Vaidik Panchang 12122025 Rashifal Samadhan

🙏🏻हर हर महादेव 🙏🏻
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
🌤️  *दिनांक – 12 दिसम्बर 2025*
🌤️ *दिन – शुक्रवार*
🌤️ *विक्रम संवत 2082*
🌤️ *शक संवत -1947*
🌤️ *अयन – दक्षिणायन*
🌤️ *ऋतु – हेमंत ॠतु*
🌤️ *मास – पौष (गुजरात-महाराष्ट्र)मार्गशीर्ष*
🌤️ *पक्ष – कृष्ण*
🌤️ *तिथि – अष्टमी दोपहर 02:56 तक तत्पश्चात नवमी*
🌤️ *नक्षत्र – उत्तराफाल्गुनी 13 दिसंबर प्रातः 05:50 तक तत्पश्चात हस्त*
🌤️ *योग – प्रीति सुबह 11:12 तक तत्पश्चात आयुष्मान*
🌤️ *राहुकाल – सुबह 11:11 से दोपहर 12:32 तक*
🌤️ *सूर्योदय – 07:07*
🌤️ *सूर्यास्त –  05:57*
👉 *दिशाशूल – पश्चिम दिशा मे*
🚩 *व्रत पर्व विवरण-
💥 *विशेष – अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है (ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्म खण्ड: 27,29,34)*
             🌞~*वैदिक पंचांग* ~🌞
🌷 *कार्य सिद्धि के लिए* 🌷
*“ॐ गं गणपतये नमः”*
🙏🏻 *हर कार्य शुरु करने से पहले इस मंत्र का 108 बार जप करें, कार्य सिद्ध होगा ।*
🙏🏻
             🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞

तिलक लगाने में कौन-सी उंगली का प्रयोग क्यों?

हिन्दू शास्त्रों में तिलक केवल एक चिन्ह नहीं, बल्कि ऊर्जा, आशीष और ग्रहों का संतुलन माना गया है। प्रत्येक उंगली एक ग्रह व ऊर्जा-चक्र से जुड़ी है। अतः तिलक का प्रभाव उंगली के चयन से बदल जाता है।

1) अनामिका (Ring Finger) – सूर्य एवं शांति की उंगली

संबंधित ग्रह: सूर्य
संबंधित तत्त्व: जल
आध्यात्मिक प्रभाव: आज्ञा चक्र (Third Eye) सक्रिय करता है
उपयोग:
देवी-देवताओं को तिलक
गुरु जनों को तिलक
स्वयं को तिलक (पूजा के बाद)
लाभ:
मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है
बुद्धि, विवेक और आत्मविश्वास का विकास
नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है
ध्यान व एकाग्रता में वृद्धि
:!:! रामायण और पुराणों में अनामिका से तिलक को “शांतिदायक” कहा गया है।
2) मध्यमा (Middle Finger) – शनि एवं स्थिरता की उंगली
संबंधित ग्रह: शनि
संबंधित तत्त्व: आकाश
उपयोग:
पूजा के बाद स्वयं को तिलक
लाभ:
मन शांत होता है
क्रोध, चंचलता और मानसिक तनाव में कमी
कर्मों में स्थिरता और संतुलन
:: योग शास्त्र में मध्यमा उंगली को “आंतरिक शुद्धि” की उंगली कहा गया है।
3) तर्जनी (Index Finger) – गुरु, धर्म और पितृ उंगली
संबंधित ग्रह: गुरु
संबंधित तत्त्व: वायु
उपयो
मृत व्यक्तियों को तिलक
पितृ कार्यों, तर्पण, श्राद्ध आदि में उपयोग
मोक्ष संबंधित कर्म
लाभ:
पितरों को शांति
आत्मा को मोक्ष मार्ग की प्रेरणा
परिवार में आध्यात्मिक संतुलन
तर्जनी को “निर्देशन” की उंगली कहा जाता है, इसलिए जीवितों को इस उंगली से तिलक नहीं लगाया जाता।
4) अंगूठा (Thumb) – शुक्र, यश व वैभव की उंगली
संबंधित ग्रह: शुक्र
संबंधित तत्त्व: अग्नि
उपयोग:
भाइयों, पुत्रों, मित्रों, अतिथियों को तिलक
सम्मान, आशीर्वाद और शुभ कार्यों में उपयोग
लाभ:
यश, सम्मान, सफलता
धन और वैभव में वृद्धि
संबंधों में मधुरता
स्वास्थ्य में सुधार
राजा-महाराजा और सेनापति पहले अंगूठे से ही तिलक ग्रहण करते थे।
5) कनिष्ठा (Little Finger) – वर्जित उंगली
संबंधित ग्रह: बुध
संबंधित तत्त्व: पृथ्वी
उपयोग:
शुभ कार्यों में वर्जित
कारण:
यह उंगली स्थिर ऊर्जा प्रदान नहीं करती
इससे लगाया गया तिलक प्रभावहीन माना जाता है
पुराणों में इसे “अशुभ कर्म” की उंगली कहा गया है।

