🙏🏻 हर हर महादेव🙏🏻
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
🌤️ *दिनांक – 17 सितम्बर 2025*
🌤️ *दिन – बुधवार*
🌤️ *विक्रम संवत 2082 (गुजरात-महाराष्ट्र अनुसार 2081)*
🌤️ *शक संवत -1947*
🌤️ *अयन – दक्षिणायन*
🌤️ *ऋतु – शरद ॠतु*
🌤️ *मास – आश्विन (गुजरात-महाराष्ट्र भाद्रपद)*
🌤️ *पक्ष – कृष्ण*
🌤️ *तिथि – एकादशी रात्रि 11:39 तक तत्पश्चात द्वादशी*
🌤️ *नक्षत्र – पुनर्वसु सुबह 06:26 तक तत्पश्चात पुष्य*
🌤️ *योग – परिघ रात्रि 10:55 तक तत्पश्चात शिव*
🌤️ *राहुकाल – दोपहर 12:33 से दोपहर 02:05 तक*
🌤️ *सूर्योदय – 06:27*
🌤️ *सूर्यास्त – 06:38*
👉 *दिशाशूल – उत्तर दिशा मे*
🚩 *व्रत पर्व विवरण – इन्द्रिरा एकादशी,एकादशी का श्राद्ध,विश्वकर्मा पूजा,षडशीति-कन्या संक्रांति (पुण्यकाल:सूर्योदय से दोपहर 12:21 तक)*
💥 *विशेष – *हर एकादशी को श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से घर में सुख शांति बनी रहती है l राम रामेति रामेति । रमे रामे मनोरमे ।। सहस्त्र नाम त तुल्यं । राम नाम वरानने ।।*
💥 *आज एकादशी के दिन इस मंत्र के पाठ से विष्णु सहस्रनाम के जप के समान पुण्य प्राप्त होता है l*
💥 *एकादशी के दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए।*
💥 *एकादशी को चावल व साबूदाना खाना वर्जित है | एकादशी को शिम्बी (सेम) ना खाएं अन्यथा पुत्र का नाश होता है।*
💥 *जो दोनों पक्षों की एकादशियों को आँवले के रस का प्रयोग कर स्नान करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं।*
🌞~*वैदिक पंचांग* ~🌞
🌷 *इंदिरा एकादशी* 🌷
➡️ *17 सितम्बर 2025 बुधवार को इंदिरा एकादशी है।*
🙏🏻 *इंदिरा एकादशी व्रत से बड़े – बड़े पापों का नाश हो जाता है | यह नीच योनियों में पड़े हुए पितरों को भी सद्गति देनेवाली है | इसका माहात्म्य पढ़ने-सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है | – पद्म पुराण*
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
🌷 *पुष्य नक्षत्र योग* 🌷
➡ *18 सितम्बर 2025 गुरुवार को सूर्योदय से सुबह 06:32 तक गुरुपुष्यामृत योग है ।*
🙏🏻 *१०८ मोती की माला लेकर जो गुरुमंत्र का जप करता है, श्रद्धापूर्वक तो २७ नक्षत्र के देवता उस पर खुश होते हैं और नक्षत्रों में मुख्य है पुष्य नक्षत्र, और पुष्य नक्षत्र के स्वामी हैं देवगुरु ब्रहस्पति | पुष्य नक्षत्र समृद्धि देनेवाला है, सम्पति बढ़ानेवाला है | उस दिन ब्रहस्पति का पूजन करना चाहिये | ब्रहस्पति को तो हमने देखा नहीं तो सद्गुरु को ही देखकर उनका पूजन करें और मन ही मन ये मंत्र बोले –*
*ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |…… ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |*
🙏🏻
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
🌷 *कैसे बदले दुर्भाग्य को सौभाग्य में* 🌷
🌳 *बरगद के पत्ते पर गुरुपुष्य या रविपुष्य योग में हल्दी से स्वस्तिक बनाकर घर में रखें |*
🙏🏻
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
🌷 *गुरुपुष्यामृत योग* 🌷
🙏🏻 *‘शिव पुराण’ में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है | पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्त और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं | ‘सर्वसिद्धिकर: पुष्य: |’ इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है | पुष्य नक्षत्र में किये गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है |*
🙏🏻 *इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं | (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)*
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞

।। भगवान एकदन्त श्रीगणेश की कथा ।।
जब जमदग्नि पुत्र ने इक्कीस बार पृथ्वी को अपने परशु (फरसा) मात्र से क्षत्रिय विहीन किया था, तभी भगवान् शंकर ने उनका नाम ‘परशुराम’ रख दिया था। उस समय उनके ऊपर देवता, मुनि, गन्धर्व, सिद्ध, किन्नर एवं देवियाँ आदि ने पुष्प वर्षा की।
हर्ष के कारण स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बजने लगीं और सर्वत्र हरिनाम का कीर्तन होने लगा। तदुपरान्त परशुराम कृत यज्ञों से यह समस्त धरतीतल पूर्ण रूप से तृप्त एवं सम्पन्न हो गयी।
तदन्तर परशुरामजी ने भगवान् आशुतोष एवं जगज्जननी पार्वती जी के दर्शन की इच्छा की और वे शीघ्र ही कैलास शिखर पर पहुँचे। उस समय स्वयं श्रीगणेश्वर द्वार पर विद्यमान थे।
परशुराम ने उनके पास जाकर कहा- हे भ्राता ! मैं इस समय परम प्रभु और मातेश्वरी उमा के दर्शन करना चाहता हूँ। मैंने वसुन्धरा को लीलापूर्वक ही क्षत्रिय-विहीन कर दिया है। उसमें कार्त्तवीर्य और सुचन्द्र जैसे महापराक्रमी और समर सिद्ध भूपाल मारे जा चुके हैं। यह सब कार्य शिव शिवा की कृपा से ही पूर्ण हुआ है। इसलिए भी उनके दर्शन करना बहुत आवश्यक है।
