*🌞~ आज का हिन्दू पंचांग ~🌞*
*⛅दिनांक – 05 सितम्बर 2025*
*⛅दिन – शुक्रवार*
*⛅विक्रम संवत् – 2082*
*⛅अयन – दक्षिणायण*
*⛅ऋतु – शरद*
*⛅मास – भाद्रपद*
*⛅पक्ष – शुक्ल*
*⛅तिथि – त्रयोदशी रात्रि 03:12 सितम्बर 06 तक तत्पश्चात् चतुर्दशी*
*⛅नक्षत्र – श्रवण रात्रि 11:38 तक तत्पश्चात् धनिष्ठा*
*⛅योग – शोभन दोपहर 01:53 तक तत्पश्चात अतिगण्ड*
*⛅राहुकाल – सुबह 11:04 से दोपहर 12:38 तक (अहमदाबाद मानक समयानुसार)*
*⛅सूर्योदय – 06:23*
*⛅सूर्यास्त – 06:53 (सूर्योदय एवं सूर्यास्त अहमदाबाद मानक समयानुसार)*
*⛅दिशा शूल – पश्चिम दिशा में*
*⛅ब्रह्ममुहूर्त – प्रातः 04:51 से प्रातः 05:37 तक (अहमदाबाद मानक समयानुसार)*
*⛅अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:13 से दोपहर 01:03*
*⛅निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:15 सितम्बर 06 से रात्रि 01:01 सितम्बर 06 तक (अहमदाबाद मानक समयानुसार)*
*⛅️व्रत पर्व विवरण – ओणम, शिक्षक दिवस, ईद-ए-मिलाद, प्रदोष व्रत, सर्वार्थसिद्धि योग (प्रातः 06:23 से रात्रि 11:38 तक)*
*⛅️विशेष – त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंड: 27.29-34)*
*🔹तुलसी द्वारा सद्गति🔹*
*🔸जिसकी मृत्यु के समय श्रीहरि का कीर्तन और स्मरण हो तथा तुलसी की लकड़ी से जिसके शरीर का दाह किया जाय, उसका पुनर्जन्म नहीं होता । जो चोटी में तुलसी स्थापित करके प्राणों का परित्याग करता है, वह पापराशि से मुक्त हो जाता है । जो मृत पुरुष के सम्पूर्ण अंगों में तुलसी का काष्ठ देने के बाद उसका दाह-संस्कार करता है, वह भी पाप से मुक्त हो जाता है । (पद्म पुराण)*
*🔸मुख में, पेट एवं सिर पर यथायोग्य तुलसी – लकड़ी का उपयोग करें ।*
*🔸अग्निसंस्कार में तुलसी की लकड़ी का प्रयोग करने से मृतक की सदगति सुनिश्चित है ।*
*🔹तुलसी के औषधीय गुण 🔹*
*🔸इसके सेवन से विटामिन ʹएʹ तथा ʹसीʹ की कमी दूर हो जाती है । खसरा निवारण के लिए यह रामबाण इलाज है ।*
*🔸किसी भी प्रकार के विषविकार में तुलसी का स्वरस यथेष्ट मात्रा में पीना चाहिए ।*
*🔸20 तुलसी पत्र एवं 10 कालीमिर्च एक साथ पीसकर हर आधे से दो घंटे के अंतर से बार-बार पिलाने से सर्पविष उतर जाता है । तुलसी का रस लगाने से जहरीले कीड़े, ततैया, मच्छर का विष उतर जाता है ।*
*🔸तुलसी के स्वरस का पान करने से प्रसव-वेदना कम होती है ।*
*🔸स्वप्नदोष : 10 ग्राम तुलसी के बीज मिट्टी के पात्र में रात को पानी में भिगो दें व सुबह सेवन करें। इससे लाभ होता है ।*
*🔸तुलसी के बीजों को कूटकर व गुड़ में मिलाकर मटर के बराबर गोलियाँ बना लें । प्रतिदिन सुबह शाम दो-दो गोली खाकर ऊपर से गाय का दूध पीने से नपुंसकत्व दूर होता है, वीर्य में वृद्धि होती है, नसों में शक्ति आती है, पाचन शक्ति में सुधार होता है । हर प्रकार से हताश पुरुष भी सशक्त बन जाता है ।*
*🔸जल जाने पर : तुलसी के स्वरस व नारियल के तेल को उबालकर, ठण्डा होने पर जले भाग पर लगायें । इससे जलन शांत होती है तथा फफोले व घाव शीघ्र मिट जाते हैं ।*
*🔸विद्युत का झटका : विद्युत के तार का स्पर्श हो जाने या वर्षा ऋतु में बिजली गिरने के कारण यदि झटका लगा हो तो रोगी के चेहरे और माथे पर तुलसी का स्वरस मलें । इससे रोगी की मूर्च्छा दूर हो जाती है ।*
*🔸जलशुद्धि : दूषित जल की शुद्धि के लिए जल में तुलसी की हरी पत्तियाँ डालें । इससे जल शुद्ध व पवित्र हो जाएगा ।*
भगवान विष्णु के चरणों का महत्व
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किसी ने सही ही कहा है कि भगवान के पांव में स्वर्ग होता है। उनके चरणों जैसी पवित्र जगह और कोई नहीं है। इसलिए तो लोग भगवान के चरणों का स्पर्श पाकर अपने जीवन को सफल बनाने की होड़ में लगे रहते हैं।लेकिन भगवान के चरणों का इतना महत्व क्यों है क्या कभी आपने जाना है?
भगवान के चरणरज की ऐसी महिमा है कि यदि इस मानव शरीर में त्रिभुवन के स्वामी भगवान विष्णु के चरणारविन्दों की धूलि लिपटी हो तो इसमें अगरू, चंदन या अन्य कोई सुगन्ध लगाने की जरूरत नहीं, भगवान के भक्तों की कीर्तिरूपी सुगन्ध तो स्वयं ही सर्वत्र फैल जाती है।
