🙏🏻 हर हर महादेव🙏🏻
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌤️ *दिनांक – 10 सितम्बर 2025*
🌤️ *दिन – बुधवार*
🌤️ *विक्रम संवत – 2082 (गुजरात-महाराष्ट्र अनुसार 2081)*
🌤️ *शक संवत – 1947*
🌤️ *अयन – दक्षिणायन*
🌤️ *ऋतु – शरद ऋतु*
🌤️ *मास – आश्विन (गुजरात-महाराष्ट्र भाद्रपद)*
🌤️ *पक्ष – कृष्ण*
🌤️ *तिथि – तृतीया शाम 03:37 तक तत्पश्चात चतुर्थी*
🌤️ *नक्षत्र – रेवती शाम 04:03 तक तत्पश्चात अश्विनी*
🌤️ *योग – वृद्धि रात्रि 08:31 तक तत्पश्चात ध्रुव*
🌤️ *राहुकाल – दोपहर 12:35 से दोपहर 02:08 तक*
🌤️ *सूर्योदय – 06:25*
🌤️ *सूर्यास्त – 06:45*
👉 *दिशाशूल – उत्तर दिशा में*
🚩 *व्रत पर्व विवरण – तृतीया का श्राद्ध, चतुर्थी का श्राद्ध,संकष्ट चतुर्थी (चंद्रोदय रात्रि 08:19), पंचक (समाप्त: शाम 04:03)*
💥 *विशेष – तृतीया को पर्वल खाना शत्रुओं की वृद्धि करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
🌷🌷🌷 श्री पितृ कृपा स्तोत्रम् 🌷🌷🌷

🟨🟨🟨 हिन्दी अर्थ सहित 🟨🟨🟨🟨
*🌷 पितृ ध्यान स्तुति 🌷*
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श्वेतवर्णान् शुचिव्रतान् सोमसूर्याग्निलोचनान्।
हिरण्यपात्रहस्तांश्च पितॄन् ध्यायामि पूजितान्॥१
अर्थ –
श्वेतवर्णी, पवित्र व्रतधारी, चन्द्र–सूर्य–अग्नि जैसे नेत्रों वाले, स्वर्णपात्र धारण किए हुए पितरों का मैं ध्यान करता हूँ।
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स्वधासुगन्धिभोजनान् दिव्यवस्त्राभरण्वितान्।
गन्धप्रसूनमालाढ्यान् पितॄन् वन्दे सदाश्रयान्॥२
अर्थ –
स्वधा-सुगन्धित अन्न से तृप्त, दिव्य वस्त्र और आभूषण धारण किए हुए, पुष्पमालाओं से विभूषित पितरों को मैं वन्दन करता हूँ।
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ऋषिसङ्घैः समायुक्तान् लोकपालसमन्वितान्।
दीर्घायुषः प्रजानाथान् पितॄन् नित्यं स्मराम्यहम्॥३
अर्थ –
ऋषियों और लोकपालों के समान तेजस्वी, दीर्घायु और प्रजाओं के स्वामी पितरों को मैं नित्य स्मरण करता हूँ।
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आयुर्विद्यायशः श्रीं च प्रजां पौत्रसमृद्धिम्।
यच्छन्तु मे प्रसन्नाश्च पितरः पावनाः सदा॥४
अर्थ –
पवित्र पितर प्रसन्न होकर मुझे आयु, विद्या, यश, लक्ष्मी, संतान और पौत्रों की वृद्धि प्रदान करें।
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नमः कुलेश्वरेभ्यश्च सर्वलोकपितामहे।
भवतु मम सौभाग्यं प्रसादेनैव शाश्वतम्॥१
अर्थ:
मैं अपने कुल के स्वामी पितरों और समस्त लोकों के पितामहों को प्रणाम करता हूँ। उनके प्रसाद से मुझे शाश्वत सौभाग्य प्राप्त हो।
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दीप्तानलशरीरांश्च सोमपायामृतोद्यान्।
बर्हिषद्भिः समायुक्तान् पितॄन् ध्यायामि सर्वदा॥२
अर्थ:
जिनका तेज अग्नि के समान है, जो सोमरस और अमृत से तृप्त हैं, तथा जो बर्हिषद् पितरों के साथ विद्यमान हैं—उन पितरों का मैं नित्य ध्यान करता हूँ।
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गङ्गायमुनतीरेषु पुण्यतीर्थेषु संस्थितान्।