तिलक का रंग और उसका प्रभाव (New Addition)
तिलक अलग-अलग रंगों में होता है, और हर रंग का आध्यात्मिक महत्व है:
🔴 कुंकुम / रोली (शक्ति का तिलक):
ऊर्जा, साहस, देवी कृपा
हल्दी / केसर (सौभाग्य का तिलक):
समृद्धि, मंगल, बुद्धि
चंदन (शांति का तिलक):
मन की ठंडक, पवित्रता, ध्यान
भस्म / रुद्र तिलक:
निष्ठा, त्याग, तपस्या, निडरता, शिव शक्ति
संक्षिप्त सार (बहुत सुंदर रूप में):
स्वयं – अनामिका या मध्यमा
दूसरों को – अंगूठा
पितृ कार्य में – तर्जनी
वर्जित – कनिष्ठा
तिलक का रंग – मन और ऊर्जा के अनुसार चुनें

             🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
🙏🍀🌷🌻🌺🌸🌹🍁🙏
🌹 जिनका आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं बधाई और शुभ आशीष 🌹
आपका जन्मदिन: 12 दिसंबर

अंक ज्योतिष के अनुसार दिनांक 12 को जन्मे व्यक्तियों का मूलांक तीन आता है। यह बृहस्पति का प्रतिनिधि अंक है। आप दार्शनिक स्वभाव के होने के बावजूद एक विशेष प्रकार की स्फूर्ति रखते हैं। आपकी शिक्षा के क्षेत्र में पकड़ मजबूत होगी। आप एक सामाजिक प्राणी हैं। आप सदैव परिपूर्णता या कहें कि परफेक्शन की तलाश में रहते हैं यही वजह है कि अकसर अव्यवस्थाओं के कारण तनाव में रहते हैं। ऐसे व्यक्ति निष्कपट, दयालु एवं उच्च तार्किक क्षमता वाले होते हैं। अनुशासनप्रिय होने के कारण कभी-कभी आप तानाशाह भी बन जाते हैं।

आपके लिए खास

शुभ दिनांक : 3, 12, 21, 30

शुभ अंक : 1, 3, 6, 7, 9


शुभ वर्ष : 2028, 2030, 2031, 2034, 2043, 2049, 2052

ईष्टदेव : देवी सरस्वती, देवगुरु बृहस्पति, भगवान विष्णु


शुभ रंग : पीला, सुनहरा और गुलाबी

आपकी जन्मतिथि के अनुसार भविष्यफल


व्यापार-नौकरी: नवीन व्यापार की योजना भी बन सकती है। नौकरीपेशा के लिए प्रतिभा के बल पर उत्तम सफलता का है। महत्वपूर्ण कार्य से यात्रा के योग भी है।

घर-परिवार: यह वर्ष आपके लिए अत्यंत सुखद है। घर या परिवार में शुभ कार्य होंगे। दांपत्य जीवन में सुखद स्थिति रहेगी। शत्रु वर्ग प्रभावहीन होंगे।


करियर: किसी विशेष परीक्षा में सफलता मिल सकती है। मित्र वर्ग का सहयोग सुखद रहेगा।


मेष (Aries)
स्वभाव: उत्साही
राशि स्वामी: मंगल
शुभ रंग: लाल
आज का दिन आपके लिए बढ़िया रहने वाला है। कार्यक्षेत्र में आपको कुछ नई जिम्मेदारियां मिलेंगी, जिनको आप बखूबी निभाएंगे। आपके रिश्ते भी बेहतर रहेंगे और आपको प्रमोशन आदि भी मिलता दिख रहा है। आपके आस पड़ोस में यदि कोई बात विवाद हो, तो आप उसमें न पड़े, क्योंकि उसके कानूनी होने की संभावना है। वाहनों का प्रयोग आप थोड़ा सावधानी से करें, इसलिए आपको किसी से मांग कर वाहन चलाने से बचना होगा।

वृषभ (Taurus)
स्वभाव:  धैर्यवान
राशि स्वामी: शुक्र
शुभ रंग: हरा
आज का दिन आपके लिए मेहनत से काम करने के लिए रहेगा। आप अपनी आय और व्यय में तालमेल बनाकर चलेंगे, जिससे आप भविष्य को लेकर भी कोई इंवेस्टमेंट आसानी से कर सकेंगे, लेकिन आप किसी की कहीसुनी बातों पर भरोसा कर सकते हैं। जो परिवार के सदस्यों में लड़ाई झगड़े की वजह बनेगी। आपके साहस और पराक्रम में वृद्धि होगी। आपकी निर्णय लेने की क्षमता भी बेहतर रहेगी। आपका मन अपने किसी मित्र से मिलकर काफी खुश होगा।