संसार के पालहार व परम दयालु भगवान विष्णु सबमें व्याप्त हैं। शेषनाग की शय्या पर शयन कपने वाले व शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाले भगवान विष्णु के चरण-कमल भूदेवी (भूमि) और श्रीदेवी (लक्ष्मी) के हृदय-मंदिर में हमेशा विराजित रहते हैं। भगवान के चरणों से निकली गंगा का जल दिन-रात लोगों के पापों को धोता रहता है।
भगवान के चरणरज की ऐसी महिमा है कि यदि इस मानव शरीर में त्रिभुवन के स्वामी भगवान विष्णु के चरणारविन्दों की धूलि लिपटी हो तो इसमें अगरू, चंदन या अन्य कोई सुगंध लगाने की जरूरत नहीं, भगवान के भक्तों की कीर्तिरूपी सुगन्ध तो स्वयं ही सर्वत्र फैल जाती है। जो मनुष्य नित्य-निरन्तर उनके चरण-कमलों की दिव्य गंध का सेवन करता है भगवान विष्णु उनके हृदयकमल में अपने चरण कमलों की स्थापना करके स्वयं भी उनके अंत:करण में निवास करने लगते हैं। भगवान के चरण-कमलों के प्रताप से ही उनके सेवकों का मन भटकता नहीं है, उनके मन की चंचलता मिट जाती है और पापों का नांश हो जाता है।
भगवान के चरणों में👉 शंख का चिह्न है। शंख भगवान का विशेष आयुध है। यह सदा विष्णु भगवान के हाथ में रहता है। शंख विजय का प्रतीक है। जिस मनुष्य के हृदय में भगवान के चरण रहते हैं, वह सब पर विजयी हो जाता है। उसके सारे विरोधी-भाव शंखध्वनि से नष्ट हो जाते हैं।
भगवान के चरणों में👉 ऊर्ध्वरेखा का चिह्न है। सामुद्रिक विज्ञान के अनुसार जिसके चरण में ऊर्ध्वरेखा होती है, वह सदैव ऊंचे की ओर बढ़ता जाता है। जो मनुष्य अपने हृदय में भगवान के चरणों का ध्यान करता है, उसकी गति और दृष्टि ऊर्ध्व हो जाती है, वह सीधे ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।
भगवान विष्णु के चरणों में👉 राजा बलि का चिह्न है। भगवान राजा बलि को ठगने गए थे परंतु अपने-आप को ठगा आए और उन्हें सदैव राजा बलि के द्वार पर पहरेदार बन कर रहना पड़ता है। भगवान ने बलि के मस्तक पर देवताओं के लिए भी दुर्लभ अपने चरण रखे और चरणों में ही बलि को स्वीकार कर लिया। राजा बलि का शरीर भगवान के चरणों में अंकित हो गया, इससे बढ़कर सौभाग्य की बात क्या हो सकती है ? राजा बलि को पहले राज-मद था। प्रह्लादजी ने जो कि उनके पितामह थे, उनको समझाया पर बलि नहीं माने। प्रह्लादजी ने देखा कि बीमारी बढ़ गयी है तो भगवान का स्मरण किया। भगवान ने वामन रूप में आकर बलि के संपूर्ण राज्य के साथ शरीर तक को नाप लिया। राजा बलि ने जब राजत्व का साज हटाकर मस्तक झुकाया, तब प्रभु ने उसके आंगन में खड़े रहना अंगीकार किया। यह मानभंग, ऐश्वर्यनाश आदि भगवान की बड़ी कृपा से होता है। जैसा रोग होता है, भगवान वैसी ही दवा देते हैं। बलि का सब कुछ हर लिया पर सुदामा को सबकुछ दे दिया। जो मनुष्य सब प्रकार से अपने को भगवान के चरणों में समर्पण कर देता है, उसके पास भगवान सदा के लिए बस जाते हैं।
भगवान के चरणों में👉 दर्पण का चिह्न है। दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखता है, उसी तरह यह जगत भगवान का प्रतिबिम्ब है ‘वासुदेव सर्वम्’, सब कुछ, सब जगह भगवान-ही-भगवान हैं। किसी भी छवि को दर्पण रखता नहीं है वरन् छवि की शोभा को बढ़ाकर देखने वाले को आनन्द प्रदान करता है। भगवान के चरणों में प्रेम रखकर जो भगवान को सुखी करना चाहते हैं, भगवान भी उनकी पूजा स्वीकार कर उन्हें कोटिगुना प्रेम और आनंद लौटाकर सुखी करते हैं। इसके अतिरिक्त दर्पण के सामने जो जैसा जाता है, दर्पण उसे वैसा ही रूप लौटा देता है। भगवान के चरणों में जो जिस भाव से जाएगा, भगवान उसका वह भाव उसी रूप में प्रदान करेंगे। गीता में भगवान ने कहा है—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।’ ‘जो जिस भाव से मुझे भजता है, मैं भी उन्हें उसी तरह भजता हूँ।’
