तपस्या अर्थात कठोर परिश्रम के सफलता प्राप्त करना असंभव है। बिना श्रम के सफलता प्राप्त करना ईश्वर के प्रबंधन के विपरीत है। अत: ब्रह्मशक्ति अर्थात समझने व तप करने की शक्ति हेतु इस दिन शक्ति का स्मरण करें। योगशास्त्र में यह शक्ति स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है।*
👉🏻 शेष कल…….
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌷 *नवरात्रि में त्रिदेवी आराधना* 🌷
🙏🏻 *नवरात्रि में 9 तिथियों को 3-3-3 तिथि में बांटा गया है। प्रथम 3 तिथि माँ दुर्गा की पूजा (तमस को जीतने की आराधना), बीच की तीन तिथि माँ लक्ष्मी की पूजा (रजस को जीतने की आराधना) तथा अंतिम तीन तिथि माँ सरस्वती की पूजा (सत्व को जीतने की आराधना) विशेष रूप से की जाती है।*
🙏🏻 *दुर्गा की पूजा करके प्रथम तीन दिनों में मनुष्य अपने अंदर उपस्थित दैत्य, अपने विघ्न, रोग, पाप तथा शत्रु का नाश कर डालता है। उसके बाद अगले तीन दिन सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। अंत में आध्यात्मिक ज्ञान के उद्देश्य से कला तथा ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना करता है ।*
👉🏻 *अब मैं तीनों शक्तियों की आराधना के मूल मंत्रों का वर्णन करता हूँ। नवरात्र में इनका यथासंभव जप करना चाहिए।*
🙏🏻 *१. दुर्गाजी का उत्तमोत्तम नवार्ण मंत्र महामंत्र है। इसको मंत्रराज कहा गया है। नवार्ण मंत्र की साधना धन-धान्य, सुख-समृद्धि आदि सहित सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती है।*
🌷 *“ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”*
🙏🏻 *२. लक्ष्मी जी का मूल मंत्र जिसके द्वारा कुबेर ने परमऐश्वर्य प्राप्त किया था ।*
🌷 *“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा”*
🙏🏻 *३. सरस्वती जी का वैदिक अष्टाक्षर मूल मंत्र जिसे भगवान शिव ने कणादमुनि तथा गौतम को, श्रीनारायण ने वाल्मीकि को, ब्रह्मा जी ने भृगु को, भृगुमुनि ने शुक्राचार्य को, कश्यप ने बृहस्पति को दिया था जिसको सिद्ध करने से मनुष्य बृहस्पति के समान हो जाता है ।*
🌷 *“श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा”*
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️

चैत्र नवरात्रि में माँ की उपासना के लिये दुर्गा सप्तशती अनुष्ठान विधि
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दुर्गा सप्तशती के अध्याय पाठन से संकल्प अनुसार कामनापूर्ति
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1- प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।
2- द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।
3- तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।
4- चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।
5- पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।
6- षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।
7- सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।
8- अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।
9- नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
10- दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
11- एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।
12- द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।
13- त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।
दुर्गा सप्तशती का पाठ करने और सिद्ध करने की विभिन्न विधियाँ
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सामान्य विधि 👇
नवार्ण मंत्र जप और सप्तशती न्यास के बाद तेरह अध्यायों का क्रमशः पाठ, प्राचीन काल में कीलक, कवच और अर्गला का पाठ भी सप्तशती के मूल मंत्रों के साथ ही किया जाता रहा है। आज इसमें अथर्वशीर्ष, कुंजिका मंत्र, वेदोक्त रात्रि देवी सूक्त आदि का पाठ भी समाहित है जिससे साधक एक घंटे में देवी पाठ करते हैं।
वाकार विधि 👇
यह विधि अत्यंत सरल मानी गयी है। इस विधि में प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है।
संपुट पाठ विधि 👇
किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है।
सार्ध नवचण्डी विधि 👇