सदाभिषिक्तधर्माणः पितॄन् वन्दे सनातनान्॥३
अर्थ:
जो पवित्र गंगा-यमुना और अन्य पुण्य तीर्थों में स्थित होकर धर्म से अभिषिक्त हैं—ऐसे सनातन पितरों को मैं वंदन करता हूँ।
🍁 (सोमपितर)
सोमपाः सोमसंपूर्णा दिव्यपात्रनिवासिनः।
श्राद्धेषु यजमानानां तृप्तिदाः स्युः पितामहाः॥४
अर्थ:
जो सोमरस से परिपूर्ण हैं, दिव्य पात्रों में निवास करते हैं और श्राद्ध में आहुति से संतुष्ट होकर यजमान को तृप्ति प्रदान करते हैं—वे सोमपितर पितामह हमें आशीर्वाद दें।
🍁 (अग्निष्वात्ताःपितर)
अग्निष्वात्ता हुताशेषु दग्धदेहा महाव्रताः।
तपस्विनः पितॄन् नित्यं नमाम्यग्निसमानकान्॥५
अर्थ:
अग्नि में दग्ध देह वाले, महाव्रती, तपस्वी और अग्नि के समान तेजस्वी पितरों—अग्निष्वात्तों को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ।
🍁– (बर्हिषदाःपितर)
बर्हिषद्भिः समायुक्ता दर्भासनगताः सदा।
गृहस्थाश्रमनाथाश्च पितरः पावनाः शुभाः॥६
अर्थ:
जो पवित्र बर्हिष (दर्भा-आसन) पर विराजमान रहते हैं और गृहस्थाश्रम के रक्षक हैं—वे बर्हिषद् पितर पवित्र एवं मंगलकारी हैं।
🍁( सद्योजाताःपितर)
सद्योजाता नवानन्दाः नूतनप्रवराश्च ये।
वंशवृद्धिप्रदातारः पितरः सन्तु मे मुदा॥७
अर्थ:
जो नवनंदित, नूतन और श्रेष्ठ हैं तथा वंशवृद्धि के दाता हैं—ऐसे सद्योजात पितर मुझे प्रसन्नचित्त होकर आशीर्वाद दें।
🍁 – (वैन्याःपितर)
वैवस्वतान्वया नित्यं धर्मपथप्रवर्तकाः।
मनुवंशप्रसूता ये पितरः सन्तु मे गृहे॥८
अर्थ:
जो वैवस्वत मनु के वंशज हैं और धर्मपथ को प्रवर्तित करते हैं—वे मनुवंशी पितर मेरे घर में सदैव मंगलकारी हों।
🍁– (यम्या पितर)
यमराजानुगा नित्यं धर्मराजपुरःसराः।
सर्वपापप्रशमनाः पितरः सन्तु मङ्गलाः॥९
अर्थ:
जो यमराज के अनुचर हैं, धर्मराज के साथ रहते हैं और सारे पापों का नाश करने वाले हैं—वे पितर मेरे लिए मंगलकारी हों।
🍁( देवपितर–आर्यमा)
आर्यमा देवपितरः पितॄणां परमाधिपः।
लोकपालसमायुक्तः प्रसीदतु ममेप्सिते॥१०
अर्थ:
देवपितरों के अधिपति, आर्यमा देव, जो लोकपालों के साथ रहते हैं—वे मेरे सभी अभीष्ट कार्यों में कृपालु हों।
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नित्यं हव्यकव्यान्नैः प्रीणयन्तोऽतिथिं यथा।
तृप्तिमावह पितरः सर्वदा मे गृहे शुभम्॥११
अर्थ:
जो देवताओं को हव्य और पितरों को कव्य के रूप में अन्न देकर संतुष्ट करते हैं, जैसे अतिथि का सत्कार किया जाता है—वे पितर मेरे घर में सदा तृप्ति और शुभता लाएँ।
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आयुरारोग्यमिष्टं च धनधान्यसमृद्धयः।
यच्छन्तु मे प्रसन्नाश्च पितरः पावनाः सदा॥१२
अर्थ:
प्रसन्न पितर मुझे आयु, आरोग्य, प्रिय वस्तुएँ, धन और धान्य की समृद्धि सदा प्रदान करें।
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स्वधाकारप्रियां नित्यं पुत्रपौत्रसमन्विताः।
अनुगृह्णन्तु मे नित्यं पितरः पारदर्शिनः॥१३
अर्थ:
जो स्वधा-आहुति को प्रिय मानते हैं और सदैव पुत्र-पौत्रों से घिरे रहते हैं, वे सर्वज्ञ पितर मुझे नित्य कृपा प्रदान करें।