भगवान के चरणों में👉 सुमेरुपर्वत का चिह्न है। सुमेरु का अर्थ है—जिसका मेरु सुंदर हो। सुमेरु को सोने का पहाड़ भी कहते हैं। इस सुमेरु को कुछ लोग ‘गोवर्धन’ कहते हैं जिसे भगवान ने अपनी कनिष्ठा उंगली के नख पर उठाया था। भगवान ने उसे सदा के लिए अपने चरणों में बसा लिया है। सुमेरु के बिना किसी वस्तु की स्थिति नहीं । सूर्य भी सुमेरु पर उगते हैं। इसलिए सुमेरु रात-दिन की संधि है। जपमाला में भी सुमेरु होता है। सुमेरु माला को व्यवस्था में रखने वाला केंद्र है। स्वर्णमय सुमेरुके अंदर अनन्त धन राशि छिपी है। जिसे भगवान के चरण प्राप्त हो जाते हैं, उसे संसार का सबसे बड़ा धन प्राप्त हो जाती है। उसकी जीवनमाला व्यवस्थित हो जाती है। वह जीवन-मृत्यु की संधि को समझ जाता है।
भगवान के चरणों में👉 घंटिका का चिह्न है। यह भगवान की विशेष प्रिय वस्तु है। पूजा में यह अत्यंत आवश्यक है। भगवान की करधनी में छोटी-छोटी घंटी लगी रहती है, नूपुर के साथ यह भी बजती है। इसका तांत्रिक अर्थ भी है।अनहद नाद में दस प्रकार के स्वर होते हैं। इसमें तीसरा स्वर घंटिका का होता है। घंटी ‘क्लीं क्लीं क्लीं’ का उच्चारण करती है। यही श्रीकृष्ण का महाबीज—प्रेम बीज मंत्र है। यह बीज घंटिका के रूप में आया है इसलिए पूजा का प्रधान उपकरण है; इसलिए भगवान के चरणों में इसे स्थान प्राप्त है।
भगवान के चरणों में👉 वीणा का चिह्न है। वीणा भगवान को विशेष प्रिय है, जिसे भगवान ने नारदजी को प्रदान किया था। वाद्यों में सबसे प्राचीन वीणा है। वीणा में सारे स्वर एक साथ हैं। यह आदि वाद्य है। गायन की विभूति रूप में इसे भगवान के चरणों मे स्थान मिला है। वीणा भगवान का नाम गाती है। जिसके हृदय में भगवान के चरण हैं उसे सदैव सब जगह वीणा का स्वर सुनाई देता
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥4॥
भावार्थ:👉 मुनि ने (इस प्रकार) विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा- हे नाथ! मेरी बुद्धि आपके चरण कमलों को कभी न छोड़े॥
अर्थात्👉 मैं भगवान के परम पवित्र चरण-कमलों की वंदना करता हूँ जिनकी ब्रह्मा, शिव, देव, ऋषि, मुनि आदि वंदना करते रहते हैं और जिनका ध्यान करने मात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
जिस प्रकार धनलोलुप मनुष्य के मन में सदैव धन बसता है वैसे ही हे प्रभु ! मेरे मन में सदैव आपके चरण-कमल का वास हो।
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पितृ पक्ष [ श्राद्ध करने की विधि ]
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पितृलोक से पृथ्वी लोक पर पितरो के आने का मुख्य कारण उनकी पुत्र-पौत्रादि से आशा होती है की वे उन्हें अपनी यथासंभव शक्ति के अनुसार पिंडदान प्रदान करे अतएवं प्रत्येक सद्गृहस्थ का धर्म है कि स्पष्ट तिथि के अनुसार श्राद्ध अवस्य करे यदि पित्र पक्ष मे परिजनों का श्राद्ध नहीं किया गया तो वे श्राप दे देते हैं और ये परिवार के सदस्यों पर अपना प्रभाव छोड़ सकता है जिससे हानि होनी ही होनी है। अतः इस पक्ष में श्राद्ध अवश्य किया जाना चाहिये।
श्राद्ध में पंचबली की महता:
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पित्र पक्ष में ब्राह्मण भोजन और जलमिश्रित तिल से तर्पण करने जितना ही अनिवार्य पञ्चबलि भी है पञ्चबलि का नियम कुछ इस प्रकार है।
एक थाली के पांच भिन्न भिन्न भाग करके थोड़े थोड़े सभी प्रकार के भोजन को परोसकर हाथ मे तिल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प करते समय निम्न का उचारण करे: अद्यामुक गोत्र अमुक शर्माहं/बर्माहं/गुप्तोहं/दासोहं अमुकगोत्रस्य मम पितुः/मातु आदि वार्षिकश्राद्धे (महालयश्राद्धे) कृतस्य पाकस्य शुद्ध्यर्थं पंचसूनाजनितदोषपरिहारार्थं च पंचबलिदानं करिष्ये।
पंचबलि-विधि इस प्रकार है:
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1] गोबलि [ पत्ते पर ]
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ऊँ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः।