‘हे भ्राता ! हे गणेश्वर ! आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते ? देखो, मैंने उन्हीं परमपिता शिवजी से विविध विद्याओं को प्राप्त किया है तथा दुर्लभ शास्त्रों को अध्ययन करता हुआ उन्हीं के सान्निध्य में पारङ्गत हुआ हूँ। उन्हीं जगत् नाथ और अपने गुरुदेव भगवान् शंकर के दर्शनार्थ मैं अन्तःपुर में जाना चाहता हूँ। अतः आप मुझे वहाँ जाने की आज्ञा दीजिए।’
परशुराम जी की बात सुनकर गणेश्वर ने कहा- ‘आपको अभी यहीं ठहरना चाहिए। शीघ्रता में कभी कोई कार्य नहीं बनता। फिर नीति भी यही कहती है कि देवता, गुरु और राजा के सान्निध्य में जाने से पूर्व उनकी अनुमति अवश्य प्राप्त कर ले जब वे दर्शन देना स्वीकार कर लें, तभी वहाँ जायें।’
‘और, मुनिनाथ ! आप तो स्वयं नीतिज्ञ और धर्मज्ञ हैं, आपको तो अभी द्वार पर रुकना ही चाहिए। देखो, मेरे नीतियुक्त वचन सुनो, रहस्यस्थल में अपनी पत्नी के सहित विद्यमान हुए पुरुष के दर्शन कभी नहीं करने चाहिए। क्योंकि पत्नी के साथ एकान्त में स्थित व्यक्ति को देखना अत्यन्त पाप का भागी होना है। इस दोष के कारण कालसूत्र नामक नरक की प्राप्ति होती है।’
‘द्विज श्रेष्ठ ! यदि उस नरक में अल्पकाल ही रहना पड़े, तब भी, कुछ ठीक रहे, परन्तु वहाँ पहुँचने वाला पापी तो जब तक विश्व में सूर्य और चन्द्रमा की स्थिति रहती है, तब तक उसे उसी नरक में पड़ा रहना होता है। परन्तु यह फल उस स्थिति में और भी दृढ़ हो जाता है, जब वह अपने पिता, गुरु अथवा स्वामी आदि की ओर देखता है तब अधिक पतित हो उठता है। ऐसा पुरुष अपने सात जन्म पर्यन्त स्त्री से विच्छेद न करने के लिए बाध्य रहता है। यही तथ्य बहुचर्चित हो जाता है तो लोग उसे और पापी कहने लगते हैं।’
‘हे द्विज ! यह ऐसे पाप हैं, जिनके कारण प्राणी को चन्द्र सूर्य की स्थिति रहने तक नरक में निवास करना होता है विशेषकर जो अप गुरुजनों आदि के रहस्य स्थान में बिना आज्ञा जाता है, उसे वे पाप अधिक दुखदायी होते हैं।’
गणेश्वर के यह वचन सुनकर भृगुनन्दन को हँसी आ गयी और क्रोध दोनों हुए। वह कुछ गम्भीर एवं निष्ठुर वचन कहने लगे- ‘गणेश्वर ! तुम्हारे द्वारा तो आज मैं अत्यन्त अद्भुत और अपूर्व वचन सुन रहा हूँ। पाप की ऐसी परिभाषा तो मैंने कभी भी नहीं सुनी। हे भ्राता ! काम-विकार का दोष हो चाहे न हो, किन्तु शिशु का, शिशुतुल्य व्यक्ति जिसे कभी कोई विकार व्याप्त नहीं करता, उसे कभी कोई दोष नहीं लगता। फिर यदि कोई पाप होगा भी तो उससे मैं ही तो प्रभावित होऊँगा, आपका उससे क्या प्रयोजन हो सकता है ? इसलिए मुझे तुरन्त ही प्रभु के अन्तःपुर में जाने दो, रोको मत।’
गणेश्वर बोले- ‘मुनिनाथ ! जो पुरुष अज्ञानान्धकार से आच्छन्न होता है, उसे ज्ञानी पुरुषों से ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुआ करती। यद्यपि आपमें भी ज्ञानियों के लिए भी दुर्लभ विशिष्ट ज्ञान की सम्पन्नता है, तो मुझ मन्दमति वाले का भी निवेदन मानने की कृपा करो।’
‘हे मुनिनाथ ! निर्गुण एवं निर्लिप्त पुरुष में शक्तियों का अभाव रहता है, किन्तु जब उसे सृजन की इच्छा होती है तब वह स्वयं ही शक्ति में आश्रय लेकर सगुण हो जाता है। हे महामुने ! संसार में उत्पन्न समस्त देहधारी भोग के योग्य एवं प्राकृत तो केवल भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। उनके दर्शन भी तुरन्त ही नहीं हो जाते।’
उस समय गणेश जी ने परशुराम को रुकने के लिए कहते हुए अनेक युक्तियाँ प्रस्तुत कीं। परन्तु परशुराम जी तो भीतर जाने के लिए ऐसे उतावले हो रहे थे कि उनकी बात भी नहीं सुनना चाहते थे। इसलिए गणेश्वर की बात अनसुनी करके भीतर प्रविष्ट होने का प्रयत्न किया। यह देखकर गणेशजी ने उन्हें पुनः रोका।
परशुराम बोले- ‘अब तुम बिना कुछ बाधा डाले द्वार के मध्य से हट जाओ और मुझे जाने दो, अन्यथा परिणाम ठीक नहीं होगा। देखो, अभी तुम बालक हो, तुम्हें अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं है। तुम इससे भी अनजान हो कि मुझमें कितनी शक्ति है।’
गणेश बोले- ‘आप कैसे भी शक्तिशाली क्यों न हों, मैं आपको भीतर नहीं जाने दूँगा। जब तक मुझे माता-पिता का इस विषय में कोई आदेश नहीं मिलता, तब तक आपको यहीं रोके रखना मेरा कर्त्तव्य है। यदि यहाँ नहीं रुकना चाहते तो लौट जाओ, बाद में दर्शन करने आ जाना।’
परशुराम ने इसे अपना अपमान समझा, इसलिए गणेश्वर को धक्का देकर भीतर जाने लगे, तभी गणेश ने उन्हें पकड़कर पीछे की ओर धकेल दिया। इससे परशुराम अत्यन्त क्रोधित हो उठे और उन्होंने प्रहार करने के लिए परशु को सँभाला।
तभी वहाँ स्वामी कार्तिकेय आ गये। उन्होंने कहा- मुनिवर ! यह क्या कर रहे हो ? गणेश्वर तुम्हारे गुरु भगवान् शंकर का पुत्र है, इसलिए गुरु के ही समान है। यदि तुम इसका वध कर बैठते तो क्या शिव शिवा की प्रसन्नता प्राप्त कर सकोगे ?’