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ॐ नमः पितृदेवेभ्यः श्वेतवर्णाय तेजसे ।
धर्मात्मने महात्मने स्वधाकार्यप्रवर्तके ॥१४
अर्थ:
मैं उन पितृदेवों को नमस्कार करता हूँ जो श्वेतवर्ण, तेजस्वी, धर्मस्वरूप और स्वधा (पितरों को अर्पित आहुति) के आधार हैं, तथा समस्त कर्मों को प्रवृत्त कराने वाले हैं।
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येषां प्रसादात्सन्तोषं प्राप्नुवन्ति जनाः सदा ।
येषां कुपितभावेन दुःखानि बहुधा नराः ॥१५
अर्थ:
जिन पितरों की प्रसन्नता से मनुष्य को सदा सुख और संतोष प्राप्त होता है, और जिनके अप्रसन्न होने पर नर अनेक प्रकार के दुःखों में पड़ जाते हैं।
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ब्रह्मलोकस्थिताः श्रेष्ठा देवलोके च साधवः ।
सोमलोकनिवासिनश्च पितरस्ते नमोऽस्तु ते ॥१६
अर्थ:
जो श्रेष्ठ पितर ब्रह्मलोक में स्थित हैं, जो देवताओं के लोक में साधु रूप से विराजमान हैं, और जो सोमलोक में निवास करते हैं, उन पितरों को नमस्कार।
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अग्निष्वात्ताश्च बर्हिषदः सोमपाः सुमनस्विनः ।
हविर्भुजस्तथान्ये च नित्यं पितृगणाः स्मृताः ॥१७
अर्थ:
अग्निष्वात्त, बर्हिषद, सोमप, सुमनस्वी और हविर्भुज—ये सब नित्य स्मरणीय पितृगण हैं। ये ही पितृलोक के स्थायी अधिपति और पूजनीय माने जाते हैं।
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श्राद्धदानजपैः स्तुत्या हव्यकव्यप्रदायिनः ।
लोकत्रयहितार्थाय नित्यं तिष्ठन्ति पितरः ॥१८
अर्थ:
श्राद्ध, दान, जप और स्तुति के द्वारा जो प्रसन्न होकर हव्य (देवताओं के अर्पण) और कव्य (पितरों के अर्पण) का फल देते हैं, वे पितर सदा तीनों लोकों का कल्याण करते हुए विद्यमान रहते हैं।
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तेषां स्मरणमात्रेण पवित्रं जायते किल ।
अस्माकं रक्षणार्थाय पितरः सन्तु नित्यशः ॥१९
अर्थ:
उन पितरों का केवल स्मरण करने से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है। वे हमारे रक्षक बनकर हमें सदा आशीर्वाद प्रदान करें।
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नमो नमस्ते महायोगिनः स्वधाभुजः ।
लोकानां पतयः सर्वे पितरस्ते नमो नमः ॥२०
अर्थ:
हे महायोगी, स्वधा के भोगकर्ता, समस्त लोकों के अधिपति पितरों! आप सबको बार-बार प्रणाम है।
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ॐ नमो पितृदेवेभ्यः सर्वयज्ञस्वरूपिणे ।
आयुरारोग्यसंपत्तिं ददातु मम सर्वदा ॥ २१॥
अर्थः: हे पितृदेव! आप यज्ञस्वरूप हैं। कृपया मुझे सदैव आयु, आरोग्य और संपत्ति प्रदान करें।
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नमः स्वधायै देव्या च पितृभ्योऽपि नमो नमः ।
प्रसीदन्तु सदा नित्यं सर्वसौभाग्यदायिनः ॥ २२॥
अर्थः: स्वधा देवी और सभी पितृगणों को बारंबार नमस्कार। वे सदा कृपा करके सौभाग्य प्रदान करें।
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पितरः पितृणां नाथाः मातामहपितामहाः ।
भवन्तु मम मार्गेऽस्मिन् कृपालवदनाः सदा ॥ २३॥