मिथुन (Gemini)
स्वभाव:  जिज्ञासु
राशि स्वामी: बुध
शुभ रंग: पीला
आज का दिन विद्यार्थियों के लिए बढ़िया रहने वाला है, वह अपनी परीक्षा की तैयारी में पूरी मेहनत से जुटेंगे और माताजी आपको कोई जिम्मेदारी देगी। परिवार का माहौल भी खुशनुमा रहेगा। संतान पक्ष की ओर से आपको कोई खुशखबरी सुनने को मिल सकती है। आप अपने बिजनेस में यदि कुछ उतार-चढ़ाव को लेकर परेशान थे, तो आपकी वह समस्या भी दूर होगी और शेयर मार्केट से जुड़े लोगों के लिए आज का दिन बढ़िया रहने वाला है।

कर्क (Cancer)
स्वभाव:  भावुक
राशि स्वामी: चंद्र
शुभ रंग: सफेद
आज का दिन आपके लिए मिश्रित रूप से फलदायक रहने वाला है।  आप अपने आवश्यक कामों को समय से निपटाने की कोशिश करें। वैवाहिक जीवन में चल रही समस्याएं आपकी टेंशनों को बढ़ाएंगी। बैंकिंग क्षेत्रों में कार्यरत लोगों को किसी अच्छी स्कीम का पता चल सकता है। परिवार में किसी शुभ और मांगलिक कार्यक्रम का आयोजन होने से माहौल खुशनुमा रहेगा। आप बड़े बुजुर्गों की सेवा के लिए भी समय निकालेंगे। भाईयों और दोस्तों का आपको पूरा साथ मिलेगा।

सिंह राशि (Leo)
स्वभाव:  आत्मविश्वासी
राशि स्वामी: सूर्य
शुभ रंग: ग्रे
आज का दिन आपके लिए आत्मविश्वास से भरपूर रहने वाला है। आपकी निर्णय नेतृत्व क्षमता बेहतर रहेगी। प्रतिस्पर्धा का भाव आपके मन में बना रहेगा। आप अपने मित्रों की मदद के लिए भी आगे आएंगे और यदि आप किसी पिकनिक आदि पर जाने की योजना बना रहे थे, तो उसमें आपको थोड़ा सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यदि आपकी कोई डील अटकी हुई थी, वह भी आपको मिल सकती हैं। आप किसी नए इलेक्ट्रॉनिक आइटम को अपने घर लेकर आ सकते हैं।

कन्या (Virgo)
स्वभाव:  मेहनती
राशि स्वामी: बुध
शुभ रंग: लाल
आज का दिन आपके लिए महत्वपूर्ण रहने वाला है। आप अपने कामों में थोड़ा धैर्य और संयम से बरतें, तो आपके लिए बेहतर रहेगा। आपको बिजनेस में यदि किसी डील को लेकर पार्टनरशिप करनी पड़ें, तो उसमें आपको अपने पार्टनर की बातों पर पूरा भरोसा करने से बचना होगा, क्योंकि वह आपको धोखा दे सकते हैं। माता जी की सेहत में गिरावट आने से आपको भागदौड़ बनी रहेगी और कोई काम यदि लंबे समय से पेंडिंग था, तो उसे भी आप आसानी से पूरा करने की कोशिश करेंगे।

तुला (Libra)
स्वभाव:  संतुलित
राशि स्वामी: शुक्र
शुभ रंग: पीला
आज का दिन आपके लिए व्यस्तता भरा रहने वाला है। आप कामों में काफी व्यस्त रहेंगे। दोस्तों से मिलने का भी आप समय निकालेंगे और राजनीति में कार्यरत लोगों को उनके कामों से एक नई पहचान मिलेगी। आप घर की साफ-सफाई और रख रखाव को लेकर भी थोड़ा ज्यादा ध्यान दिखाएंगे। आपके स्वास्थ्य में चल रही कोई समस्या आपको परेशानी देगी, जिसके लिए आपको थोड़ा एतियात बरतने की आवश्यकता है। सरकारी नौकरी की तैयारी में लगे लोगों को मेहनत जारी रखनी होगी।

वृश्चिक (Scorpio)
स्वभाव:  रहस्यमय
राशि स्वामी: मंगल
शुभ रंग: ग्रे
आज का दिन आपके लिए उलझनों भरा रहने वाला है। जीवनसाथी की भावनाओं का आपको सम्मान करना होगा। आप किसी नए वाहन की खरीदारी की योजना बना रहे थे, तो उसके लिए आप कोई लोन आदि अप्लाई कर सकते हैं। आपको किसी पुरानी गलती से सबक लेने की आवश्यकता है, इसलिए आप उसे ना दोहराएं। आपको बातों में पूरी सहमति देनी होगी। विद्यार्थियों के उच्च शिक्षा के मार्ग प्रशस्थ होंगे। आपका बिजनेस पहले से बेहतर रहेगा।