परशुराम ने फरसा हाथ से फेंक दिया और बोले- ‘मुझे वहाँ जाने से कोई नहीं रोक सकता। अरे मूढ़ बालक ! मैं अब तक तुझे गुरुपुत्र का सम्मान देता रहा हूँ, किन्तु एक तू है कि अपना हठ ही नहीं छोड़ना चाहता।’
गणेश बोले- ‘मुनिनाथ ! इस समय आप भीतर नहीं जा सकते। इस क्रोधावस्था में तो तुम्हें शिव शिवा के समक्ष जाने का अधिकार है भी नहीं। देखो, इस प्रकार वहाँ जाने से अनिष्ट की भी सम्भावना हो सकती है। मेरे विचार में तो तुम्हारा इस समय यहाँ से लौट जाना ही श्रेयस्कर है।
परन्तु परशुराम मानते ही न थे। उन्होंने क्रोधपूर्वक गजानन को धक्का देकर हटाया। उसके फलस्वरूप गजानन गिर पड़े और शीघ्र ही सँभलकर उठ बैठे। उन्होंने फिर भी अपने आपको क्रोध-रहित और शान्त बनाये रखा तथा परशुराम को पुनः रोककर कहा-
‘मुनिवर ! भलाई इसी में है कि तुम तुरन्त यहाँ से लौट जाओ। हे प्रभो ! बिना परमेश्वर शिव की आज्ञा के उनके अन्तःपुर में प्रवेश करने की आप में क्या शक्ति है ? आप मेरे पिता के शिष्य होने के सम्बन्ध में मेरे भाई होते हैं और इस समय अतिथि भी हैं, इसलिए आपकी यह हठधर्मी सहन कर रहा हूँ, अन्यथा-
नह्यहं कार्त्तवीर्यश्च भूपास्ते क्षुद्रजन्तवः।
अतो विप्र न जानासि मां च विश्वेश्वरात्मजम्।।
‘मैं कार्त्तवीर्य नहीं हूँ और न क्षुद्र जन्तु रूप राजाओं का समूह ही हूँ, जिन्हें आपने मार डाला था। हे विप्र ! क्या तुम नहीं जानते कि मैं विश्वेश्वर भगवान् शंकर का पुत्र हूँ ? हे विप्र ! अतिथि ! क्षणभर ठहरो और युद्ध से निवृत्त होओ, क्षणभर व्यतीत होने पर मैं तुम्हारे साथ उन परमपिता के समीप चलूँगा।’
गणेश्वर के वचन सुनकर परशुराम अट्टहास करने लगे और तब भगवान् शंकर का ध्यान करके पुनः अस्त्र प्रहार करने का विचार किया। तभी गणेश जी ने धर्म को साक्षी करके योग विधि के द्वारा अपनी सूँड़ को करोड़ों योजन लम्बी करके परशुराम को उसमें लपेट लिया और फिर उन्हें चारों ओर घुमाने लगे।’
अब परशुराम निरुपाय थे। उनका क्रोध न जाने कहाँ लुप्त हो गया ! योगिराज गणेश्वर की सूँड़ में लिपटकर चक्र के समान घूमते हुए परशुराम स्तम्भित और असहाय हो गये थे। उनकी समझ में न आया कि वह सब क्या और कैसे हो रहा है ?
अनन्त शक्ति निधान गणेश्वर ने परशुराम जी को सप्तद्वीप, सप्त पर्वत, सप्तसिन्धु तथा भूलोक, भुवर्लोक, जनलोक, तपोलोक, ध्रुवलोक, गौरीलोक और शम्भुलोक के दर्शन कराये और फिर गहन समुद्र में फेंक दिया, जहाँ वे प्राणरक्षार्थ जल में तैरने लगे।
यह देखकर गणेश्वर ने उन्हें पुनः अपनी सूँड़ में लपेटकर घुमाया और भगवान् विष्णु के बैकुण्ठ तथा भगवान् श्रीकृष्ण के गोलोकधाम के दर्शन कराये। वहाँ परशुराम ने रासेश्वरी श्रीराधा जी के साथ भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन किए।
इस प्रकार जामदग्नेय परशुराम जी गणेश्वर की सूँड़ में घूमते हुए अन्त में पृथ्वी के अङ्क में आ गिरे। उस समय उनको चेत हो गया तथा गणेश्वरकृत स्तम्भन से भी वे मुक्त हो गए।
तभी उन्होंने जगद्गुरु शंकर प्रदत्त भगवान् श्रीकृष्ण के देव दुर्लभ स्तोत्र और कवच का स्मरण किया तथा समस्त शक्ति से सम्पन्न होकर अपने परशु से उन्होंने समस्त विघ्ननाशक गणाधिराज पर प्रहार कर दिया। किन्तु गणराज ने अपने पूज्य पिताजी के अमोघ अस्त्र का सम्मान करने की दृष्टि से उसे अपने ही बाँये दाँत से पकड़ लिया जिसके फलस्वरूप उस तेजस्वी परशु ने गणेशजी का दाँत मूल-सहित काट दिया और वह परशु भृगुनन्दन के हाथ में पुनः जा पहुँचा।
गणेश्वर का दाँत टूटते ही अत्यन्त भयंकर शब्द हुआ। धरती, आकाश के साथ समस्त दिशाएँ काँप उठीं। पर्वत हिल गये और समुद्र में ज्वार आ गया। गणेश्वर के मुख से रक्त का फव्वारा छूट निकला | लोहित धार के साथ टूटा हुआ दाँत धरती पर आ गिरा।
उससे समूचे कैलास शिखर पर कोलाहल होने लगा। कार्तिकेय, वीरभद्र, भैरव, नन्दीश्वर एवं समस्त प्रमथगण ‘क्या हुआ ? क्या हुआ ? करते हुए दौड़ पड़े। शून्य में देवता अत्यन्त भयभीत हो रहे थे। भगवान् शंकर उस समय निद्रित अवस्था में थे। उस शब्द से उनकी निद्रा भंग हो गई।
गिरिराजनन्दिनी ने वह शब्द सुना तो तुरन्त दौड़ी आईं और द्वार लोहित देखकर क्षुब्ध होती हुई बोलीं- पुत्र ! यह क्या हुआ ? तेरे मुख से रक्त बह रहा है और धरा भी रक्तमयी हो रही है ?’ परन्तु गणेश्वर जी कुछ लज्जित-से, कुछ रुआँसे-से, मौन एवं शान्त सिर झुकाये खड़े रहे, उन्होंने माता को कुछ उत्तर न दिया।