अर्थः: पितामह, मातामह और प्रपितामह आदि पूर्वज जो पितृलोक के स्वामी हैं, वे मेरे मार्ग में सदा दयालु बने रहें।
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येषां प्रसादात् पश्यामि दिवं भूमिं च सर्वशः ।
ते पितरः कृपां कुर्वन् मम जीवनपावनाः ॥ २४॥
अर्थः: जिनकी कृपा से यह आकाश और पृथ्वी दिखाई देती हैं, वे पितर मेरी जीवन यात्रा को पावन करें।
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देवाः पितृपूजनेन तृप्ताः स्युः निरन्तरम् ।
तस्मात् पितृपूजनं हि सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २५॥
अर्थः: देवता भी पितृपूजन से तृप्त होते हैं, अतः पितृपूजन सभी पापों का नाशक है।
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पितरः प्रेतरूपाश्च दिव्यदेहसमन्विताः ।
आशीर्वचनदातारः पुत्रपौत्रप्रवर्धनाः ॥ २६॥
अर्थः: पितर, जो दिव्य शरीर से युक्त और प्रेतरूप हैं, आशीर्वाद देते हैं और पुत्र-पौत्रों की वृद्धि करते हैं।
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पितृलोकप्रभुः सोमो यत्र स्थायि मनोहरः ।
सन्तु तत्र मम पित्रः सुखदाः सर्वदा ध्रुवम् ॥ २७॥
अर्थः: जहाँ चंद्रमा पितृलोक का स्वामी है, वहाँ मेरे पितर सदा सुखद और स्थायी हों।
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अग्निष्वात्ता वसवो ये ये चान्ये दिवौकसः ।
ते पितरः कृपां कुर्वन् मम मार्गप्रदर्शकाः ॥ २८॥
अर्थः: अग्नि के स्वामी, वसु और अन्य दिव्य पितर मेरे मार्ग के दैविक मार्गदर्शक बनें।
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नमोऽस्तु मम पित्रेभ्यो मातामहपितामहेभ्यः ।
प्रपितामहपुज्येभ्यः नमः सर्वेभ्य एव च ॥ २९॥
अर्थः: मेरे पितर, मातामह, पितामह एवं प्रपितामह सभी को मेरा नमन।
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ये ज्ञाता येऽज्ञातकुलजा ये चान्ये बान्धवाः सदा ।
सर्वे सन्तु कृपालवो मम रक्षां करोत्तमाम् ॥ ३०॥
अर्थः: जो ज्ञात और अज्ञात कुलज तथा अन्य बंधु हैं, वे कृपालु होकर मेरी रक्षा करें।
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पितरः पूजिताः सन्तु स्वधाक्लिन्नजलेन च ।
तर्पिताः पिण्डदानैश्च ददतु मे मनःसुखम् ॥ ३१॥
अर्थः: जो पितर स्वधा जल और पिण्डदान से तृप्त होते हैं, वे मुझे मानसिक सुख दें।
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स्वधाकार्ये प्रसन्नाश्च यज्ञहोमसमर्पिताः ।
ते पितरः कृपां दत्वा रक्षयन्तु निशामहम् ॥ ३२॥
अर्थः: स्वधा के कर्मों में प्रसन्न होकर, यज्ञ-होम को समर्पित पितर मेरी रक्षा दिन-रात्रि करें।
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गङ्गायाम्यं सरस्वत्यां पुण्यतोये च सिन्धुषु ।
तर्पिताः पितरः सर्वे सन्तु मेऽभयदायिनः ॥ ३३॥
अर्थः: जो पितर गंगा, यमुना, सरस्वती आदि पवित्र नदियों में तर्पण से संतुष्ट होते हैं, वे मुझे अभय प्रदान करें।
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येषां प्रसादेन सदा परिवारः सुखमेधितः ।
ते पितरः कृपां कुर्वन् मोदन्तां मम सन्ततम् ॥ ३४॥