धनु (Sagittarius)
स्वभाव:  दयालु
राशि स्वामी: गुरु
शुभ रंग: गोल्डन
आज का दिन आपके लिए उत्साहपूर्ण रहने वाला है। आपको तरक्की के नए-नए अवसर मिलेंगे, जो आपको खुशी देंगे। आपका रुका हुआ धन भी आपको मिल सकता है। जीवनसाथी का सहयोग और सानिध्य आपको भरपूर मात्रा में मिलेगा।  प्रेम जीवन जी रहे लोगों को साथी के साथ लॉन्ग ड्राइव पर जाने की योजना बना सकते हैं। आप मनपसंद भोजन का आनंद लेंगे। आप अपने घर के रेनोवेशन का काम भी शुरू कर सकते हैं।

मकर (Capricorn)
स्वभाव:  अनुशासित
राशि स्वामी:  शनि
शुभ रंग: बैंगनी
आज का दिन आपके लिए आर्थिक दृष्टिकोण से अच्छा रहने वाला है। आपको कुछ विशेष व्यक्तियों से मिलने का मौका मिलेगा। आप अपने कामों को कल पर टालने से बचें, नहीं तो इससे बाद में आपकी मुश्किलें बढ़ेंगी। आपको कोई निवेश थोड़ा सावधानी से करने की आवश्यकता है, क्योंकि कोई आपको बहलाने फुसलाने की कोशिश कर सकता है। प्राइवेट सेक्टर में कार्यरत लोगों को मेहनत अधिक रहेगी, लेकिन बॉस से उनके रिश्ते भी बेहतर रहेंगे।

कुंभ ( Aquarius)
स्वभाव:  मानवतावादी
राशि स्वामी: शनि
शुभ रंग: लाल
आज का दिन आपके लिए चुनौतियों से भरा रहने वाला है। आपको एक साथ कई काम हाथ लगेंगे, जो आपकी टेंशनों को बढ़ाएंगे। आपको किसी परिजन की ओर से कोई निराशाजनक सूचना सुनने को मिल सकती हैं। परिवार में किसी सदस्य के विवाह में आ रही बाधा को लेकर आप अपने किसी मित्र से बातचीत कर सकते हैं। आप अपने परिवार में वरिष्ठ सदस्यों से काम को लेकर सलाह लेंगे, जो आपके लिए अच्छे रहेंगे। आप अपनी शारीरिक समस्याओं को नजरअंदाज ना करें।

मीन (Pisces)
स्वभाव: संवेदनशील
राशि स्वामी: बृहस्पति
शुभ रंग: गुलाबी
आज का दिन आपके लिए ऊर्जावान रहने वाला है। आप उन्नति की राह पर आगे बढ़ेंगे। आपकी आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर रहेगी। रचनात्मक कार्यो में आपकी काफी रुचि रहेगी। आपको ऑफिस में महिला मित्रों से सावधानी बरतने की आवश्यकता है। आप किसी से लेनदेन थोड़ा समझदारी दिखाकर ही करें, क्योंकि बाद में आपको कोई नुकसान होता दिख रहा है। यदि आप ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं, तो थोड़ा सचेत रहें, क्योंकि आपके साथ कोई फ्रॉड हो सकता है।

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🌼⚜️॥ महिषासुर मर्दिनि स्तोत्रम् ॥⚜️🌼
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥1॥

पर्वतराज हिमालय की कन्या, पृथ्वी को आनंदित करने वाले, संसार को हर्षित रखने वाली, नन्दीगण से नमस्कार की जाने वाली, गिरी श्रेष्ठ विन्ध्याचल के शिखर पर निवास करने वाली, भगवान विष्णु को प्रसन्न रखने वाली, इन्द्र से नमस्कृत होने वाली, भगवान शिव की भार्या के रूप में प्रतिष्ठित, विशाल कुटुम्ब वाली और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥2॥

देवराज इंद्र को समृद्धशाली बनाने वाली, दुर्धर तथा दुर्मुख नामक दैत्यों का विनाश करने वाली, सर्वदा हर्षित रहने वाली, तीनों लोकों का पालन-पोषण करने वाली, भगवान शिव को संतुष्ट रखने वाले, पाप को दूर करने वाली, घोर गर्जन करने वाली, दैत्यों पर भीषण कोप करनेवाली, मदान्धों के मद का हरण कर लेने वाली, सदाचार से रहित मुनि जनों पर क्रोध करने वाली और समुद्र की कन्या महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्ठित हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥3॥