इस विधि में नौ ब्राह्मण साधारण विधि द्वारा पाठ करते हैं। एक ब्राह्मण सप्तशती का आधा पाठ करता है। (जिसका अर्थ है- एक से चार अध्याय का संपूर्ण पाठ, पांचवे अध्याय में ”देवा उचुः- नमो देव्ये महादेव्यै” से आरंभ कर ऋषिरुवाच तक, एकादश अध्याय का नारायण स्तुति, बारहवां तथा तेरहवां अध्याय संपूर्ण) इस आधे पाठ को करने से ही संपूर्ण कार्य की पूर्णता मानी जाती है। एक अन्य ब्राह्मण द्वारा षडंग रुद्राष्टाध्यायी का पाठ किया जाता है। इस प्रकार कुल ग्यारह ब्राह्मणों द्वारा नवचण्डी विधि द्वारा सप्तशती का पाठ होता है। पाठ पश्चात् उत्तरांग करके अग्नि स्थापना कर पूर्णाहुति देते हुए हवन किया जाता है जिसमें नवग्रह समिधाओं से ग्रहयोग, सप्तशती के पूर्ण मंत्र, श्री सूक्त वाहन तथा शिवमंत्र ‘सद्सूक्त का प्रयोग होता है जिसके बाद ब्राह्मण भोजन,’ कुमारी का भोजन आदि किया जाता है। वाराही तंत्र में कहा गया है कि जो ”सार्धनवचण्डी” प्रयोग को संपन्न करता है वह प्राणमुक्त होने तक भयमुक्त रहता है, राज्य, श्री व संपत्ति प्राप्त करता है।
शतचण्डी विधि 👇
मां की प्रसन्नता हेतु किसी भी दुर्गा मंदिर के समीप सुंदर मण्डप व हवन कुंड स्थापित करके (पश्चिम या मध्य भाग में) दस उत्तम ब्राह्मणों (योग्य) को बुलाकर उन सभी के द्वारा पृथक-पृथक मार्कण्डेय पुराणोक्त श्री दुर्गा सप्तशती का दस बार पाठ करवाएं। इसके अलावा प्रत्येक ब्राह्मण से एक-एक हजार नवार्ण मंत्र भी करवाने चाहिए। शक्ति संप्रदाय वाले शतचण्डी (108) पाठ विधि हेतु अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा का दिन शुभ मानते हैं। इस अनुष्ठान विधि में नौ कुमारियों का पूजन करना चाहिए जो दो से दस वर्ष तक की होनी चाहिए तथा इन कन्याओं को क्रमशः कुमारी, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, कालिका, शाम्भवी, दुर्गा, चंडिका तथा मुद्रा नाम मंत्रों से पूजना चाहिए। इस कन्या पूजन में संपूर्ण मनोरथ सिद्धि हेतु ब्राह्मण कन्या, यश हेतु क्षत्रिय कन्या, धन के लिए वेश्य तथा पुत्र प्राप्ति हेतु शूद्र कन्या का पूजन करें। इन सभी कन्याओं का आवाहन प्रत्येक देवी का नाम लेकर यथा ”मैं मंत्राक्षरमयी लक्ष्मीरुपिणी, मातृरुपधारिणी तथा साक्षात् नव दुर्गा स्वरूपिणी कन्याओं का आवाहन करता हूं तथा प्रत्येक देवी को नमस्कार करता हूं।” इस प्रकार से प्रार्थना करनी चाहिए। वेदी पर सर्वतोभद्र मण्डल बनाकर कलश स्थापना कर पूजन करें। शतचण्डी विधि अनुष्ठान में यंत्रस्थ कलश, श्री गणेश, नवग्रह, मातृका, वास्तु, सप्तऋषी, सप्तचिरंजीव, 64 योगिनी 50 क्षेत्रपाल तथा अन्याय देवताओं का वैदिक पूजन होता है। जिसके पश्चात् चार दिनों तक पूजा सहित पाठ करना चाहिए। पांचवें दिन हवन होता है।
इन सब विधियों (अनुष्ठानों) के अतिरिक्त प्रतिलोम विधि, कृष्ण विधि, चतुर्दशीविधि, अष्टमी विधि, सहस्त्रचण्डी विधि (१००८) पाठ, ददाति विधि, प्रतिगृहणाति विधि आदि अत्यंत गोपनीय विधियां भी हैं जिनसे साधक इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति कर सकता है।
कुछ लोग दुर्गा सप्तशती के पाठ के बाद हवन खुद की मर्जी से कर लेते है और हवन सामग्री भी खुद की मर्जी से लेते है ये उनकी गलतियों को सुधारने के लिए है।
दुर्गा सप्तशती के वैदिक आहुति की सामग्री।
प्रथम अध्याय-👉 एक पान देशी घी में भिगोकर 1 कमलगट्टा, 1 सुपारी, 2 लौंग, 2 छोटी इलायची, गुग्गुल, शहद यह सब चीजें सुरवा में रखकर खडे होकर आहुति देना।
द्वितीय अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, गुग्गुल विशेष
तृतीय अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक सं. 38 शहद
चतुर्थ अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं.1से11 मिश्री व खीर विशेष,
चतुर्थ अध्याय- के मंत्र संख्या 24 से 27 तक इन 4 मंत्रों की आहुति नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से देह नाश होता है। इस कारण इन चार मंत्रों के स्थान पर ओंम नमः चण्डिकायै स्वाहा’ बोलकर आहुति देना तथा मंत्रों का केवल पाठ करना चाहिए इनका पाठ करने से सब प्रकार का भय नष्ट हो जाता है।
पंचम अध्ययाय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं. 9 मंत्र कपूर, पुष्प, व ऋतुफल ही है।