अर्थः: जिनकी कृपा से मेरा परिवार सदा सुखी रहता है, वे पितर मुझ पर कृपा करें और सदा प्रसन्न रहें।
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कुलधर्मप्रवर्तारः पितरः सन्तु शाश्वतः ।
मम कर्मसु सर्वेषु सहायाः शुभदायिनः ॥ ३५॥
अर्थः: जो कुलधर्म की प्रतिष्ठा करते हैं, वे मेरे सभी कर्मों में शुभ फल देने वाले सहायक हों।
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यज्ञदानतपोव्रतान् ये पित्रो नित्यमार्जिताः ।
तद्भागं मेऽपि संप्राप्य सुखिनः सन्तु सर्वदा ॥ ३६॥
अर्थः: जो पितर यज्ञ, दान, तप और व्रत से पुण्य कमा चुके हैं, उनका भाग मुझे भी मिले और वे सदैव सुखी रहें।
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ये वनं निर्जनं गत्वा तपश्चर्यां समास्थिताः ।
ते पितरः कृपां कुर्वन् मम जीवनरक्षकाः ॥ ३७॥
अर्थः: जो पितर वन में जाकर तपस्या करते हैं, वे मेरी रक्षा हेतु कृपा करें।
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श्राद्धतर्पणप्रीताश्च स्वधासिक्तजलेषु ये ।
ते पितरः प्रसीदन्तु ददतु मेऽभयप्रदम् ॥ ३८॥
अर्थः: जो पितर श्राद्ध और तर्पण से प्रसन्न होते हैं, वे मुझे निर्भयता प्रदान करें।
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मातामहपितामहाः प्रपितामहसञ्ज्ञकाः ।
ते सन्तु मम मार्गेषु शुभदृष्टिप्रदायकाः ॥ ३९॥
अर्थः: मातामह, पितामह और प्रपितामह मेरे जीवन मार्ग में शुभ दृष्टि प्रदान करें।
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अज्ञातकुलजा ये च सन्ति मे बान्धवाः सदा ।
ते पितरः कृपां कुर्वन् रक्षयन्तु निरन्तरम् ॥ ४०॥
अर्थः: जो अज्ञात कुलज और मेरे अन्य बंधु हैं, वे कृपा करके मेरी रक्षा निरंतर करें।
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पितरः सततं ध्येया ध्यानयोगसमन्विताः ।
भवन्तु मम रक्षायै सर्वकष्टप्रणाशनाः ॥ ४१॥
अर्थः: पितर ध्यानयोग से जुड़े रहें, मेरी रक्षा करें और सभी कष्टों का नाश करें।
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येषां प्रसादात् सन्तोषो गृहेषु नित्यमेव मे ।
ते पितरः कृपां कुर्वन् सन्तु मे सुखदायिनः ॥ ४२॥
अर्थः: जिनकी कृपा से मेरे घर में सदा संतोष रहता है, वे मुझे सुख प्रदान करें।
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श्राद्धमासे विशेषेण पूजिताः पिण्डतर्पणैः ।
ते पितरः प्रसन्नाश्च संजीवनमिव ददुः ॥ ४३॥
अर्थः: श्राद्ध मास में पिण्ड और तर्पण से पूजित पितर प्रसन्न होकर जीवन में ऊर्जा प्रदान करें।
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ये पित्रो मन्त्रविद्वांसः कर्मकाण्डविशारदाः ।
ते मम कुलरक्षायै स्थिरा आशिषमर्पयन् ॥ ४४॥
अर्थः: जो पितर मन्त्र और कर्मकाण्ड के ज्ञाता थे, वे मेरे कुल की रक्षा हेतु स्थिर आशीर्वाद दें।
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यज्ञाग्निसंनिधानेषु हुत्वा हव्यमनन्तकम् ।
पितरः पावनाः सन्तु धर्मपथप्रवर्तकाः ॥ ४५॥
अर्थः: जो पितर यज्ञाग्नि में अनंत हवन करते थे, वे धर्मपथ के प्रवर्तक पवित्र पितर हों।