तब पार्वती जी ने कुमार कार्तिकेय से पूछा- ‘पुत्र ! तुम्हीं बताओ, यह क्या हुआ ? इसका दाँत कैसे टूट गया ?’ कार्तिकेय वहाँ उपस्थित थे ही, उन्होंने सब कुछ स्वयं देखा ही था, इसलिए सब विवरण आद्योपान्त सुनाते हुए बोले- ‘क्षण भर में ही ऋषि ने परशु प्रहार कर दिया, अन्यथा मैं ऐसा कदापि न होने देता।’
इसी समय शिवजी भी वहाँ आ गये। पार्वती जी ने दुःखित मन से इनसे निवेदन किया- ‘स्वामिन् ! आप समदर्शी हैं, मेरे पुत्र गणेश्वर और आपके शिष्य परशुराम में से दोष किसका है, यह निर्णय आप स्वयं ही कर सकते हैं।
हे प्रभो ! श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न नारी तो अपने निन्दित, पतित, मूर्ख, दरिद्र, रोगी एवं जड़ पति को भी सदैव भगवान् के ही समान समझती है। पतिव्रता नारी के तेज की समानता तेजस्वियों में श्रेष्ठ अग्नि और भगवान् भास्कर भी नहीं कर सकते। इसलिए मेरे लिए भी आपके समान कोई नहीं है। तब आपके अतिरिक्त इसका निर्णय भी अन्य कौन कर सकता है ?’
उधर परशुराम ने भगवान् शंकर को देखा तो उनके चरणों में प्रण हो, भय रहित रूप से उनकी सेवा करने लगे। यह देखकर पार्वतीजी ने परशुराम से कहा- ‘महाभाग ! हे राम ! तुम महर्षि जमदग्नि के अंश से उत्पन्न परम सती देवी रेणुका के पुत्र तथा देवाधिदेव परमात्मा त्रिपुरारि के शिष्य हो। तुम्हारा मन शुद्ध है, इसलिए अशुद्धता का कोई कारण नहीं समझ रही हूँ। वत्स ! तुमने जगद्गुरु सर्वेश्वर से जो अमोघ परशु प्राप्त किया था उसकी प्रथम परीक्षा क्षत्रियों पर की और अब दूसरी परीक्षा गुरुपुत्र पर ही कर बैठे !’
‘पुत्र ! श्रुतियों का निर्देश है कि गुरु को गुरु दक्षिणा देनी चाहिए, किन्तु तुमने तो गुरुपुत्र का ही एक दाँत निर्दयतापूर्वक समूल काट डाला ! यदि यही अभीष्ट था तो फिर इसका मस्तक ही क्यों नहीं काट दिया ? चराचर विश्व के आत्मा रूप भगवान् शंकर का अमोघ अस्त्र पाकर तो एक शृगाल भी वनराज सिंह का वध करने में समर्थ हो जायेगा।”
‘देखो परशुराम ! गणेश साक्षात् श्रीकृष्ण का ही अंश है, वह जितेन्द्रिय पुरुषों में श्रेष्ठ होने के कारण तुम्हारे समान लाखों-करोड़ों जीवों का वध करने में समर्थ है। किन्तु वह हिंसा में विश्वास न करने के कारण कभी किसी पर हाथ नहीं उठाता। यही सभी देवताओं में प्रमुख होने के कारण ही प्रथम पूजा का अधिकारी बना है।’
परशुराम को निरुत्तर देखकर गिरिराजनन्दिनी को क्रोध आ गया और वे मुनिवर को मारने के लिए प्रस्तुत हुईं। यह देखकर भयभीत हुए परशुराम ने मन-ही-मन अपने गुरुदेव भगवान् शंकर को प्रणाम किया और फिर गोलोकनाथ भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करने लगे।
तभी भगवती पार्वतीजी ने अपने समक्ष करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले एक ब्राह्मण बालक को आता हुआ देखा। उसके परिधान, छत्र, दण्ड, यज्ञोपवीत आदि सभी उज्ज्वल थे। मस्तक पर भी चन्द्रमा की कान्ति के समान चमकता हुआ तिलक लगा था। कण्ठ में तुलसी की माला, माथे पर शुभ रत्नजटित मुकुट और कानों में कुण्डल सुशोभित थे। उसके अंगों पर रत्नाभरण थे तथा वह मन्द-मन्द मुसकाता हुआ माता पार्वती जी की ओर ही देख रहा था।
वह ब्राह्मण बालक अत्यन्त तेजस्वी था। उसके व्यक्तित्व में अद्भुत आकर्षण था। कैलासवासी आबालवृद्ध स्त्री पुरुष सभी उसकी ओर टकटकी लगाये, निर्निमेष नेत्रों से देख रहे थे। भगवान् शंकर ने उसे देखते ही मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। यह देखकर भगवती गिरिजा भी उसे प्रणाम किए बिना न रह सकीं। वस्तुतः वे साक्षात् श्रीहरि थे।
भगवान् शंकर ने उनके विराजमान होने को रत्नमय सिंहासन प्रस्तुत किया। उनके स्थित होने पर विविध उपचारों से पूजन एवं स्तवन किया।
उस पूजन से सन्तुष्ट हुए भगवान् श्रीहरि ने गम्भीर स्वर में कहना आरम्भ किया- ‘चन्द्रमौलि ! यहाँ की वर्तमान परिस्थिति के कारण मुझे यहाँ आना पड़ा है। मैं नहीं चाहता कि मेरे किसी भक्त का कहीं कुछ अमंगल हो और इसीलिए मेरा सहस्त्रार सुदर्शन उनकी रक्षा में सदैव उपस्थित रहता है।’