षष्टम अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक सं. 23 भोजपत्र।
सप्तम अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक सं. 10 दो जायफल श्लोक संख्या 19 में सफेद चन्दन श्लोक संख्या 27 में इन्द्र जौं।
अष्टम अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार श्लोक संख्या 54 एवं 62 लाल चंदन।
नवम अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या श्लोक संख्या 37 में 1 बेलफल 40 में गन्ना।
दशम अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 5 में समुन्द्र झाग 31 में कत्था।
एकादश अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 2 से 23 तक पुष्प व खीर श्लोक संख्या 29 में गिलोय 31 में भोज पत्र 39 में पीली सरसों 42 में माखन मिश्री 44 मेें अनार व अनार का फूल श्लोक संख्या 49 में पालक श्लोक संख्या 54 एवं 55 मेें फूल चावल और सामग्री।
द्वादश अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 10 मेें नीबू काटकर रोली लगाकर और पेठा श्लोक संख्या 13 में काली मिर्च श्लोक संख्या 16 में बाल-खाल श्लोक संख्या 18 में कुशा श्लोक संख्या 19 में जायफल और कमल गट्टा श्लोक संख्या 20 में ऋीतु फल, फूल, चावल और चन्दन श्लोक संख्या 21 पर हलवा और पुरी श्लोक संख्या 40 पर कमल गट्टा, मखाने और बादाम श्लोक संख्या 41 पर इत्र, फूल और चावल।
त्रयोदश अध्याय👉 प्रथम अध्याय की सामग्री अनुसार, श्लोक संख्या 27 से 29 तक फल व फूल।
मुख्य पाठ विधि
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यह विधि यहाँ संक्षिप्त रूपसे दी जाती है। नवरात्र आदि विशेष अवसरों पर तथा
शतचण्डी आदि अनुष्ठानों में विस्तृत विधि का उपयोग किया जाता है। उसमें यन्त्रस्थ कलश, गणेश, नवग्रह, मातृका, वास्तु, सप्तर्षि, सप्तचिरंजीव, 64 योगिनी, 50 क्षेत्रपाल तथा अन्यान्य देवताओं की वैदिक विधि से पूजा होती है। अखण्ड दीप की व्यवस्था की जाती है। देवीप्रतिमा की
अंगन्यास और अग्न्युत्तारण आदि विधि के साथ विधिवत् पूजा की जाती है।नवदुर्गापूजा, ज्योति:पूजा, वटुक-गणेशादि सहित कुमारीपूजा, अभिषेक, नान्दीश्राद्ध, रक्षाबन्धन, पुण्याहवाचन, मंगलपाठ, गुरुपूजा, तीर्थावाहन, मन्त्र – स्नान आदि, आसनशुद्धि, प्राणायाम, भूतशुद्धि, प्राणप्रतिष्ठा, अन्तर्मातृकान्यास, बहिर्मातृकान्यास, सृष्टिन्यास, स्थितिन्यास, शक्तिकलान्यास, शिवकलान्यास,
हृदयादिन्यास, षोढान्यास, विलोमन्यास, तत्त्वन्यास, अक्षरन्यास, व्यापकन्यास, ध्यान, पीठपूजा, विशेषाघ्घ्य, क्षेत्रकीलन, मन्त्रपूजा, विविध मुकद्राविधि, आवरणपूजा एवं प्रधानपूजा आदि का
शास्त्रीय पद्धति के अनुसार अनुष्ठान होता है। इस प्रकार विस्तृत विधि से पूजा करने की इच्छा वाले भक्तों को अन्यान्य पूजा-पद्धतियों की सहायता से भगवती की आराधना करके पाठ आरम्भ करना चाहिये।
पाठ विधि आरम्भ
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साधक स्नान करके पवित्र हो आसन-शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके शुद्ध आसन पर बैठे; साथ में शुद्ध जल, पूजन सामग्री और श्रीदुर्गासप्तशती की पुस्तक रखे। पुस्तक को अपने सामने काष्ठ आदि के शुद्ध आसन पर विराजमान कर दे। ललाट में अपनी रुचि के अनुसार भस्म, चन्दन अथवा रोली लगा ले, शिखा बाँध ले; फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्व-शुद्धि के लिये चार बार आचमन करे। उस समय अग्रांकित चार मन्त्रों को क्रमशः पढ़े-
ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।ॐ ऐं हीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः
स्वाहा ॥
तत्पश्चात् प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करे; फिर ‘पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ०’ इत्यादि मन्त्र से कुशकी पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से
संकल्प करे-
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः । ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपराद्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे
आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे (संवत्सर का नाम) अमुकायने (अयन उत्तरायण/दक्षिणायन का नाम) महामाङ्गल्यप्रदे मासानाम् उत्तमे अमुकमासे (मास) अमुकपक्षे (पक्ष का नाम) अमुकतिथौ (तिथि का नाम)
अमुकवासरान्वितायाम् (वार का नाम) अमुकनक्षत्रे (नक्षत्र का नाम) अमुकराशिस्थिते सूर्ये (सूर्य जिस राशि मे हो उसका उच्चारण) अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र, शनिषु (शेष सभी ग्रह उस समय जिस राशि पर हो उसका नाम लें) सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्य तिथौ (तिथि का नाम लें) सकलशास्त्र श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्न:
अमुकशर्मा (अपने गोत्र का उच्चारण करें) अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुग्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्व-
विधपीडानिवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुः पुष्टि धनधान्य समृद्धयर्थं श्रीनवदुर्गाप्रसादेन सर्वा-पन्निवृत्तिसर्वाभीष्ट फलावाप्तिधर्मार्थ काममोक्षचतुर्विध पुरुषार्थसिद्धिद्वारा श्रीमहाकाली-महालक्ष्मीमहासरस्वती देवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्सरं कवचार्गला कीलकपाठ-केदतनत्रोक्त रात्रिसूक्त पाठ देव्यथर्वशीर्ष पाठन्यास विधि सहित नवार्ण जप सप्तशतीन्यास-ध्यान सहित चरित्र सम्बन्धि विनियोगन्यास ध्यानपूर्वकं च ‘मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः ।’ इत्याद्यारभ्य ‘सावर्णिर्भविता मनुः’ इत्यन्तं दुर्गा सप्तशती पाठं तदन्ते न्यासविधि सहित नवार्ण मन्त्र जपं वेद तन्त्रोक्त देवीसूक्त पाठं रहस्यत्रय पठनं शापोद्धारादिकं च करिष्ये।
इस प्रकार प्रतिज्ञा (संकल्प) करके देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार की
विधि से पुस्तक की पूजा करे,
पुस्तक पूजाका मन्त्र
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ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणता: स्म ताम् ॥
(वाराहीतन्त्र तथा चिदम्बरसंहिता)
ध्यात्वा देवीं पञ्चपूजां कृत्वा योन्या प्रणम्य
च।
आधारं स्थाप्य मूलेन स्थापयेत्तत्र पुस्तकम्॥
इसके बाद योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करे, फिर मूल नवार्णमन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करे। इसके बाद शापोद्धार
करना चाहिये। इसके अनेक प्रकार हैं।
‘ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा।
इस मन्त्रका आदि और अन्त में सात बार जप करे। यह शापोद्धार मन्त्र कहलाता है। इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्र का जप किया जाता है। इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है। यह मन्त्र इस प्रकार है- ‘ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं
सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा ।’ इसके जप के पश्चात् आदि
और अन्त में सात-सात बार मृतसंजीवनी विद्या का जप करना चाहिये, जो इस प्रकार है- ‘ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।’ मारीचकल्प के अनुसार सप्तशती शापविमोचन का मन्त्र यह है-
‘ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।’
इस मन्त्र का आरम्भ में ही एक सौ आठ बार जप करना चाहिये, पाठ के अन्त में नहीं। अथवा रुद्रयामल महातन्त्र के अन्तर्गत दुर्गाकल्प में कहे हुए चण्डिका शाप विमोचन मन्त्रों का आरम्भ में ही पाठ करना चाहिये। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-
ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ- नारद संवाद सामवेदाधिपति ब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्रीं शक्तिः त्रिगुणात्म स्वरूप चण्डिका शापविमुक्तौ मम
संकल्पित कार्यसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
ॐ (ह्रीं) रीं रेत:स्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिनयै ब्रह्मवसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव ॥ १ ॥
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुर सैन्यनाशिन्यै ब्रह्मवसिष्ठ विश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव ॥ २ ॥
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव ॥ ३ ॥
ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै
देववन्दितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव ॥ ४ ॥
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्मवसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव ॥५ ॥
ॐ शं शक्ति स्वरूपिण्यै धूम्रलोचन घातिन्यै ब्रह्मवसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता
भव॥ ६ ॥
ॐ तृं तृषा स्वरूपिण्यै चण्ड मुण्ड वध कारिण्यै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्र शापाद्
विमुक्ता भव॥ ७ ॥
क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै
ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव ॥ ८ ॥
ॐ जां जाति स्वरूपिण्यै निशुम्भ वध कारिण्यै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव ॥९ ॥
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भ वध कारिण्यै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव ॥ १० ॥
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव ॥ ११॥
ॐ श्रं श्रद्धा स्वरूपिण्यै सकल फल दात्र्यै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता
भव ॥ १२॥
ॐ कां कान्ति स्वरूपिण्यै राजवर प्रदायै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्र शापाद विमुक्ता भव ॥ १३ ॥
ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गल महिम सहितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव ॥ १४॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्य कारिण्यै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव ॥ १५॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्य कवच स्वरूपिण्यै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव॥ १६॥
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेद स्वरूपिण्यै ब्रह्म वसिष्ठ विश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव ॥ १७॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महाकाली-महालक्ष्मी महासरस्वती स्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः ॥ १८ ॥
इत्येवं हि महामन्त्रान् पठित्वा परमेश्वर।
चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः ॥ १९॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति
यः। क्षीणं कुर्यान्न संशयः ॥ २० ॥
इस प्रकार शापोद्धार करने के अनन्तर अन्तर्मातृका-बहिर्मातृका आदि न्यास करे, फिर श्रीदेवी का ध्यान करके रहस्य में बताये अनुसार नौ कोष्ठों वाले यंत्र में अंगों यन्त्र में महालक्ष्मी आदिका पूजन करे, इसके बाद छ: अंगों सहित दुर्गा सप्तशती का पाठ आरम्भ किया जाता है। कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य- ही सप्तशती के छः अंग माने गये हैं। इनके क्रम में भी मतभेद है। चिदम्बर-संहिता में पहले अर्गला फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है। “
किंतु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है । उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गयी है। जिस प्रकार सब मन्त्रों में पहले बीज का, फिर शक्ति का तथा अन्त में कीलक का उच्चारण होता है, उसी प्रकार यहाँ भी पहले कवचरूप बीज का, फिर अर्गलारूपा शक्ति का तथा अन्त में कीलकरूप कीलक का क्रमशः पाठ होना चाहिये। * यहाँ इसी क्रम का अनुसरण किया गया है।
‘सप्तशती-सर्वस्व’ के उपासना-क्रम में पहले शापोद्धार करके बाद में षडंगसहित पाठ करने का निर्णय किया गया है, अतः कवच आदि पाठ के पहले ही शापोद्धार कर लेना चाहिये। कात्यायनी-तन्त्र में शापोद्धार तथा उत्कीलन का और ही प्रकार बतलाया गया है।
अन्त्याद्यार्कद्विरुद्रत्रिदिगळ्य्यङ्केष्विभर्तवः ।
अश्वोऽश्व इति सर्गाणां शापोद्धारे मनो: क्रमः ॥ ‘ ‘उत्कीलने चरित्राणां मध्याद्यन्तमिति
क्रमः।