प्रतिगृह्वन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः।।
इदं गोभ्यो न मम।
इस श्लोक का उचारण पश्चिम दिशा की और पुष्प और पते को दिखाकर करे। पंचबली का एक निहित भाग गाय को खिलायें।
2] श्वानबलि [ पत्ते पर ]
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द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोöवौ।
ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ।।
इदं श्वभ्यां न मम।
इस श्लोक का उचारण कुत्तों को बलि देने के लिए करे। इस पंचबलि के समय कान मे जनेऊ डालना अनिवार्य है।
3] काकबलि [ पृथ्वी पर ]
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ऊँ ऐन्द्रवारूणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्वन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।। इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।
इस श्लोक का उचारण कौओं को भूमि पर अन्न देने के लिए करे। पंचबली का एक निहित भाग कौओं के लिये छत पर रख दें।
4] देवादिबलि [ पत्ते पर ]
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ऊँ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः।
प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्।।
इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।
इस श्लोक का उचारण देवता आदि के लिय अन्न देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग अग्नि के सपुर्द कर दें।
5] पिपीलिकादिबलि [ पत्ते पर ]
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पिलीलिकाः कीटपतंगकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।। इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।
इस श्लोक का उचारण चींटी आदि को बलि देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग चींटीयों के लिये रख दें पंचबलि देने के बाद एक थाल मे खाना परोसक निम्न मंत्र का उचारण कर ब्राह्मणों के पैर धोकर सभी व्यंजनों का भोजन करायें।
यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे।
तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पादसेचने।।
इसे बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करें। तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें
यजमान :– शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। (श्राद्ध में बचे अन्न का क्या करूँ?)
ब्राह्मण :– इष्टैः सह भोक्तव्यम्। (अपने इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करें।) इसके बाद अपने परिवार वालों के साथ स्वयं भी भोजन करें तथा निम्न मंत्र द्वारा भगवान् को नमस्कार करें।
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः।
श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई बार विधि पूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं।
श्राद्धकर्म के नियम
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1] श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
2] श्राद्ध में चांदी के बर्तन का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।
3] श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए गए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।
4] ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं, जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।
5] जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।
6] श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।
7] श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।
8] दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।
9] चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।
10] जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।
11] श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।
12] शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।