‘परन्तु यदि कोई गुरु की अवहेलना करे तो वह चाहे जो हो, मेरा कृपा पात्र नहीं रहता और उसके प्रतिकार के लिए मैं विवश हो जाता हूँ। गुरु विद्या और मन्त्र का देने वाला होने के कारण इष्टदेव से भी सौ गुना श्रेष्ठ है। इसी कारण गुरु से अधिक कोई देवता नहीं माना गया है। वैसे भी भगवान् शंकर महादेव हैं, इनसे बड़ा कोई देव नहीं और न गिरिराजनन्दिनी से बढ़कर कोई पतिव्रता ही है। गणेश्वर से अधिक कोई जितेन्द्रिय नहीं और परशुराम के समान कोई गुरु-भक्त शिष्य नहीं है। किन्तु, परशुराम द्वारा आज गुरुपुत्र की जो अवहेलना हुई है, उसका मार्जन करने के विचार से मुझे यहाँ आना पड़ा है।’
‘हे शिवे ! शिवप्रिये ! आप जगज्जननी हैं। गणेश्वर, कार्तिकेय और परशुराम भी आपके पुत्र के समान हैं। आपके और शिवजी के मन में परशुराम के प्रति कोई भेदभाव नहीं है इसलिए बालकों के इस विवाद में आप जो कुछ करेंगी, वह किसी भी प्रकार उपयुक्त नहीं होगा। इन बालकों के मध्य जो विवाद उठ खड़ा हुआ है, उसमें किसी का दोष नहीं है। दैव सर्वत्र ही बहुत प्रबल है और प्रस्तुत विवाद भी दैव-योग का ही प्रतिफल है। इसलिए दोष भी किसे दिया जाये ? यह भी एक प्रबल विवाद का ही विषय बन जायेगा।’
‘हिमगिरिनन्दिनि ! तुम्हारे पुत्र गणेश्वर तो वेदों में भी प्रसिद्ध हैं। इनके आठ नामों में एक नाम ‘एकदन्त’ तो बहुत ही प्रसिद्ध है। वे आठ नाम यह हैं-
गणेशमेकदन्तं च हेरम्बं विघ्ननाशकम्।
लम्बोदरं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं गुहाग्रजम्।।
‘गणेश, एकदन्त, हेरम्ब, विघ्ननाशक, लम्बोदर, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र और गुहाग्रज। ये नाम सर्वत्र मंगल को करने वाले और सर्वत्र संकटों का नाश करने वाले होते हैं।
गणेश जी के नामाष्टक स्तोत्र अपने अर्थों में संयुक्त एवं शुभ करने वाला होता है। जो भक्त इसका तीनों सन्ध्याओं में पाठ करता है वह सभी प्रकार से सुखी होता और सर्वत्र विजय प्राप्त करता है।’
‘उस स्तोत्र के पाठ से विघ्नों का नाश उसी प्रकार से हो जाता है, जैसे गरुड़ के द्वारा सर्पों का नाश होता है। हे दुर्गे ! इस स्तोत्र का परायण करने वाला गणेश्वर की कृपा महान् ज्ञानी और बुद्धिमान् हो जाता है। इसके प्रभाव से पुत्र की कामना वाले को पुत्र, पत्नी की अभिलाषा वाले को पत्नी और महामूर्ख को भी श्रेष्ठ विद्या की प्राप्ति होती है। वह निश्चय ही विद्वान् और श्रेष्ठ कवि हो जाता है।’
‘उन वामन भगवान् ने जगज्जननी उमा को वह नामाष्टक स्तोत्र इस प्रकार बतलाया-
ज्ञानार्थवाचको गश्च णश्च निर्वाणवाचकः।
तयोरीश परब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम्।।१।।
एकशब्द: प्रधानार्थो दन्तश्च बलवाचकः।
बलं प्रधानं सर्वस्मादेकन्दन्तं नमाम्यहम्।।२।।
दीनार्थवाचको हेश्च रम्बः पालकवाचकः।
दीनानां परिपालक हेरम्बं प्रणमाम्यहम्।।३।।
विपत्तिवाचको विघ्नो नायकः खण्डनार्थकः।
विपत्खण्डनकारकं नमामि विघ्ननायकम्।।४।।
विष्णुदत्तैश्च नैवेद्यैर्यस्य लम्बोदरं पुरा।
पित्रा दत्तैश्च विविधैर्वन्दे लम्बोदरं च तम्।।५।।
शूर्पाकारौ च यत्कर्णी विघ्नवारणकारणौ।
सम्पदौ ज्ञानरूपौ च शूर्पकर्णं नमाम्यहम्।।६।।
विष्णुप्रसादपुष्पं च यन्मूर्ध्नि मुनिदत्तकम्।
तद्गजेन्द्र वक्त्रयुक्तं गजवक्त्रं नमाम्यहम्।।७।।
गुहस्याग्रे च जातोऽयमाविर्भूतो हरालये।
वन्दे गुहाग्रजं देवं सर्वदेवाग्रपूजितम्।।८।।
अर्थात् ‘ग’ ज्ञानार्थवाचक और ‘ण’ निर्वाणवाचक है। इन दोनों (ग और ण) अक्षरों के जो ईश्वर हैं, उन गणेश्वर रूप परब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूँ।
‘एक’ शब्द प्रधानार्थक और ‘दन्त’ शब्द बल वाचक है। इस प्रकार जो ‘एकदन्त’ भगवान् सबसे अधिक बल प्रधान हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।
‘हे’ दीनार्थवाचक और ‘अम्ब’ शब्द पालक का। वाचक है। इस प्रकार दोनों का परिपालन करने वाले ‘हेरम्ब’ को मैं नमस्कार करता हूँ।
‘विघ्न’ शब्द विपत्ति वाचक और ‘नायक’ शब्द खण्डनार्थक है। अतः जो विपत्तियों के नाशक हैं, उन ‘विघ्ननायक’ को मैं नमस्कार करता हूँ।
प्राचीनकाल में भगवान् विष्णु द्वारा प्रदत्त नैवेद्यों और पिता द्वारा समर्पित विविध प्रकार के मिष्ठान्नों के सेवन से जिनका उदर लम्बा हो गया है, उन ‘लम्बोदर’ को नमस्कार है।
जिनके कान ‘शूर्प’ के समान हैं, तथा जो विघ्नों के निवारण में कारण, समस्त सम्पदाओं के दाता तथा ज्ञान स्वरूप हैं, उन ‘शूर्पकर्ण’ गणेशजी को नमस्कार करता हूँ।
जिनके मस्तक पर मुनिप्रदत्त भगवान् विष्णु का नैवेद्य रूप पुष्प विद्यमान है और जो गजेन्द्र के मुख से सम्पन्न हैं, उन भगवान् ‘गजवक्त्र’ को मैं नमस्कार करता हूँ।
