🙏🏻हर हर महादेव 🙏🏻
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
🌤️ *दिनांक – 30 दिसम्बर 2025*
🌤️ *दिन – मंगलवार*
🌤️ *विक्रम संवत 2082*
🌤️ *शक संवत -1947*
🌤️ *अयन – दक्षिणायन*
🌤️ *ऋतु – शिशिर ॠतु*
🌤️ *मास – पौष*
🌤️ *पक्ष – शुक्ल*
🌤️ *तिथि – दशमी सुबह 07:50 तक तत्पश्चात एकादशी*
🌤️ *नक्षत्र – भरणी 31 दिसंबर रात्रि 03:58 तक तत्पश्चात कृत्तिका*
🌤️ *योग – सिद्ध 31 दिसंबर रात्रि 01:02 तक तत्पश्चात साध्य*
🌤️ *राहुकाल – शाम 03:24 से शाम 04:46 तक*
🌤️ *सूर्योदय – 07:16*
🌤️ *सूर्यास्त – 06:05*
👉 *दिशाशूल – उत्तर दिशा मे*
🚩 *व्रत पर्व विवरण – पुत्रदा एकादशी,(स्मार्त), एकादशी क्षय तिथि*
💥 *विशेष –
🌞~*वैदिक पंचांग* ~🌞
🌷 *पुत्रदा एकादशी* 🌷
➡️ *30 दिसम्बर 2025 मंगलवार को सुबह 07:50 से 31 दिसम्बर प्रातः 05:00 तक एकदशी है।*
💥 *विशेष – 30 दिसम्बर 2025 मंगलवार को पुत्रदा एकादशी (स्मार्त) एवं 31 दिसम्बर 2025 बुधवार को पुत्रदा एकादशी (भागवत)*
👉🏻 *31 दिसम्बर 2025 बुधवार को एकादशी का व्रत (उपवास) रखे।*
🙏🏻 *निर्णयसिन्धु के प्रथम परिच्छेद में एकादशी के निर्णय में 18 भेद कहे गये हैं l*
🙏🏻 *कालहेमाद्रि में मार्कण्डेयजी ने कहा है – जब बहुत वाक्य के विरोध से यदि संदेह हो जाय तो एकादशी का उपवास द्वादशी को ग्रहण करे और त्रयोदशी में पारणा करे ।*
🙏🏻 *पद्म पुराण में आता है कि एकादशी व्रत के निर्णय में सब विवादों में द्वादशी को उपवास तथा त्रयोदशी में पारणा करे ।*
💥 *विशेष ~ अतः इस बार भी शास्त्र अनुसार 31 दिसम्बर को उपवास करें*।
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
🌷 *भक्ति बढाने हेतु* 🌷
👉🏻 *जिसको अपनी भक्ति बढानी है …. भगवद्गीता का १२वाँ अध्याय पढ़के, भगवद्गीता हाथ में ही रखकर भगवान को प्रार्थना करे: “हे भगवान! भगवद्गीता का १२वाँ अध्याय भक्तियोग नामक अध्याय है। जिसका मैंने आज पाठ किया है। ऐसी कृपा करना प्रभु कि मेरी भक्ति बढ़ जाये। बस मेरी भक्ति बढ़ जाये दाता !! ” दिल से प्रार्थना करोगे न तो सचमुच भगवान के वचन गीता में हैं। और १२वें अध्याय को भक्तियोग नामक अध्याय कहते हैं। वो पाठ करके प्रार्थना की तो भगवान की, गुरु की कृपा क्यों नहीं बरसेगी!! भक्ति बढ़ेगी और वो ही भक्ति सब सुखों की खान है।*
🙏🏻
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞

*सप्त प्रश्न (मानस प्रसंग) !!*
*कागभुशुंडि जी से गरुड़ सप्त (सात) प्रश्न पूछते हैं !!*
चौपाई
*पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ।*
*जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥*
*नाथ मोहि निज सेवक जानी।*
*सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥*
भावार्थ : पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखान (विस्तार) कर कहिए॥
*प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा।* *सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥*
*बड़ दुख कवन कवन सुख भारी।* *सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥*
भावार्थ : हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥
*संत असंत मरम तुम्ह जानहु।* *तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥*
*कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला।* *कहहु कवन अघ परम कराला॥*
भावार्थ : संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। फिर कहिए कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है॥
*मानस रोग कहहु समुझाई।*
*तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥*
काग भुशुंडि जी बोले..