जगत की माता स्वरूपिणी, कदम्ब वृक्ष के वन में प्रेमपूर्वक निवास करने वाली, सदा संतुष्ट रहने वाली, हास-परिहास में सदा रत रहने वाली, पर्वतों में श्रेष्ठ ऊँचे हिमालय की चोटी पर अपने भवन में विराजमान रहने वाली, मधु से भी अधिक मधुर स्वभाव वाली, मधु-कैटभ का संहार करने वाली, महिष को विदीर्ण कर डालने वाली और रासक्रीडा में मग्न होने वाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥4॥

गजाधिपति के बिना सूँड़ के धड़ को काट-काट कर सैकड़ों टुकड़े कर देनेवाली, सेनाधिपति चण्ड-मुण्ड नामक दैत्यों को अपने भुजदण्ड से मार-मार कर विदीर्ण कर देनेवाली, शत्रुओं के हाथियों के गण्डस्थल को भग्न करने में उत्कट पराक्रम से सम्पन्न कुशल सिंह पर आरूढ़ होनेवाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥5॥

रणभूमि में मदोन्मत्त शत्रुओं के वध से बढ़ी हुई अदम्य तथा पूर्ण शक्ति धारण करनेवाली, चातुर्यपूर्ण विचारवाले लोगों में श्रेष्ठ और गम्भीर कल्पनावाले प्रमथाधिपति भगवान शंकर को दूत बनानेवाली, दूषित कामनाओं तथा कुत्सित विचारोंवाले दुर्बुद्धि दानवों के दूतों से न जानी जा सकनेवाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥6॥

शरणागत शत्रुओं की स्त्रियों के वीर पतियों को अभय प्रदान करनेवाले हाथ से शोभा पानेवाली, तीनों लोकों को पीड़ित करनेवाले दैत्य शत्रुओं के मस्तक पर प्रहार करने योग्य तेजोमय त्रिशूल हाथ में धारण करनेवाली तथा देवताओं की दुन्दुभि से निकलने वाली ‘दुम्-दुम्’ ध्वनि से समस्त दिशाओं को बार-बार गुंजित करनेवाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥7॥

अपने हुंकार मात्र से धूम्रलोचन तथा धूम्र आदि सैकड़ों असुरों को भस्म कर डालनेवाली, युद्धभूमि में कुपित रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न हुए अन्य रक्तबीज समूहों का रक्त पी जानेवाली और शुम्भ-निशुम्भ नामक दैत्यों के महायुद्ध से तृप्त किये गये मंगलकारी शिव के भूत-पिशाचों के प्रति अनुराग रखनेवाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥8॥

समरभूमि में धनुष धारण कर अपने शरीर को केवल हिलाने मात्र से शत्रुदल को कम्पित कर देनेवाली, स्वर्ण के समान पीले रंग के तीर और तरकश से सज्जित, भीषण योद्धाओं के सिर काटनेवाली और (हाथी, घोड़ा, रथ, पैदल) चारों प्रकार की सेनाओं का संहार करके रणभूमि में अनेक प्रकार की शब्दध्वनि करनेवाले बटुकों को उत्पन्न करनेवाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥9॥

देवांगनाओं के तत-था-थेयि-थेयि आदि शब्दों से युक्त भावमय नृत्य में मग्न रहने वाली, कुकुथा आदि विभिन्न प्रकार की मात्राओं वाले तालों से युक्त आश्चर्यमय गीतों को सुनने में लीन रहने वाली और मृदंग की धुधुकुट-धूधुट आदि गंभीर ध्वनि को सुनने में तत्पर रहने वाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥10॥

हे जपनीय मन्त्र की विजय शक्ति स्वरूपिणी ! आपकी बार-बार जय हो। जय-जयकार शब्द सहित स्तुति करने में तत्पर समस्त संसार के लोगों से नमस्कृत होने वाली, अपने नूपुर के झण-झण, झिंझिम शब्दों से भूतनाथ भगवान शंकर को मोहित करने वाली और नटी-नटों के नायक प्रसिद्ध नट अर्धनारीश्वर शंकर के नृत्य से सुशोभित नाट्य देखने में तल्लीन रहने वाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती! आपकी जय हो, जय हो।

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥11॥

प्रसन्नचित्त तथा संतुष्ट देवताओं के द्वारा अर्पित किये गये पुष्पों से अत्यंत मनोरम कान्ति धारण करने वाली, निशाचरों को वर प्रदान करने वाले शिवजी की भार्या, रात्रिसूक्त से प्रसन्न होने वाली, चन्द्रमा के समान मुखमण्डल वाली और सुन्दर नेत्र वाले कस्तूरी मृगों में व्याकुलता उत्पन्न करने वाले भौंरों से तथा भ्रांति को दूर करने वाले ज्ञानियों से अनुसरण की जाने वाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥12॥