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नमो नमः सदा तेषां पितृणां कृपया युतम् ।
ये ममाऽभ्युदयार्थाय ददति दिव्यमाशिषः ॥ ४६॥
अर्थः: मैं बारंबार उन पितरों को प्रणाम करता हूँ, जो मेरे अभ्युदय के लिए दिव्य आशीर्वाद देते हैं।
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कृपया पितरः सर्वे रोगशोकविनाशनाः ।
सदा मे दीर्घमायुष्यं सौख्यमारोग्यमर्पयन् ॥ ४७॥
अर्थः: कृपालु पितर मेरे रोग और शोक का नाश कर दीर्घायु, सौख्य और स्वास्थ्य दें।
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सर्वपापप्रशमनं पितृपूजनमेव च ।
तेन पितरः प्रसीदन्तु ददतु मे शुभं फलम् ॥ ४८॥
अर्थः: पितृपूजन से सारे पाप नष्ट होते हैं, इसलिए पितर प्रसन्न होकर मुझे शुभफल दें।
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नानायज्ञफलेनैव पितरः पूज्यते यतः ।
तस्मात् पितृकृपा नित्यं सर्वेषां प्राणिनां ध्रुवम् ॥ ४९॥
अर्थः: पितर विभिन्न यज्ञफलों से पूजित होते हैं, इसलिए उनकी कृपा सभी प्राणियों के लिए आवश्यक है।
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येषां कृपया सन्तोषो वंशे मेऽभिवर्धते ।
ते पितरः प्रसीदन्तु मोक्षदायिन एव च ॥ ५०॥
अर्थः: जिनकी कृपा से मेरा वंश बढ़ता है, वे पितर प्रसन्न होकर मोक्ष भी दें।
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ॐ पितृभ्यो नमस्तुभ्यं, सदा रक्षां प्रकल्पय ।
संतान-समृद्धिं दत्त्वा, वंशो मे स्थिरो भवेत् ॥ ५१॥
अर्थः: हे पितृदेव! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। कृपा करके मेरी रक्षा करें, संतान और वंश की स्थिरता दें।
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आरोग्यं मे प्रयच्छन्तु, दीर्घायुष्यं सुखं तथा ।
पितरः प्रीतिमन्तो मे, दुःखं नैव ददातु ते ॥ ५२॥
अर्थः: पितरों की कृपा से मुझे स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख मिले तथा दुःख न दें।
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गृहं मे सौख्यमायान्तु, धनधान्यसमन्वितम् ।
भोगमोक्षप्रदाता मे, पितरः सन्तु नित्यशः ॥ ५३॥
अर्थः: मेरा घर सुख-समृद्धि से पूर्ण हो, और पितर मुझे भोग एवं मोक्ष प्रदान करें।
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विधवा नास्ति मे कुत्र, न च सन्तानहीनता ।
नित्यं पितृकृपा-योगात्, वंशोऽयं पुष्यते ध्रुवम् ॥ ५४॥
अर्थः: पितृकृपा से मेरे घर में विधवा-दुःख और संतानहीनता न हो, वंश उन्नत और स्थिर हो।
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शत्रवो नाशमायान्तु, मित्राणि स्युर्निरन्तरम् ।
पितृशक्त्या मम स्थैर्यं, धर्मे सत्ये प्रतिष्ठितम् ॥ ५५॥
अर्थः: शत्रु नष्ट हों, मित्र बढ़ें, और पितृशक्ति से मैं धर्म और सत्य में दृढ़ रहूँ।
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पितृणां वचनं सत्यं, पितृणां शक्तिरप्रमेय ।
पितृपूजनतस्तेषां, सदा सौख्यं लभेत नः ॥ ५६॥
अर्थः: पितरों के वचन सत्य और उनकी शक्ति अत्यंत है; उनके पूजन से सदैव सुख प्राप्त होता है।