*तात सुनहु सादर अति प्रीती।*
*मैं संछेप कहउँ यह नीती॥*
भावार्थ : फिर मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है। (काकभुशुण्डिजी ने कहा-) हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥
*नर तन सम नहिं कवनिउ देही।* *जीव चराचर जाचत तेही॥*
*नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी।*
*ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥*
भावार्थ : मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥
*सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर।* *होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥*
*काँच किरिच बदलें ते लेहीं।*
*कर ते डारि परस मनि देहीं॥*
भावार्थ : ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥
*नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं।* *संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥*
*पर उपकार बचन मन काया।*
*संत सहज सुभाउ खगराया॥*
भावार्थ : जगत् में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत् में सुख नहीं है। और हे पक्षीराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है॥
*संत सहहिं दुख पर हित लागी।* *पर दुख हेतु असंत अभागी॥*
*भूर्ज तरू सम संत कृपाला।*
*पर हित निति सह बिपति बिसाला॥*
भावार्थ : संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)॥
*सन इव खल पर बंधन करई।* *खाल कढ़ाई बिपति सहि मरई॥*
*खल बिनु स्वारथ पर अपकारी।* *अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥*
भावार्थ : किंतु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और (उन्हें बाँधने के लिए) अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं॥
*पर संपदा बिनासि नसाहीं।*
*जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥*
*दुष्ट उदय जग आरति हेतू।*
*जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥*
भावार्थ : वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति जगत के दुःख के लिए ही होता है॥
*संत उदय संतत सुखकारी।*
*बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥*
*परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा।*
*पर निंदा सम अघ न गरीसा॥*
भावार्थ : और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चंद्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिए सुखदायक है। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है॥
*सुनहु तात अब मानस रोगा।*
*जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥*
भावार्थ : हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥
*मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला।* *तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥*
*काम बात कफ लोभ अपारा।*
*क्रोध पित्त नित छाती जारा॥*
भावार्थ : सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥
*प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई।* *उपजइ सन्यपात दुखदाई॥*
*बिषय मनोरथ दुर्गम नाना।*
*ते सब सूल नाम को जाना॥*
भावार्थ : यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात् वे अपार हैं)॥
*ममता दादु कंडु इरषाई।*
*हरष बिषाद गरह बहुताई॥*
*पर सुख देखि जरनि सोइ छई।* *कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥*
भावार्थ : ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है॥
*अहंकार अति दुखद डमरुआ।* *दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥*
*तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी।* *त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी॥*
भावार्थ : अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदर वृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥
*जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका।* *कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका॥*
भावार्थ: मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ॥
दोहा
*एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।*
*पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥*
भावार्थ : एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करे ??
*जय श्री राम*
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श्री रामचरितमानस के सुंदरकांड का एक अनूठा प्रसंग !!!!!!

हनुमान जी की भूख इतनी प्रबल है कि जब वे अशोक वाटिका में श्री सीता जी के पास गए तब उन्होंने यह नही कहा कि मुझे भूख लगी है, अपितु कहा कि :
“सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।”
अति भूख भी नहीं, अपितु अतिसय भूख शब्द का प्रयोग किया । माँ ने पूछा, “यह भूख के साथ अतिशय का क्या अर्थ ?” तो हनुमान जी ने कहा, “माँ! सत्य तो यह है कि मैं जन्मजात भूखा हूँ।”
इस संदर्भ में बडी प्रसिद्ध कथा है, जब हनुमान जी का जन्म हुआ तो लाल लाल सूर्य दिखाई पडा और हनुमान जी ने उसको फल समझकर खा लिया। प्रश्न यह है कि क्या सचमुच हनुमानजी इतने नासमझ थे कि उन्होंने सूर्य को फल समझ लिया ? और जिस पर्वत पर हनुमान जी थे क्या उसके आसपास फलों के वृक्ष नहीं थे ?