महनीय महायुद्ध के श्रेष्ठ वीरों के द्वारा घुमावदार तथा कलापूर्ण ढंग से चलाये गये भालों के युद्ध के निरीक्षण में चित्त लगाने वाली, कृत्रिम लतागृह का निर्माण कर उसका पालन करने वाली स्त्रियों की बस्ती में ‘झिल्लिक’ नामक वाद्य विशेष बजाने वाली भिल्लिनियों के समूह से सेवित होने वाली और कान पर रखे हुए विकसित सुन्दर रक्तवर्ण तथा श्रेष्ठ कोमल पत्तों से सुशोभित होने वाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥13॥

सुन्दर दंतपंक्ति वाली स्त्रियों के उत्कंठापूर्ण मन को मुग्ध कर देने वाले कामदेव को जीवन प्रदान करने वाली, निरन्तर मद चूते हुए गण्डस्थल से युक्त मदोन्मत्त गजराज के सदृश मन्थर गति वाली और तीनों लोकों के आभूषण स्वरूप चन्द्रमा के समान कान्तियुक्त सागर कन्या के रूप में प्रतिष्ठित हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥14॥

कमलदल के सदृश वक्र, निर्मल और कोमल कान्ति से परिपूर्ण एक कलावाले चन्द्रमा से सुशोभित उज्ज्वल ललाट पटलवाली, सम्पूर्ण विलासों और कलाओं की आश्रयभूत, मन्दगति तथा क्रीड़ा से सम्पन्न राजहंसों के समुदाय से सुशोभित होनेवाली और भौंरों के सदृश काले तथा सघन केशपाश की चोटी पर शोभायमान मौलश्री पुष्पों की सुगन्ध से भ्रमर समूहों को आकृष्ट करनेवाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥15॥

आपके हाथ में सुशोभित मुरली की ध्वनि सुनकर बोलना बंद करके लाज से भरी हुई कोकिल के प्रति प्रिय भावना रखनेवाली, भौंरों के समूहों की मनोहर गूंज से सुशोभित पर्वत प्रदेश के निकुंजों में विहार करनेवाली और अपने भूत तथा भिल्लिनी आदि गणों के नृत्य से युक्त क्रीड़ाओं को देखने में सदा तल्लीन रहनेवाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥16॥

अपने कटिप्रदेश पर सुशोभित पीले रंग के रेशमी वस्त्र की विचित्र कान्ति से सूर्य की प्रभा को तिरस्कृत कर देने वाली, सुमेरु पर्वत के शिखर पर मदोन्मत्त गर्जना करने वाले हाथियों के गंडस्थल के समान वक्षस्थल वाली और आपको प्रणाम करने वाले देवताओं तथा दैत्यों के मस्तक पर स्थित मणियों से निकली हुई किरणों से प्रकाशित चरणनखों में चन्द्रमा सदृश कान्ति धारण करने वाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥17॥

हजारों हस्त नक्षत्रों को जीतने वाले और सहस्र किरणों वाले भगवान सूर्य की एकमात्र नमस्करणीय, देवताओं के उद्धार हेतु युद्ध करने वाले, तारकासुर से संग्राम करने वाले तथा संसार सागर से पार करने वाले शिवजी के पुत्र कार्तिकेय से प्रणाम की जाने वाली और राजा सुरथ तथा समाधि नामक वैश्य की सविकल्प समाधि के समान समाधियों में सम्यक जपे जाने वाले मंत्रों में प्रेम रखने वाली हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥18॥

हे करुणामयी कल्याणमयी शिवे ! हे कमलवासिनी कमले ! जो मनुष्य प्रतिदिन आपके चरण कमल की उपासना करता है, उसे लक्ष्मी का आश्रय क्यों नहीं प्राप्त होगा। हे शिवे ! आपका चरण ही परम पद है, ऐसी भावना रखने वाले मुझ भक्त को क्या-क्या सुलभ नहीं हो जायेगा अर्थात सब कुछ प्राप्त हो जायेगा। हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम्।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥19॥

स्वर्ण के समान चमकते घड़ों के जल से जो आपके प्रांगण की रंगभूमि को प्रक्षालित कर उसे स्वच्छ बनाता है, वह इन्द्राणी के समान विशाल वक्षस्थलों वाली सुन्दरियों का सान्निध्य सुख अवश्य ही प्राप्त करता है। हे सरस्वति ! मैं आपके चरणों को ही अपनी शरणस्थली बनाऊँ, मुझे कल्याण कारक मार्ग प्रदान करो। हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥20॥