13] श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।
14] रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।
15] श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोना, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।
16] तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।
17] रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।
18] चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।
19] भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ।
20] श्राद्ध के प्रमुख अंग
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तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।
भोजन व पिण्ड दान:– पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।
वस्त्रदान:– वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।
दक्षिणा दान:– यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।
21] श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।
22] पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।
23] तैयार भोजन में से गाय, कुत्ता कौआ, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।
24] कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।
25] ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।
26] पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करें या सबसे छोटा।
भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि, पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं, और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस-पास रहते हैं, इसलिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें, जिससे पितृगण नाराज हों। पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण, जामाता, भांजा, गुरु या नाती को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए, अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं, जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं। पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए।
सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं, जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा:– इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।
पंचमी:– जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।
नवमी:– सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि, इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।
एकादशी और द्वादशी:– एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।
चतुर्दशी:– इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है, जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।
सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या:– किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं, या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए, यही उचित भी है।
पिंडदान करने के लिए:– सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।
विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है।
देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।। (वायु पुराण)
श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊधर्व कक्षा में पितृलोक है, जहां पितृ रहते हैं। पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है, उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संधान से बना है। स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है।
सनातन मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास भ्रमण करता रहता है। श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है, इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी के कुंडली में पितृदोष है, और वह इस श्राद्ध पक्ष में अपनी कुंडली के अनुसार उचित निवारण करते हैं तो, जीवन की बहुत सी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। योग्य ब्राह्मण द्वारा ही श्राद्ध कर्म पूर्ण करवाये जाने चाहिएं।