यद्यपि पर्वत पर तो अनेकानेक फल युक्त वृक्ष थे और यदि उनका फल तोड़ना चाहते तो यह बात ठीक होती। पर इसके स्थान प्रेस सूर्य रूपी फल को खाने के लिए उन्हें कितनी लम्बी छलाँग क्यों लगाना पड़ी ? यदि विचार करके देखें तो हमें स्पष्ट प्रतीत होगा कि जिसने एक छलाँग लगाकर सूर्य को मुँह में धारण कर लिया हो वे हनुमान जी कितने विलक्षण हैं और उनकी भूख कोई साधारण नहीं है।
इतना ही नहीं फल खाने पर इंद्र ने वज्र से उन पर प्रहार भी कर दिया तथा हनुमान जी को मूर्छित होना पडा। पर जब बाद में पवन देवता के द्वारा प्राण-वायु की गति रुकने लगी तो फिर सारे देवताओं ने क्षमा-याचना की तथा हनुमान जी को वरदान दिये। हनुमानजी द्वारा इस प्रकार कार्य करने का तात्पर्य क्या है ? इस पर थोड़ा विचार कर लिया जाय।
वस्तुत: श्री हनुमानजी ने किसी भ्रम के कारण सूर्य को फल नहीं समझा था। ‘फल’ के बारे में हम पढ़ते ही हैं अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष से चार फल माने जाते हैं। हनुमानजी यदि चाहते तो उन्हें ‘अर्थ’ का फल उन्हें सरलता से प्राप्त हो जाता। काम तथा धर्म का फल भी वे प्राप्त कर लेते। परन्तु पास वाले फलों की ओर हनुमान जी मे हाथ नहीं बढ़ाया। इसका अर्थ है कि उन्हे ज्ञान की भूख है, प्रकाश की भूख है। संसार की वस्तुओं की भूख उनके जीवन में नहीं है। वे तो केवल चरम फल के लिए छलाँग लगाते हैं।
श्री हनुमानजी सचमुच छलाँग लगाना जानते हैं। उनकी प्रत्येक छलाँग अनोखी है। जब उनकी पहली छलाँग तो सूर्य तक पहुंच गए। दूसरी छलाँग लंका की दिशा में लगाई तो श्री सीताजी तक पहुंच गये। तीसरी छलॉंग में लक्ष्मण जी के लिए दवा लेने द्रोणाचल पर्वत पर पहुंच गए और चौथी छलॉंग लगी तो लंका से सीधे अयोध्या पहुंच गये।
हमारे लिए तो सीढी से चढ़ना ही उपादेय है। व्यक्ति यदि यह सोचे कि मुझे अर्थ, धर्म तथा काम का फल नहीं चाहिए, मुझे तो केवल मोक्ष चाहिये यह उचित नहीं हैं। साधारण व्यक्ति श्री हनुमान जी का अनुसरण करके छलाँग तो लगा दे, पर अगर छलॉंग सही न लगी तो वह नीचे भी गिर जाएगा।
इसलिये हनुमान जी की भूख मानें, “सुमति- छुधा” अर्थात् ज्ञान तथा प्रकाश की भूख।
हनुमान जीने सूर्य को मुख में धारण कर लिया इसका भी अर्थ दूसरा था। हमारे पुराणों में कथा आती है कि ठीक उसी समय सूर्य ग्रहण लगने वाला था। समय पाकर ग्रहण लगता है और सूर्य का प्रकाश छिप जाता है। इसका अर्थ है कि सूर्य के साथ भी राहु की समस्या है। यह राह मात्सर्य तथा ईर्ष्या वृत्ति का परिचायक है।
वर्णन आता है कि राहु का रंग है काला और सूर्य का उज्वल। राहु यह चेष्टा करता है कि भले ही हम ज्ञान (सूर्य) को सदा के लिए न मिटा सकें पर थोड़े समय के लिए इसे ग्रस कर अंधेरा तो अवश्य फैला सकते हैं।
हनुमान जी के जन्म के समय जब राहु सूर्य की ओर बढ रहा था उसी समय हनुमान जी छलाँग लगाकर पहुँचे और उन्होंने सूर्य को मुँह मे धारण कर लिया। लोगों को लगा कि उन्होंने सूर्य को खा लिया पर विवेकी व्यक्ति समझ गये कि खा नहीं लिया अपितु राहु के द्वारा खाए जाने से सूर्य को बचा लिया, क्योंकि हनुमान जी अगर मुख में न लेते तो राहु मुख में ले लेता।