स्वच्छ चन्द्रमा के सदृश सुशोभित होने वाले आपके मुखचन्द्र को निर्मल करके जो आपको प्रसन्न कर लेता है, क्या उसे देवराज इन्द्र की नगरी में रहने वाली चंद्रमुखी सुन्दरियाँ सुख से वंचित रख सकती हैं। भगवान शिव के सम्मान को अपना सर्वस्व समझने वाली हे भगवति ! मेरा तो यह विश्वास है कि आपकी कृपा से क्या-क्या सिद्ध नहीं हो जाता। हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती ! आपकी जय हो, जय हो।

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥21॥

   जो मनुष्य शांत भाव से पूर्ण रूप से मन को एकाग्र करके तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण कर नियमपूर्वक प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवती महालक्ष्मी उसके यहाँ सदा वास करती हैं और उसके बन्धु-बान्धव तथा शत्रुजन भी सदा उसकी सेवा में तत्पर रहते हैं।

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*॥ महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र सम्पूर्णं॥*

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मेरे गोविंद का प्यारा ब्रज….

श्रीमदभागवत जी के गोपी गीत में गोपियाँ कहती हैं कि, “हे श्री कृष्ण जब से आपने इस ब्रजभूमि में जन्म लिया है, तब से इसका महत्त्व वैकुण्ठ से भी अधिक बढ़ गया है।” भगवान को ब्रज से बहुत प्रेम है।

जो निष्काम बुद्धि में प्रकट होता है, उसे बैकुण्ठ कहते हैं। सूर्य के प्रकाश में अग्नि है, किन्तु वह अग्नि नहीं उत्पन्न कर सकता।

अग्नि तो सूर्यमणि द्वारा उत्पन्न होती है। इसी प्रकार परमात्मा सर्वव्यापक हैं, किन्तु वह निष्काम बुद्धि से ही प्रकट होता है। बैकुण्ठ में काम नहीं है, किन्तु काम और क्रोध तो रजोगुण हैं।

गीता में कहा गया है :

काम एवं क्रोध एवं रजोगुण समुदभवः।वैकुण्ठ अति दिव्य सत्व प्रधान भूमि है।*

वहाँ जाने के बाद जीव संसार में नहीं आता। गोपी कहती हैं कि वैकुण्ठ से भी ब्रज की कक्षा ऊँचीं हो गई है। वैकुण्ठ में परमात्मा राजाधिराज हैं।

यदि कोई वैकुण्ठ में जाये, तो प्रभु का चरण स्पर्श नहीं कर सकता। वहाँ उनकी चरण-सेवा लक्ष्मी करती हैं। प्रभु की चरण-पादुका सामने पड़ी होती हैं स्वर्ग में जाने वाला प्रभु का नहीं, बल्कि उनकी चरण पादुका का स्पर्श करता है।

वैकुण्ठ में ऐश्वर्य है ब्रज में प्रेम है। जहाँ ऐश्वर्य होता है, वहाँ पर्दा होता है, किन्तु ब्रज में कोई पर्दा नहीं है। ग्रंथों से पता चलता है कि नारायण निद्राहीन होते हैं और लक्ष्मीजी इनकी चरण सेवा करती हैं।

जब कोई जीव स्वर्ग में पहुँचता है, तब लक्ष्मीजी चरण सेवा करते हुए जोर से चरण दबाती हैं। इसके बाद ठाकुरजी अपनी आँखें थोड़ी सी खोलते हैं और पूछते हैं कि कहो क्या बात है ?

उन्हें श्री लक्ष्मीजी बताती हैं कि यह जीव आपकी शरण में आया है, सुनकर परमात्मा कहते हैं कि इसे वैकुण्ठ में रखो। इतना कहकर वह पुनः आँख बंद कर सो जाते हैं। वैकुण्ठ में तो ऐश्वर्य है, जहाँ के प्रभु राजाधिराज हैं।

ब्रज में श्री कृष्ण किसी के बालक हैं, तो किसी के सखा हैं। श्री कृष्ण ने ब्रज में रहकर ब्रजवासियों को जो आनन्द दिया है, वह वैकुण्ठ में भी नहीं है।

क्या कोई वैकुण्ठ में नारायण से कहने की हिम्मत कर सकता है कि मेरा यह काम करो। कन्हैया ब्रज में यदि किसी के घर जाता है तो वह उनसे कहता है, “क्या मक्खन ले आऊं। यदि तुम्हें मक्खन खाना हो, तो मेरा थोड़ा सा काम करो। यह सुनकर कन्हैया कहता है कि तेरा क्या काम करना है ? गोपी कहती हैं,’मेरा वह पीढ़ा (पाटला) ले आओ।”

जहाँ प्रेम होता है वहाँ संकोच नहीं होता। यह तो शुद्ध प्रेम-लीला है। कन्हैया पीढ़ा उठाता तो है, किन्तु भारी होने के कारण उसे उठा नहीं पाता। कन्हैया अत्यंत कोमल शरीर का है।