गणेश के इस नामाष्टक स्तोत्र का उपदेश करने के पश्चात् भगवान् श्रीहरि ने परशुराम से कहा- ‘भृगुनन्दन ! तुमने गणेश्वर का एक दाँत तोड़कर अनुचित कार्य किया है, इसलिए तुम इस दोष से तब तक मुक्त नहीं हो सकते, जब तक जगज्जननी पार्वती जी को सन्तुष्ट न कर लो। यह गिरिराजनन्दिनी सर्व शक्ति स्वरूपिणी, प्रकृति से परे एवं निर्गुण हैं। इन्हीं की शक्ति से गोलोकनाथ श्रीकृष्ण भी शक्ति सम्पन्न हुए हैं। यह समस्त देवताओं की भी माता हैं, अतः स्तवन द्वारा उन्हें प्रसन्न करो।’
परशुराम ने भगवान् श्रीहरि की आज्ञा शिरोधार्य मानकर उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर भगवान् अपने धाम को जाने के लिए प्रस्तुत होते हुए अन्तर्धान हो गये। उसके पश्चात् परशुराम ने पवित्र जल में स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहिने और फिर जगन्माता पार्वती जी का स्तवन करने लगे। उन्होंने माता पार्वती के चरणों में अपना मस्तक रख दिया और नेत्रों से आनन्दाश्रु प्रवाहित करते करुण प्रार्थना के अन्त में सहसा बोल उठे-
रक्ष रक्ष जगन्मातः अपराधं क्षमस्व मे।
शिशूनामपराधेन कुतो माता हि कुष्यति।।
‘हे जगज्जननि ! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, मेरा अपराध क्षमा कर दीजिए माता। शिशुओं से जो अपराध हो जाता है उसपर माता कहीं क्रोध करती है ? अर्थात् नहीं करती।’
इस प्रकार स्तुति करने के पश्चात् रेणुकानन्दन ने गिरिराजनन्दिनी के चरण पकड़ लिये और बालक के समान फूट-फूटकर रोने लगे। यह देखकर माता पार्वतीजी से न रहा गया। उनका वात्सल्य भाव उमड़ आया।
वे बोलीं- ‘वत्स! तुम चिरजीवी होओ, तुम्हें अमरत्व की प्राप्ति हो। तुम्हें गुरुदेव परमात्मा शिव की कृपा से सुदृढ़ भक्ति प्राप्त हो तथा तुम सर्वत्र विजयी हो। सर्वात्मा भगवान् श्रीहरि तुमपर सदैव प्रसन्न रहें।’
माता पार्वती जी से आशीर्वाद प्राप्त होने पर भृगुनन्दन परशुराम जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसी समय उन्होंने सुना सभी दिशाएँ भगवन्नाम से व्याप्त हो रही हैं। सर्वत्र उन्हीं का जयघोष सुनाई दे रहा है। ममतामयी पार्वती जी परम सन्तुष्ट होकर अन्तःपुर में चली गईं।
अब परशुरामजी ने भगवान् एकदन्त गणेश्वर का विविध उपचारों से पूजन किया और फिर प्रीतिपूर्वक उनका स्तवन करने लगे। इस प्रकार गणराज की प्रसन्नता प्राप्त कर परमगुरु भगवान् शंकर को नमस्कार किया और उनसे आज्ञा लेकर तप करने के लिए तपोवन में चले गये।
🌞 *~ वैदिक पंचांग ~* 🌞
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जिनका आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं बधाई और शुभ आशीष
आपका जन्मदिन: 17 सितंबर
दिनांक 17 को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 8 होगा। आप अपने जीवन में जो कुछ भी करते हैं उसका एक मतलब होता है। आपके मन की थाह पाना मुश्किल है। आपको सफलता अत्यंत संघर्ष के बाद हासिल होती है। कई बार आपके कार्यों का श्रेय दूसरे ले जाते हैं। यह ग्रह सूर्यपुत्र शनि से संचालित होता है। इस दिन जन्मे व्यक्ति धीर गंभीर, परोपकारी, कर्मठ होते हैं। आपकी वाणी कठोर तथा स्वर उग्र है। आप भौतिकतावादी है। आप अदभुत शक्तियों के मालिक हैं।
आपके लिए खास
शुभ दिनांक : 8, 17, 26
शुभ अंक : 8, 17, 26, 35, 44
शुभ वर्ष : 2042
ईष्टदेव : हनुमानजी, शनि देवता
शुभ रंग : काला, गहरा नीला, जामुनी
आपकी जन्मतिथि के अनुसार भविष्यफल
करियर: शत्रु वर्ग प्रभावहीन होंगे, नौकरीपेशा व्यक्ति प्रगति पाएंगे। सभी कार्यों में सफलता मिलेगी। जो अभी तक बाधित रहे है वे भी सफल होंगे। बेरोजगार प्रयास करें, तो रोजगार पाने में सफल होंगे। राजनैतिक व्यक्ति भी समय का सदुपयोग कर लाभान्वित होंगे।
स्वास्थ्य: स्वास्थ्य की दृष्टि से समय अनुकूल ही रहेगा।
कारोबार: व्यापार-व्यवसाय की स्थिति उत्तम रहेगी।
मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
आज आप दिन के आरम्भ में अधूरे कार्यो को पूर्ण करने की जल्दी में रहेंगे यह आपके लिये हितकर ही रहेगा मध्यान के बाद परिस्थिति बदलने लगेगी अधिकांश कार्य किसी कमी के कारण अधूरे रह जायेंगे। आज आपकी किसी पूरानी गलती के सामने आने से परिवार का वातावरण बिगड़ेगा भाई-बंधु एवं स्त्री से कलह होने की संभावना है। बड़ो से भी डांट फटकार सुन्नी पड़ेगी अपनी गलती मान लेने से स्थिति गंभीर नही हो सकेगी। स्वभाव में आज व्यवहारिकता रखना अत्यंत आवश्यक है। सामजिक एवं धार्मिक कार्यो में अरुचि रहेगी। कार्य क्षेत्र पर आज सहकर्मी अथवा नौकरो की गतिविधि पर भी नजर रखें। संध्या के समय मानसिक दुविधा कम होगी।
वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
आपके लिये आज का दिन लाभ के अवसर लाएगा लेकिन आलस्य प्रमाद के कारण ये अवसर अन्य किसी के हाथ भी लग सकते है। दिन का आरंभ सुस्ती से होगा प्रत्येक कार्य धीमी गति से करेंगे। मध्यान के समय कार्यो को पूर्ण करने की जल्दी में कुछ उल्टा-सीधा हो सकता है फिर भी आज आप जोड़ तोड़ करने अपना काम निकाल ही लेंगे। नौकरी पेशा लोग अधिकारी वर्ग से अपनी बात मनवाने के लिए गुप्त युक्तियां लगाएंगे लेकिन इसमे सफलता निश्चित नही रहेगी। धन लाभ भी आपके परिश्रम की तुलना से अधिक हो सकता है परंतु इसके लिए कार्य क्षेत्र पर अनर्गल बातो को छोड़ लक्ष्य को केंद्रित रकह कार्य करें। स्त्रीवर्ग आज ज्यादा भावुक रहेंगी कोई इसका गलत फायदा भी उठा सकता है। आंख बंद कर किसी पर विश्वास ना करें।
मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)
आपके लिए आज का दिन परिश्रम साध्य रहेगा। घर मे किसी आयोजन को लेकर व्यस्तता बढ़ेगी व्यावसायिक कार्य भी होने पर अतिरिक्त भाग-दौड़ होगी। आर्थिक रूप से आज का दिन सामान्य ही रहेगा धन लाभ के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी फिर भी परिणाम आशाजनक नही रहेगा।आज आपके स्वभाव में थोड़ी उद्दंडता रहेगी एवं आपको भी अन्य लोगो से ऐसे ही व्यवहार का सामना करना पड़ेगा जिससे दिनचार्य खराब होगी। कार्य स्थल पर कोई भी काम मन के अनुसार नही होगा। नौकरी वाले जातक अधिकारी एवं सहकर्मियों के स्वभाव में अचानक परिवर्तन आने से परेशान होंगे। महिलाये अपना काम।किसी ओर के ऊपर छोड़कर पछताएगी।
कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
आपके लिये आज का दिन भी आनंद दायक रहेगा लेकिन फिजूल की बयानबाजी से आज बचना होगा मन मे अहम आने से अपने आगे किसी को नही गिनेंगे किसी के सम्मान को ठेस पहुचाने पर लंबे समय के लिए मतभेद हो सकते है। आर्थिक रूप से दिन उत्तम रहेगा जिस भी कार्य मे हाथ डालेंगे वहां से कुछ ना कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। परिवार की महिलाये एवं बुजुर्ग आज आपकी किसी बुरी आदत से दुखी होंगे कुछ समय के लिए स्थिति को संभालना मुश्किल होगा। संध्या के समय घरेलू खर्च के साथ ही मौज शौक पर खर्च होगा। सुखोपभोग आज आपकी प्राथमिकता रहेगी। महिलाये भी आज मानसिक रूप से प्रसन्न रहेंगी।
सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
दिन के पहले भाग में आप अपनी सोची हुई योजनाए पूर्ण कर सकते है अगर आलस्य या लापरवाही करी तो हाथ आये लाभ से वंचित भी हो सकते है। परिवार का वातावरण भी प्रातः काल मे शांत बना रहेगा मध्यान से परिस्थितियां प्रतिकूल होने लगेंगी आधे पूर्ण हो चुके कार्य किसी कारण से अधूरे रह जाएंगे एवं जिस भी कार्य को आरम्भ करने का मन बनाएंगे वही आगे हानि कराएगा। स्वयं का काम छोड़ अन्य लोगो के कार्य मे रुचि लेंगे। किसी के झगड़े में टांग ना अड़ाए मान हानि हो सकती है। आर्थिक को लेकर बेपरवाह ज्यादा रहेंगे। घर मे किसी सदस्य के मनमाने व्यवहार के कारण माहौल थोड़ा गरम हो सकता है। शारीरिक स्फूर्ति कम रहेगी।
कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
आज दिन का पूर्वार्ध लाभदायक रहेगा इसका समय रहते लाभ उठायें मध्यान से स्थिति विपरीत होने लगेंगी सेहत में अचानक गिरावट आने से महत्त्वपूर्ण कार्य अधूरे रह जायेंगे। व्यवसायी वर्ग भी दिन के आरम्भ में किसी कार्य के बनने से प्रसन्न रहेंगे परन्तु कुछ समय बाद प्रसन्नता उदासी में बदल जाएगी। जिस भी कार्य को करने का मन बनाएंगे उसमे स्वयं अथवा सहकर्मी की खराब सेहत बाधा डालेगी। आर्थिक लाभ के लिये आज इंतजार करना पड़ेगा संध्या के आस-पास होगी वह भी अनर्गल कार्यो में खर्च हो सकती है। महिलाये शारीरिक अकड़न अथवा नसों में विकार आने से असहज रहेंगी। यात्रा का मन बन रहा है तो फिलहाल स्थगित रखें।
तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