श्री हनुमान जी ज्ञान का फल मुख में धारण करते हैं, इसका सीधा सा तात्पर्य है कि जब वेदमंत्रों तथा श्लोकों का पाठ किया जाएगा तो मुख से ही तो किया जाएगा। इसलिये कहा जा सकता है कि मुख का जितना बढ़िया उपयोग करना श्री हनुमान जी जानते हैं, दूसरा भला क्या जानेगा। जिन्होंने जन्म लेते ही सूर्य को मुख मे धारण कर लिया।
जब दूसरी छलाँग लगाने लगे तो उस समय भगवान श्रीराम ने मुद्रिका दी और प्रभु – मुद्रिका लेते ही :
“प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं”
उसे मुख में धारण कर लेते है। इसका अभिप्राय क्या है कि सूर्य को भी मुख में धारण करते हैं और ‘राम-नाम’ को भी मुख में धारण कर लेते है। तात्पर्य यह है कि हनुमान जी महाराज ज्ञान (सूर्य) और भक्ति (रामनाम अंकित मुद्रिका) दोनों को मुख मे धारण करते है। मुख का इससे अच्छा सदुपयोग और क्या हो सकता है।
🙏🏻🌷💐🌸🌼🌹🍀🌺💐🙏
जिनका आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं बधाई और शुभ आशीष
आपका जन्मदिन: 30 दिसंबर
अंक ज्योतिष के अनुसार आपका मूलांक तीन आता है। यह बृहस्पति का प्रतिनिधि अंक है। आप दार्शनिक स्वभाव के होने के बावजूद एक विशेष प्रकार की स्फूर्ति रखते हैं। आपकी शिक्षा के क्षेत्र में पकड़ मजबूत होगी। आप एक सामाजिक प्राणी हैं। ऐसे व्यक्ति निष्कपट, दयालु एवं उच्च तार्किक क्षमता वाले होते हैं। आप सदैव परिपूर्णता या कहें कि परफेक्शन की तलाश में रहते हैं यही वजह है कि अकसर अव्यवस्थाओं के कारण तनाव में रहते हैं। अनुशासनप्रिय होने के कारण कभी-कभी आप तानाशाह भी बन जाते हैं।
आपके लिए खास
शुभ दिनांक : 3, 12, 21, 30
शुभ अंक : 1, 3, 6, 7, 9,
शुभ वर्ष : 2028, 2030, 2031, 2034, 2043, 2049, 2052,
ईष्टदेव : देवी सरस्वती, देवगुरु बृहस्पति, भगवान विष्णु
शुभ रंग : पीला, सुनहरा और गुलाबी
आपकी जन्मतिथि के अनुसार भविष्यफल
कारोबार: नवीन व्यापार की योजना भी बन सकती है। आपके लिए यह वर्ष सुखद है। किसी विशेष परीक्षा में सफलता मिल सकती है। नौकरीपेशा के लिए प्रतिभा के बल पर उत्तम सफलता का है। शत्रु वर्ग प्रभावहीन होंगे।
परिवार: दांपत्य जीवन में सुखद स्थिति रहेगी। घर या परिवार में शुभ कार्य होंगे। मित्र वर्ग का सहयोग सुखद रहेगा।
यात्रा योग: महत्वपूर्ण कार्य से यात्रा के योग भी है।
🙏🏻हर हर महादेव 🙏🏻
🌹आज का राशिफल 🌹
*दिनांक : 30 दिसम्बर 2025*
मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
आज के दिन आप ज्यादा मेहनत करने के मूड में नहीं रहेंगे परन्तु पुराने कार्यो अथवा कार्य क्षेत्र पर व्यवस्था बनाने में काफी परिश्रम करना पड़ेगा। मन में यात्रा के विचार दुविधा में डालेंगे। कार्य क्षेत्र पर किसी की लापरवाही के कारण नोंकझोंक हो सकती है। धन के अपव्यय करने से बाद में परेशानी उठानी पड़ेगी। लोग आज स्वार्थ सिद्धि के कारण आपकी गलतियों को भी नजर अंदाज करेंगे। धन लाभ होते होते किसी विघ्न आने से टल सकता है। परिवारक उलझने प्रयास करने पर भी यथावत रहेंगी। जल्दबाजी में किया गया कार्य बिगड़ सकता है धैर्य रखें।
वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