यूँ तो उसने अपनी तर्जनी ऊँगली पर गोवर्धन को उठा लिया था फिर भी उसे मक्खन का लालच है वह पीढ़ा उठाता तो है, किन्तु वह भारी होने के कारण रास्ते में उसके हाथ से छुट जाता है।

और उसका पीताम्बर भी खुल जाता है। वेदांत में लिखा है कि ज्ञानी पुरुष को ब्रह्म-साक्षात्कार होता है।

फिर भी ज्ञानी पुरुष जब तक पंचभौतिक शरीर में होता है, तब तक माया का थोड़ा पर्दा होता ही है। उसे प्रारब्ध का कुछ भोग भोगना ही पड़ता है।

माया यदि थोड़ी भी बाकी होती है, तो भी प्रारब्ध भोगना ही पड़ता है। गोपियाँ निरावरण परमात्मा के दर्शन करती हैं। जहाँ अतिशय प्रेम होता है वहाँ पर्दा हट जाता है।

पीढ़ा गिरते ही कन्हैया रोने लगता है। गोपी दोड़कर आती है और कहती है, अरे! तुझे क्या हो गया ? क्या कुछ चोट लग गई ?

कन्हैया कहता है,”चोट तो नहीं लगी, किन्तु मेरा पीताम्बर खुल गया है। गोपी लाला को पीताम्बर पहनाती है। जहाँ ऐश्वर्य होता है, वहाँ पर्दा होता है। प्रेम में पर्दा नहीं होता। कृष्ण ने गोपियों को जो आनन्द दिया वह भला वैकुण्ठ में कहाँ मिल सकता है ?

वैकुण्ठ में नन्द महोत्सव नहीं होता, वहाँ नारायण का जन्म ही नहीं होता, नन्द महोत्सव की बात कैसे उपस्थित हो ?

भगवान लक्ष्मीजी को अपने हृदय में रखते है। क्योंकि लक्ष्मी जी उन्हें अतिशय प्रिय हैं। एक कारण यह भी है कि यदि कोई जीव ईश्वर की बहुत भक्ति करता है तो उस पर कृपा दिखाने के लिए भगवान लक्ष्मी जी से कहते हैँ। लक्ष्मी जी की एक बार कृपा हो जाय तो जीव उस आश्चर्य में चकमका उठता है।

जीव को मान सम्मान का मोह उठता है। थोड़ा मोह होते ही जीव ईश्वर से दूर हो जाता है। ईश्वर जीव की अच्छी तरहां परीक्षा करने के बाद ही उसे वैकुण्ठ में स्थान देते हैं। इसीलिए उन्होंने अपने हृदय में लक्ष्मी जी को स्थान दे रखा है।

लक्ष्मी जी ने परमात्मा से कहा, “आप मुझे अपने ह्रदय में रखते हैं, किन्तु मुझे तो आपके चरणों की सेवा ही करनी है।”

परमात्मा के चरणों में अलौकिक दिव्य रस है। कुछ महापुरुषों को मुक्ति की उपेक्षा भगवान के चरणों में पड़ा रहना खूब भाता है। यह दास्य भक्ति है।

लाला को एकबार मन में यह विचार आया कि लोगों को मेरे चरणों में क्या विशेषता दिखायी देती है? वे क्यों मुक्ति को तुच्छ समझते हैं और मेरे चरणों में पड़े रहना पसंद करते हैं ?

मेरे चरणों में आखिर ऐसा क्या है ? और इतना सोच कर वे अपना चरण उठाकर मुंह में डालते हैं। और यह ही नहीं ब्रज में आकर स्वयं अखिलेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने माखन मिश्री छोड़ के ब्रज रज को खाया है!

वैकुण्ठ तो स्तव-प्रधान भूमि है। वहाँ रज नहीं है! जहाँ रजोगुण न हो, वहाँ भला रज कहाँ मिलेगी ? लक्ष्मी जी को भगवानजी के चरण रज लेने कि इच्छा है। इसलिए वे एकबार ब्रज में आती है “ब्रज प्यारा है, वैकुण्ठ न आऊं।”

गोपी कहती हैं, “सब वैकुण्ठ में लक्ष्मी जी की सेवा करते हैं। वे ही लक्ष्मी जी ब्रज में दासी बनकर सेवा करती हैं। ब्रज के वृक्षों- पत्तों में लक्ष्मी जी का प्रवेश होता है। वैकुण्ठ से भी ब्रज श्रेष्ठ है।

जय श्रीराधे मेरे गोविंद….
प्यारे श्री गोपिकावल्लभ भगवान की जय

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Quote of the week

“Every sunset is an opportunity to reset. Every sunrise begins with new eyes.”

~ Richie Norton