अर्थात् सप्तशती के अध्यायों का तेरह- एक, बारह-दो, ग्यारह-तीन, दस-चार, नौ-पाँच तथा आठ-छ:के क्रम से पाठ करके अन्त में सातवें अध्याय को दो बार पढ़े। यह शापोद्धार है और पहले मध्यम चरित्रका, फिर प्रथम चरित्र का, तत्पश्चात् उत्तर चरित्र का पाठ करना उत्कीलन है। कुछ लोगों के मत में कीलक में बताये अनुसार ‘ददाति प्रतिगृहणाति’ के नियम से कृष्ण पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी तिथि में देवी को सर्वस्व-समर्पण करके उन्हीं का होकर उनके प्रसाद रूप से प्रत्येक वस्तु को उपयोग में लाना ही शापोद्धार और उत्कीलन है। कोई कहते हैं- छ: अंगों सहित पाठ करना ही शापोद्धार है। अंगों का त्याग ही शाप है। कुछ विद्वानों की राय में शापोद्धार कर्म अनिवार्य नहीं है, क्योंकि रहस्याध्याय में यह स्पष्टरूप से कहा है कि जिसे एक ही दिन में पूरे पाठ का अवसर न मिले, वह एक दिन केवल मध्यम चरित्र का और दूसरे दिन शेष दो चरित्रों का पाठ करे। इसके सिवा, जो प्रतिदिन नियमपूर्वक पाठ करते हैं, उनके लिये एक दिन में एक पाठ न हो सकने पर एक, दो, एक, चार, दो, एक और दो अध्यायों के क्रम से सात दिनों में पाठ पूरा करने का आदेश दिया गया है। ऐसी दशा में प्रतिदिन शापोद्धार और कीलक कैसे सम्भव है। अस्तु, जो हो, हमने यहाँ जिज्ञासुओंके लाभार्थ शापोद्धार और उत्कीलन दोनों के विधान दे दिये हैं ।
साधक गण समयाभाव होने पर अपनी सुविधानुसार ही पाठ करें पूजा पाठ तप और जपादि में भाव की महत्ता सर्वोपरि मानी गयी है इसलिये केवल भाव शुद्ध रखें।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:।
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जिनका आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं बधाई और शुभ आशीष
आपका जन्मदिन: 23 सितंबर
23 का अंक देखने पर ॐ का आभास देता है। जो कि भारतीय परंपरा में शुभ प्रतीक है। आप बेहद भाग्यशाली हैं कि आपका जन्म 23 को हुआ है। 23 का अंक आपस में मिलकर 5 होता है। जबकि 5 का अंक बुध ग्रह का प्रतिनिधि करता है। ऐसे व्यक्ति अधिकांशत: मितभाषी होते हैं। कवि, कलाकार, तथा अनेक विद्याओं के जानकार होते हैं।
आपमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन करना मुश्किल है। अर्थात अगर आप अच्छे स्वभाव के व्यक्ति हैं तो आपको कोई भी बुरी संगत बिगाड़ नहीं सकती। अगर आप खराब आचरण के हैं तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सुधार नहीं सकती। लेकिन सामान्यत: 23 तारीख को पैदा हुए व्यक्ति सौम्य स्वभाव के ही होते हैं। आपमें गजब की आकर्षण शक्ति होती है। आपमें लोगों को सहज अपना बना लेने का विशेष गुण होता है। अनजान व्यक्ति की मदद के लिए भी आप सदैव तैयार रहते हैं।
आपके लिए खास
शुभ दिनांक : 1, 5, 7, 14, 23
शुभ अंक : 1, 2, 3, 5, 9, 32, 41, 50
शुभ वर्ष : 2030, 2032, 2034, 2050, 2059, 2052
ईष्टदेव : देवी महालक्ष्मी, गणेशजी, मां अम्बे।
शुभ रंग : हरा, गुलाबी जामुनी, क्रीम
आपकी जन्मतिथि के अनुसार भविष्यफल
करियर: नौकरीपेशा व्यक्तियों के लिए यह वर्ष निश्चय ही सफलताओं भरा रहेगा। वर्ष आपके लिए सफलताओं भरा रहेगा। अभी तक आ रही परेशानियां भी इस वर्ष दूर होती नजर आएंगी।
परिवार: पारिवारिक प्रसन्नता रहेगी। संतान पक्ष से खुशखबर आ सकती है। दाम्पत्य जीवन में मधुर वातावरण रहेगा। अविवाहित भी विवाह में बंधने को तैयार रहें।
कारोबार: व्यापार-व्यवसाय में प्रगति से प्रसन्नता रहेगी।
मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
आज का दिन भी प्रसन्नता दायक रहेगा। घर मे धन धान्य की वृद्धि होगी। सुख सुविधा पर आज अधिक खर्च करेंगे। लेकिन आज आप ज्यादा मेहनत करने की अपेक्षा बैठ कर काम करना पसंद करेंगे इससे लाभ तो होगा लेकिन कुछ लोगो की नाराजगी भी सहनी पड़ेगी। पारिवारिक दायित्व बेहतर रूप से निभाने पर बड़े बुजुर्गों के प्रशंशा पात्र बनेंगे। नौकरी पेशाओ को आकस्मिक काम आने से परेशानी होगी लेकिन अधिकारी वर्ग को प्रसन्न कर अपनी बात मनवा सकेंगे। मध्यान बाद का समय मित्र परिचितों के साथ आनंद से व्यतीत करेंगे लेकिन स्वभाव में थोड़ा अहम रहने से रंग में भंग पड़ सकता है। लोग मन मे आलोचना करेंगे व्यवहार खराब होने के डर से दर्शाएंगे नही। संध्या के समय किसी समाचार से बेचैनी रहेगी।
वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