ऐसा कुछ भी नहीं है कि, इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है, वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। वास्तव में श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर, उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है, जिस योनि में वह प्राणी इस समय है।
पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत भाग को प्राप्त करता है। यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया हो तो, श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। गंधर्व बन गया हो तो, वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करता है। यदि नाग योनि में है तो, श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ति देता है। दानव, प्रेत व यक्ष योनि मिलने पर श्राद्ध का अन्न नाना प्रकार के अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करता है। अगर किसी की जन्मकुंडली में पितृदोष है तो, जन्म कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें।
*आज का राशिफल*
*🐐🐂💏💮🐅👩*
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*मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)*
*आज का दिन आपके लिए बाकी दिनों की तुलना में ठीक-ठाक रहने वाला है। दोस्तों का आपको पूरा सहयोग मिलेगा। आप अपनी डेली रूटीन को बेहतर करने की कोशिश करें। परिवार में किसी नए मेहमान का आगमन होने से माहौल खुशनुमा रहेगा। आपको अपने आसपास रह रहे विरोधियों की चालों को समझने की कोशिश करें। आपको किसी विपरीत परिस्थिति में भी थोड़ा धैर्य बनाए रखना होगा। आपकी कोई मन की इच्छा पूरी हो सकती है।*
*वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)*
*आज आपको धन संबंधित समस्याओं को लेकर अपने किसी सहयोगी से मदद लेनी पड़ सकती है। माता-पिता के आशीर्वाद से आपका कोई रुका हुआ काम पूरा होगा और आपके व्यक्तित्व में भी निखार आएगा। आप किसी कानूनी मामले से दूर ही रहें, तो आपके लिए बेहतर रहेगा। बैंकिंग क्षेत्रों में कार्यरत लोग किसी अच्छी स्कीम में इन्वेस्टमेंट कर सकते हैं, जो आपके लिए अच्छी रहेगी। आपके पिताजी आपको कोई जिम्मेदारी देंगे, जिसमें आपको ढील देने से बचना होगा।*
*मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)*
*व्यवसाय में आज आपको अच्छी सफलता मिलेगी। दोस्तों के साथ आपको कुछ समय बिताने का मौका मिलेगा। आपकी कोई पुरानी बीमारी बढ़ेगी, जो आपकी टेंशनों को बढ़ाएगी। दोस्तों के साथ आप काफी समय व्यतीत करेंगे। आपको कामों को लेकर व्यस्तता बढ़ सकती है, जो आपकी समस्याओं को भी बढ़ाएगी। आपको किसी नौकरी से संबंधित काम को लेकर कहीं बाहर जाने का मौका मिल सकता है।*
*कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)*
*आज का दिन आपके लिए वाणी और व्यवहार पर संयम बनाए रखने के लिए रहेगा। आज आप अपने जीवनसाथी को आप कहीं घूमाने फिराने लेकर जा सकते हैं। आपको किसी पुराने मित्र से लंबे समय बाद मिलकर खुशी होगी। संतान आपकी उम्मीदों पर खरी उतरेगी। कुछ पारिवारिक समस्याओं को लेकर आप परेशान रहेंगे। आपके कामों से आज आपकी एक नई पहचान मिलेगी। ऑनलाइन व्यवसाय कर रहे लोगों को थोड़ा सावधान रहना होगा।*
*सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)*
*आज का दिन आपके लिए सामान्य रहने वाला है। घरेलू मामलों को आप मिल बैठकर निपटाएं। आपको किसी परीक्षा की तैयारी में जमकर मेहनत करनी होंगी। आपके घर किसी अतिथि का आगमन होने से माहौल खुशनुमा रहेगा। आप अपने खर्चों को कंट्रोल करने की कोशिश में लगे रहेंगे। ऑफिस में आपको प्रमोशन आदि मिलने से आपका मन काफी खुश रहेगा। आप अपने घर किसी पूजा-पाठ का आयोजन कर सकते हैं। खर्चो को लेकर आप योजना बनाकर चलें।*
*कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)*
*आज का दिन आपके लिए आय को बढ़ाने वाला रहेगा। नौकरी में आपके बॉस आपसे काफी खुश रहेंगे और आपकी कुछ खास लोगों से मुलाकात होगी। आपको कोई जरूरी जानकारी शेयर करने से आपका मन परेशान रहेगा। आपको किसी विरोधी की बातों में आने से बचना होगा। आप अपने कामों को समय से निपटाएं, तो आपके अच्छा रहेगा। जो विद्यार्थी विदेश जाने की योजना बना रहे थे, उन्हें किसी अच्छी स्कीम का पता चल सकता है।*
*तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)*
*आज आपको अपने काम को लेकर किसी दूसरे पर डिपेंड नहीं रहना है और यदि आप किसी दूसरे के मामले में बोले, तो वह आपकी मुश्किलों को बढ़ा सकते हैं। आर्थिक तंगी आपको परेशान करेगी। आप नौकरी के साथ-साथ कोई साइड बिजनेस भी शुरू करने की सोच सकते हैं। आप किसी यात्रा पर जाएंगे, तो वहां आपको थोड़ा ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि आपके किसी समान के चोरी होने की संभावना है। आप अपने पिताजी से किसी बात को लेकर नाराज हो सकते हैं।*
*वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)*
*आज का दिन आपके लिए मिलाजुला रहने वाला है। व्यापार में भी आप किसी समस्या को लेकर थोड़ा टेंशन में आ सकते हैं। विद्यार्थियों को पढ़ाई-लिखाई में ढील देने से बचना होगा। आपकी माताजी के सेहत में गिरावट आने से टेंशन अधिक रहेगी और आपका कोई काम पूरा होते-होते रह सकता है, जो आपकी मुश्किलों को भी बढ़ा सकती है। आप अपनी सेहत में यदि कोई समस्या महसूस करें, तो उसके लिए आप किसी अच्छे डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।*
*धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)*
*आज का दिन आपके लिए ठीक-ठाक रहने वाला है। कार्यक्षेत्र में आपको व्यस्तता बनी रहेगी। आप अपने कामों को किसी दूसरे पर ना डालें। प्रेम जीवन जी रहे लोगों में किसी काम को लेकर व्यस्तता बनी रहेगी। छोटे बच्चे आपसे किसी चीज की फरमाइश कर सकते हैं। आपका कोई पुराना लेनदेन यदि आपको समस्या दे रहा था, तो वह भी दूर होगा। नौकरी में कार्यरत लोगों को अपने कामों से अच्छी सफलता मिलेगी। संतान पक्ष की ओर से आपको कोई खुशखबरी सुनने को मिल सकती है।*
*मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)*
*आज का दिन आपके लिए सुखमय रहने वाला है। आपकी कुछ प्रभावशाली लोगों से मुलाकात होगी। माता-पिता की ओर से आपको कोई पैतृक संपत्ति मिलने से आपका मन काफी खुश रहेगा। आप अपनी इन्कम को बढ़ाने की कोशिश में लगे रहेंगे, जिसके लिए आप कोई इन्वेस्टमेंट भी कर सकते हैं। यदि आप किसी घर आदि की खरीदारी की योजना बना रहे थे, तो आपकी वह इच्छा भी पूरी होगी, जिसको लेकर आप कोई लोन भी अप्लाई कर सकते हैं।*
*कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)*
*आज का दिन आपके लिए आत्मविश्वास से भरपूर रहने वाला है। आप प्रत्येक कामों को करने के लिए तत्पर रहेंगे, जिससे आपकी व्यस्तता बढ़ेगी। विद्यार्थियों ने यदि किसी परीक्षा को दिया था, तो वह उसकी तैयारी में पूरी मेहनत से जुटेंगे। संतान आपकी उम्मीदों पर खरी उतरेगी। आप अपने किसी मित्र की मदद के लिए आगे आएंगे और बिजनेस में आप किसी काम को लेकर पार्टनरशिप कर सकते हैं, जो आपके लिए अच्छी रहेगी।*
*मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)*
*आज का दिन आपके लिए कुछ मुश्किलें लेकर आ सकता है। आपकी कुछ मुश्किले बढ़ सकती हैं। आपको किसी दूर रह रहे परिजन से कोई जरूरी जानकारी शेयर नहीं करनी है। व्यापार में चल रही समस्याओं से आपको काफी हद तक छुटकारा मिलेगा। आप मौज-मस्ती के मूड में ज्यादा रहेंगे। जीवनसाथी के साथ आपको कुछ समय बिताने से उनको बेहतर जानने का मौका मिलेगा। आपकी साख और सम्मान में वृद्धि होगी। आप राजनीति की ओर कदम बढ़ा सकते हैं।*

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