आपका आज का दिन अशुभ फलदायी रहेगा आज प्रातः काल में किसी परिजन से तकरार होने के कारण दिन भर मन खिन्न रहेगा। आलस्य एवं शिथिलता के कारण कार्य के प्रति उत्साह नहीं रहेगा। किसी अरिष्ट की चिंता सताएगी। शेयर सट्टे में भारी हानि के योग है अनुभवी की सलाह लेकर ही निवेश करें। उधारी वाले व्यवहार परेशान करेंगे। संध्या के समय स्थिति में सुधार आने से कुछ राहत मिलेगी। किसी महिला के द्वारा भाग्योदय होगा। दिन भर की क्रियाएं शुभ फल देने लगेंगी। धर्म-कर्म के गूढ़ रहस्यों को।जानने का सौभाग्य मिलेगा।
मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)
आज का दिन आपके लिए आनंददायक रहेगा। आज दिन भर शारीरिक रूप से चुस्त बने रहेंगे। कार्य क्षेत्र पर आपके कार्यों की प्रशंसा होगी। सरकारी कार्यों में सफलता मिलेगी सामाजिक मान-सम्मान मिलेगा। किसी स्वजन के सहयोग से कर्ज से मुक्ति मिलेगी। विरोधी आज शांत रहेंगे। परिजनों के साथ धार्मिक यात्रा के योग है। संतान से सुख-सहयोग मिलेगा। फिर भी सरकार विरोधी अथवा अनैतिक क्रियाओं से दूरी बना कर रहें विरोधी आपकी गलती खोजने के लिए आतुर रहेंगे। आय-व्यय में संतुलन नहीं रहने से आर्थिक समस्या बन सकती है।
कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
आपका आज का दिन शुभ फलदायी रहेगा। व्यवसाय नौकरी में मनचाही उन्नति मिलने से दिन भर प्रसन्न रहेंगे। आज आपके विचारो से सभी प्रभावित रहेंगे। दलाली के व्यवसाय में निवेश से विशेष लाभ की सम्भवना है। आपके सभी कार्य सहजता से पूर्ण होंगे जिससे उत्साह बढ़ेगा। परिजनों के साथ किसी मांगलिक कार्यक्रम में सम्मिलित हो सकते है। संध्या का समय सगे-सम्बंधियों और मित्रों के साथ सुख में व्यतीत होगा। परन्तु लापरवाही अथवा व्यवहारिकता की कमी के कारण संबंदो में खटास आ सकती है।
सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
आपका आज के दिन का अधिकांश समय आराम से व्यतीत होगा। सामाजिक एवं धार्मिक कार्यो में योगदान देने से यश एवं सम्मान की प्राप्ति होगी। आप अपने पराक्रम से बिगड़े कार्यो को बना लेंगे प्रतिस्पर्धी नतमस्तक होंगे। धन लाभ संतोषजनक रहेगा।जायदाद एवं कानूनी कार्यो को जल्दबाजी में ना करे नुक्सान उठाना पड़ सकता है। गृहस्थ जीवन की जटिलताएं हल होंगी संतान की प्रगति से हर्ष होगा। महिला मित्रो से ज्यादा निकटता के कारण परेशानी हो सकती है।
कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
आपका आज का दिन सामान्य रहेगा फिर भी सेहत की अनदेखी करना भारी पड़ सकता है। पेट सम्बंधित समस्या बड़ा रूप ना ले इसका ध्यान रखे। कार्य क्षेत्र पर अधिकांश समय उबन में बीतेगा। पहले से व्यवस्था ना बनाने का नुकसान उठाना पड़ेगा। व्यवसाय में निवेश एवं जोखिम के कार्य हाथ में लेना हानिकर रहेगा। आलस्य के कारण कार्य करने में उत्साह नहीं होगा। कारोबारी कार्य से यात्रा के योग है। अल्प लाभ से संतोष करना पड़ेगा। पारिवारिक मामलो को ज्यादा महत्त्व नहीं देने पर मनमुटाव हो सकता है। सेहत का विशेष ध्यान रखें।
तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
आज का दिन आपके लिए आनंददायक रहेगा। आज प्रत्येक क्षेत्र में विरोधी परास्त होंगे। सामाजिक मान-सम्मान बढेगा। व्यापार विस्तार अथवा नए कार्य का आरंभ समय अनुकूल रहने पर भी आज ना करें। व्यावसायिक यात्रा लाभदायक रहेगी। किसी परिचित से लंबे समय बाद भेंट से हर्ष एवं लाभ होगा। स्त्री एवं संतान के ऊपर खर्च करेंगे दाम्पत्य का पूर्ण सुख मिलेगा। आडंबर के पीछे आवश्यकता से अधिक खर्च करेंगे जिसके कारण बाद में समस्या बन सकती है। दुर्व्यसनों के कारण परिवार का वातावरण ख़राब न हो इसका ध्यान रखें।
वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
आपका आज का दिन शुभ रहेगा। आज कार्य क्षेत्र पर अनुकूल वातावरण मिलने से उत्साह में वृद्धि होगी। सहकर्मियों एवं अधिकारियो का अपेक्षित व्यवहार मिलने से आशानुकूल लाभ अर्जित करेंगे। पुरानी देनदारी से परेशानी भी हो सकती है। विरोधीयो का षड्यंत्र असफल होगा। पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति पर अधिक खर्च करेंगे। स्त्री संतान का सहयोग मिलेगा। सुख के साधनों में वृद्धि करना आज आपकी प्राथमिकता रहेगी। सेहत में थोड़ा उतार चढ़ाव रहेगा फिर भी इसका दैनिक कार्यो पर असर नहीं पड़ेगा।
धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)
आपका आज का दिन सामान्यतः शुभ ही रहेगा। सेहत छोटी मोटी तकलीफों को छोड़ अनुकूल बनी रहेगी। अधिकारियो के आपके प्रति विश्वास एवं लक्ष्य के प्रति दृढ इच्छाशक्ति से कार्य करने पर मनचाही सफलता मिल सकती है। कार्य क्षेत्र पर सहयोगियों से किसी कारण मतभेद भी रहेंगे। किसी अप्रत्याशित सुख मिलने से परिवार में आनंद का वातावरण रहेगा। आवश्यक काम से यात्रा हो सकती है। अत्याधिक काम वासना के कारण सम्मान हानि की सम्भवना है। विदेश सम्बंधित मामलो में शुभ समाचार मिलेंगे।
मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)
आज के दिन क्रोध अथवा अहम् की भावना बने बनाये कार्यो पर पानी फेर सकती है इसलिए ख़ास कर व्यावसायिक एव सामाजिक क्षेत्र पर विवेक पूर्ण व्यवहार रखे। कार्यो में प्रारंभिक विलम्ब या असफलता से घबराए नही प्रयास जारी रखें सफलता अवश्य मिलेगी। आज स्त्री पक्ष से झगड़ा होने की संभावना है परन्तु काम के समय यही साथ देगी इस बात को ध्यान में रखकर चलें। दोपहर के बाद मेहनत का फल धन लाभ के रूप में मिल जाएगा। सन्तानो अथवा भाई बंधुओ से किसी भी प्रकार के सहयोग की उम्मीद बेकार है।
कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)
आज का दिन आपके अनुकूल बीतेगा। प्रातः काल से ही हर परिस्थिति पर आपकी पकड़ रहेगी। बड़ो के मार्गदर्शन से व्यवसाय एवं पैतृक सम्बंधित लगभग सभी समस्याओं का समाधान होने से आय के नविन स्त्रोत्र बनेंगे। सरकारी कार्य भी थोड़े परिश्रम के बाद बन जाएंगे। पुराने अटके धन की प्राप्ति होगी। सामाजिक व्यवहार बढ़ेगा। आकस्मिक छोटी यात्रा के योग है। दाम्पत्य जीवन में मधुरता बनी रहेगी। घरेलु वस्तु एवं संतानों के ऊपर खर्च करेंगे। धन की अपेक्षा आज संबंधो को महत्त्व दें।
मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
आज के दिन आपको प्रारब्ध अनुसार जितना मिले उसी में संतोष कर लेंगे। परन्तु फिर भी अंदरूनी तौर पर मन में कुछ ना कुछ कमी बनी रहेगी। कुंवारे जातको को योग्य जीवन साथी मिलने की सम्भवना रहेगी। परिजनों के साथ खरीददारी करेंगे। दैनिक रोजगार में आज अल्प लाभ से संतोष करना पड़ेगा। खर्च अधिक रहने से आर्थिक स्थिति प्रभावित होगी। सरकारी कार्य करने के लिए आज का दिन अनुकूल है। व्यसन एवं फिजूल खर्ची से बचें। किसी को मन की बात ना बताएं ना ही किसी के ज्यादा निकट रहें।

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