आज आपका मतलबी व्यवहार किसी ना किसी से मतभेद बढ़ायेगा। दिन के आरंभ में कार्यो के प्रति लापरवाही दिखाएंगे एकदम सर पर आने पर ही करेंगे। आध्यात्मिक पक्ष आज प्रबल रहेगा परोपकार की भावना भी प्रबल रहेगी धार्मिक क्षेत्र की यात्रा दान पुण्य के अवसर मिलेंगे। स्वभाव में दिखावा अधिक रहेगा सार्वजिनक कार्यो में प्रतिस्पर्धा के कारण सहयोग करेंगे। काम-धंदे में आमदनी होगी पर उधारी वाले व्यवहारों में ही चली जायेगी। मध्यान बाद का समय अधिक खर्चीला रहेगा मनोरंजन के लिए आंख बंद कर खर्च करेंगे। परिजन आपकी किसी बुरी आदत से परेशान होंगे। भाई बंधुओ से तकरार होने की संभावना है धर्य का परिचय दें।
मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)
आज के दिन आपको विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। पारिवारिक कलह मामूली बात से आरम्भ होकर गंभीर रूप ले सकती है इससे बचने के लिये आज घर मे कम ही समय बिताये। कार्य व्यवसाय में भी आज चाहकर भी मन की योजनाये पूरी नही कर सकेंगें। धन को लेकर भी किसी से कहासुनी सो सकती है। मानसिक दबाव आज कुछ ज्यादा ही रहेगा कोई अनैतिक कदम उठाने से बचे बुजुर्गो के सानिध्य में रहे अथवा आध्यात्म से जुड़े मानसिक रूप से काफी राहत मिलेगी। आर्थक दृष्टिकोण से दिन ठीक ही रहेगा फिर भी आज कुछ ना कुछ कमी अवश्य बनी रहेगी। संध्या का समय दिन की अपेक्षा शान्ति से बीतेगा। सेहत स्वयं की गलती से खराब होगी।
कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
आज का दिन आपके लिए यादगार रहेगा। दिन के आरंभ में थोड़ी सुस्ती रहेगी इसके बाद मस्ती के मूड में रहेंगे परिवार का वातावरण भी आज सहयोगी रहेगा जिससे मन की इच्छा पूर्ण करने में आसानी रहेगी। काम-धंदे के प्रति मध्यान के समय गंभीरता आएगी धन लाभ के लिए ज्यादा मशक्कत नही करनी पड़ेगी सहज रूप से हो जाएगा। मध्यान बाद का समय आनंद मनोरंजन में बीतेगा बाहर घूमने के प्रसंग बनेंगे। उत्तम भोजन वाहन उपहार सम्मान मिलने से अतिउत्साहित रहेंगे लेकिन संध्या बाद थोड़ी सतर्कता बरते आपकी किसी पुरानी गलती उजागर होने पर घर मे कलह हो सकती है। सेहत लगभग सामान्य ही रहेगी।
सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
आज का दिन आपके लिये संतोषजनक रहेगा। आज आप जल्दी से किसी कार्य को करने के मूड में नही रहेंगे प्रातः काल से ही आराम से काम करने के चक्कर मे दिनचार्य धीमी चलेगी। परिजनों के टोकने पर ही कार्य के प्रति गंभीरता आएगी। काम-धंधा बीते कल की अपेक्षा कम रहेगा आवश्यक कार्य लेदेकर पूर्ण कर लेंगे। आर्थिक दृष्टिकोण से आज दिन आय की तुलना में खर्चीला अधिक रहेगा। ना चाहकर भी परिजनों की प्रसन्नता के लिये खर्च करना पड़ेगा। पुराने मित्रों से भेंट याद ताजा करेगी। मध्यान बाद कही से कोई अप्रिय समाचार मिलेने से थोड़ी अफरा तफरी का माहौल बन सकता है। परिवार के बुजुर्ग आपसे मन की बात करेंगे इसकी अनदेखी ना करें अन्यथा बाद पछताना पड़ेगा।
कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
आज दिन भर आपके ऊपर चंचलता हावी रहेगी। परिजनों की किसी भी बात को गंभीर ना लेकर मजाक में उड़ा देंगे इससे घर का माहौल खराब होगा। घरेलू कार्यो में भी टालमटोल करने का प्रयास करेंगे बाद में मन मारकर करना ही पड़ेगा। काम धंदे में ज्यादा ध्यान नही देंगे फलस्वरूप आय भी सीमित ही आवश्यकता अनुसार रहेगी। मध्यान बाद का समय पर्यटन मनोरंजन में व्यतीत करेंगे महिलाये किसी मनोकामना पूर्ति को लेकर उत्साही रहेंगी लेकिन आज पूर्ण होने में संदेह रहेगा। व्यवसायी वर्ग किसी नई योजना को लेकर मानसिक परेशानी में रहेंगे अभी इसपर कार्य आरंभ ना करें अन्यथा अधूरा रह जायेगा। सेहत थोड़ी नरम रहेगी।
तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
आज आपका अभिमानी स्वभाव कुछ ना कुछ गड़बड़ ही कराएगा। स्वयं को अन्य लोगो की तुलना में अधिक बुद्धिमान समझना आपसी संबंधों में खटास लाएगा। लोग स्वार्थवश आपकी खुशामद करेंगे लेकिन पीठ पीछे बुराई करने से नही चूकेंगे। कार्य व्यसाय को लेकर मध्यान तक व्यस्त रहेंगे मेहनत की तुलना में आज लाभ कम ही रहेगा ऊपर से आकस्मिक खर्च लगे रहने से धन संबंधित परेशानियां उभरेंगी। दोपहर बाद का समय काम से अवकाश लेकर बाहर घूमने में बीतेगा स्नेहीजन का सानिध्य मिलेगा लेकिन व्यवहार में उदासीनता बनी रहेगी। परिवार के बड़ो के साथ कुछ समय अवश्य बिताये इससे आपसी गलतफहमियां दूर होंगी कुछ नया सीखने को मिलेगा। सेहत ठीक रहेगी फिर भी मेहनत से दूर भागेंगे।
वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
आज आपका मानसिक संतुलन बराबर नही रहेगा दो कामो को एक साथ करने के प्रयास में गलती होने की संभावना है। धार्मिक कार्यो में रुचि तो रहेगी लेकिन मन कही और ही भटकने से पूजा पाठ का उद्देश्य सफल नही हो सकेगा। व्यावसायिक गतिविधयां किसी अन्य के कारण धीमी रहेंगी। कार्य क्षेत्र पर व्यवसाय तो रहेगा लेकिन सहयोग की कमी रहने से अकेले विजय नही पा सकेंगे कम लाभ से ही संतोष करना पड़ेगा। गृहस्थ में किसी ना किसी से रूठना मनना लगा रहेगा संध्या के समय खर्च करने के बाद ही स्थिति सामान्य हो पाएगी। धार्मिक स्थल की यात्रा भी हो सकती है। सेहत मध्यान बाद अकस्मात खराब होगी पहके से ही सतर्क रहें भोजन संबंधित नियमो का पालन करें।
धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)
आज दिन का अधिकांश भाग सोच विचार में ही व्यर्थ होगा। आपके मन मे योजनाए तो कई लगी रहेंगी लेकिन आलस्य अधिक रहने से किसी भी योजना को साकार रूप नही दे सकेंगे। मध्यान के समय कार्य क्षेत्र पर सहयोगियो की कमी रहेगी ज्यादा काम ना बढ़ाये कम में ही संतोष करें अन्यथा बेवजह की मुसीबत बनेगी। धन लाभ कम फिर भी खर्च लायक हो जाएगा। सामाजिक कार्यो में भी रुचि लेंगे इस के कारण अपने कार्यो में भी बदलाव करना पड़ेगा समाज मे आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी लेकिन समूह में कम बोले अन्यथा परिणाम उल्टे भी हो सकते है। पारिवारिक वातावरण में स्वार्थसिद्धि की भावना अधिक रहेगी। मौसम जनित बीमारी हो सकती है।
मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)
आज के दिन आपका अधिकांश समय दुविधा में बीतेगा। कार्य क्षेत्र और गृहस्त में तालमेल बैठाने में असफल रहेंगे एक काम करने के लिए किसी अन्य काम के बिगड़ने का डर सताएगा। व्यवसाय की व्यस्तता के चलते परिजनों की कामना पूर्ति करने में असमर्थ रहेंगे घरेलू कलह का कारण भी आज यही रहेगा। भाई बंधुओ को आपकी मदद की आवश्यकता पड़ेगा अथवा आपको इनसे लेनी पड़ सकती है इसमे भी कुछ ना कुछ विघ्न आएंगे। आज आपका कोई भी कार्य बिना भाग-दौड़ के पूर्ण नही हो सकेगा। व्यवसाय स्थल पर प्रतिस्पर्धियों का बोलबाला अधिक रहने से अपनी योजना को विराम देना पड़ेगा। निवेश से बचें हानि के योग है। सेहत का साथ भी कम ही रहेगा।
कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)
आज के दिन प्रातः काल से ही स्वास्थ्य संबंधित समस्या लगी रहेगी खराब स्वास्थ्य के कारण जल्दी से किसी कार्य का मन नही बनेगा लेकिन सामाजिक व्यवहारों के लिए समय निकालना ही पड़ेगा। कार्य व्यवसाय में अन्य लोगो के ऊपर आश्रित रहना पड़ेगा। धन की आमद आवश्यकता से कुछ कम रहेगी फिर भी कोई कार्य धन के कारण रुकेगा नही। आज अकस्मात खर्च ज्यादा परेशान करेंगे व्यर्थ के खर्चो पर नियंत्रण की आवश्यकता है। नौकरी करने वाले कामना पूर्ति ना होने पर अधिकारियों से नाराज रहेंगे जानकर काम खराब भी कर सकते है। मध्यान के बाद धार्मिक भावनाओं का उदय होगा लेकिन पूजा पाठ केवल स्वार्थ के लिए ही करेंगे।
मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
आज के दिन आपका स्वभाव अत्यंत आलसी रहेगा परन्तु फिर भी जिस भी कार्य को करेंगे उसमे सफलता अवश्य ही मिलेगी। घरेलू कार्यो के साथ ही व्यावसायिक कार्य भी एकसाथ करने में थोड़ी दुविधा बनेगी लेकिन बुजुर्गो का सहयोग मिलने से इससे निजात पा लेंगे। कार्य-व्यवसाय में आज किसी बहुप्रतीक्षित योजना के परिणाम को लेकर बेचैन रहेंगे धर्य से काम लें जल्दबाजी में कोई गलत निर्णय लेने से बचें विजय आपकी ही होगी। धन की आमद को लेकर दिन के आरंभ में आशंकित रहेंगे लेकिन मध्यान बाद अकस्मात मिलने से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। आपके पीछे से चुगली करने वाले लोग हानि पहुचा सकते है सतर्क रहें। सेहत में थोड़ा उतार-चढ़ाव लगा रहेगा मनोरंजन के अवसर मिलेंगे।

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