आज दिन के आरंभिक भाग में आपको किसी से शुभ समचार मिलेगा परिवार में मांगलिक कार्यक्रम की रूपरेखा बनाएंगे। कार्य व्यवसाय में आज सोची हुई योजनाये विलम्ब से पूर्ण होंगी जिससे किसी से किया वादा समय पर पूर्ण करने में असमर्थ रहेंगे। आर्थिक रूप से आज का दिन कम लाभ वाला रहेगा अधिकांश खर्च जमा रकम से ही निकालने पड़ेंगे फिर भी आज आप मानसिक रूप से निश्चिन्त रहेंगे। महिलाओ को स्वसन अथवा मूत्राशय सम्बन्धित समस्या हो सकती है। आज आपके व्यवहार से कुछ ऐसे संबंध बनेंगे जिनसे लंबे समय तक लाभ प्राप्त किया जा सकेगा। संध्या के समय मनपसंद भोजन वस्त्र एवं अन्य सुख मिलने से प्रसन्नचित रहेंगे।
वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
आपके लिये आज का दिन राहत भरा रहेगा। पिछले कुछ दिनों से चल रही मानसिक परेशानी में कमी आयेगी। धार्मिक गतिविधियों से जुड़ने का लाभ भी अवश्य मिलेगा। कार्य व्यवसाय के सिलसिले में मध्यान तक दौड़-धूप परिश्रम करना पड़ेगा इसके बाद ही लाभ की संभावनाएं बनेंगी। धन लाभ निश्चित ना होकर आकस्मिक ही होगा जिससे आगे की योजनाएं बनाने में परेशानी आएगी। नौकरी पेशा जातको को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा। परिवारक दायित्वों की पूर्ति करने में थोड़े असहज रह सकते है लेकिन ले देकर इससे भी पर पा लेंगे महिलाओ का स्वभाव आज चिड़चिड़ा रहेगा। स्वास्थ्य आज सामान्य बना रहेगा।
धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)
आज दिन के पूर्वार्ध में आप भविष्य को लेकर चिंतित रहेंगे मानसिक चंचलता सही निर्णय नही लेने देगी। कार्य व्यवसाय की स्थिति भी गंभीर रहेगी लाभ के अवसर हाथ आते आते निकल जायेंगे मन मे नकारात्मक भाव आएंगे। आज आपकी मानसिकता कम समय मे अधिक धन कमाने की रहेगी इसमें हानि-लाभ की परवाह नही करेंगे। मध्यान तक धैर्य धारण करें इसके बाद स्थिति में सुधार आने लगेगा। रुके कार्यो में गति आने के साथ ही नये लाभ के अनुबंध भी मिलेंगे। महिलाये आज किसी के ऊपर जली भुनी रहेंगी घर मे अशांति का कारण भी बन सकती है। बुजुर्गो से मतभेद का परिणाम हानिकर होगा। धन की आमद न्यून रहेगी।
मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)
आज का दिन आपके लिये शुभ रहेगा। पारिवारिक एवं सामाजिक मामलों में निष्पक्ष फैसले लेंगे जिससे आपकी छवि सम्मानजनक बनेगी। परिवार के सदस्यों के साथ ही रिश्तेदार भी महत्त्वपूर्ण कार्यो में आपकी राय लेंगे लेकिन आज किसी की जमानत लेने से बचें अन्यथा बैठे बिठाये सरदर्दी बढ़ेगी। कार्य व्यवसाय सुव्यवस्थित रूप से चलेगा धन लाभ आशा जनक होगा। महिलाओ को मनपसंद वस्तु की मिलेगी। आज आप स्वयं के कार्य के साथ ही परिचितों के कार्यो में भी सहयोग करेंगे। घर एवं बाहर के लोग आपकी प्रसंशा अवश्य करेंगे। सेहत मे थोड़ा उतार चढ़ाव लगा रहेगा फिर भी संतोष की अनुभूति होगी। सन्तान का सुख सहयोग मिलेगा।
कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)
आज के दिन आपको अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। आज आप शीघ्र ही अपने कार्यो में जुट जाएंगे मध्यान के बाद परिश्रम का फल धन लाभ के रूप में मिलने लगेगा संध्या तक आर्थिक स्थिति बेहतर हो जायेगी। पुराने उधार चुकता होने पर राहत मिलेगी। महिलाये आज महंगी वस्तुओं की खरीददारी का मन बनाएंगी लेकिन अंत समय मे कोई व्यवधान आ सकता है। पारिवारिक वातावरण में छुट-पुट छींटा कशी लगी रहेगी फिर भी स्थिति सामान्य बनी रहेगी। संतानो के ऊपर खर्च करने के बाद भी परिणाम आशानुकूल नही रहेंगे। घर के बुजुर्गो अथवा महिलाओ से वित्तीय लाभ की सम्भावना है।
मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
आज के दिन आप अपनी बुद्धि का सही जगह इस्तेमाल करेंगे विवेकी व्यवहार रहने से बिगड़े सम्बन्धो में सुधार आयेगा। आज आप धन से ज्यादा व्यवहार को महत्त्व देंगे इसके परिणाम स्वरूप परिजनों के साथ बाहर के लोगो का भी स्नेह मिलेगा। नौकरी वाले लोग काम के सिलसिले से यात्रा पर जायेंगे। व्यवसायी वर्ग आज व्यवसाय को नया रूप देने की योजना बनायेंगे लेकिन आज नए कार्य का आरंभ नही करें। कार्य क्षेत्र पर तीखी बहस होने की सम्भवना है। आर्थिक उलझने दिन के मध्यान तक परेशान करेंगी इसके बाद आकस्मिक लाभ होने से थोड़ी राहत मिलेगी। महिलाओ की फरमाइश पूरी ना होने पर अशांति फैलेगी। मनोरंजन के अवसर आज मुश्किल से ही मिलेंगे।

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