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क्लेशरहितं मम जीवितं, दुःखरहितं मम मनः ।
सन्ततं पितृसंरक्ष्यं, भवतु मे परं सुखम् ॥ ५७॥
अर्थः: मेरा जीवन और मन क्लेश और दुःख से रहित हों, निरंतर पितृ संरक्षण से मुझे परम सुख प्राप्त हो।
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विद्यां मे ददतु पितरः, बुद्धिं च शुद्धमानसम् ।
कर्मसु सिद्धिं सदा मे, पितृकृप्या प्रकाशयेत् ॥ ५८॥
अर्थः: पितर मुझे ज्ञान और निर्मल बुद्धि दें तथा कर्मों में सफलता प्रदान करें।
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भक्त्या स्मरामि पितरः, श्रद्धया तर्पयाम्यहम् ।
तुष्टास्ते मम सन्तोषं, दीयन्तामभिवाञ्छितम् ॥ ५९॥
अर्थः: मैं भक्ति से पितरों को स्मरण करता हूँ और श्रद्धा से तर्पण करता हूँ; वे प्रसन्न होकर मेरी इच्छाएँ पूर्ण करें।
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सर्वयज्ञमयी शक्तिः, सर्वदानप्रदा शुभा ।
पितृकृपा सदा मेऽस्तु, सर्वसिद्धिप्रदा भवेत् ॥ ६०॥
अर्थः: पितृकृपा यज्ञरूपी और दान देने वाली है; वह सदा मेरी सभी सिद्धियाँ पूर्ण करे।
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यत्र गच्छामि तत्रैव, पितृरक्षा मया सह ।
अपदः शममायान्तु, सिद्धयः सम्प्रदीयताम् ॥ ६१॥
अर्थः: जहाँ-जहाँ मैं जाऊं, पितृ सुरक्षा मेरे साथ हो; संकट दूर हों और सिद्धि मिले।
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कर्मक्लेशो न मे भूयात्, रोगदुःखं न विद्यते ।
पितृकृपामृतं पीत्वा, जीवनं मे सुखावहम् ॥ ६२॥
अर्थः: कर्मक्लेश न हो, रोग-पीड़ा न हो; पितृकृपामृत पीकर मेरा जीवन सुखमय हो।
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अनायासं सुखं ज्येष्ठ्यं, सौख्यं मे पुत्रपौत्रकम् ।
पितरः सम्प्रसन्नास्तु, वंशोऽयं विस्तारयेत् ॥ ६३॥
अर्थः: मुझे सरल सुख, संतान-पौत्र की सौख्य दें; पितर प्रसन्न होकर मेरा वंश बढ़ाएँ।
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सर्वसिद्धिप्रदा नित्यं, सर्वत्र जयदायिनी ।
पितृकृपा सदा मेऽस्तु, भवबन्धविनाशिनी ॥ ६४॥
अर्थः: पितृकृपा सदा सभी सिद्धियां दे, सर्वत्र विजय प्रदान करे और संसारबंध नष्ट करे।
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शरणं मे पितरः स्युः, प्रार्थनां शृणुतां कृपाम् ।
अस्माकं जीवनं नित्यं, धन्यं धर्म्यं च वर्धताम् ॥ ६५॥
अर्थः: पितर मेरी शरण हों, मेरी प्रार्थनाएँ सुनें और मेरा जीवन धन्य व धर्मयुक्त बढ़े।
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तर्पणं पितृपूजां च, यो नरः श्रद्धया
तस्य वंशः सदा पुष्येत्, सर्वैश्चैव मनोऽभिलषितम् ॥ ६६॥
अर्थः: जो श्रद्धा से पितृपूजन और तर्पण करता है, उसकी कुल वृद्धि हो और सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हों।
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पिण्डदानं महापुण्यं, श्राद्धकर्म सदा शुभम् ।
पितृपूजासमं नास्ति, न च तर्पणसमं फलम् ॥ ६७॥
अर्थः: पिण्डदान और श्राद्ध सर्वोच्च पुण्य के कर्म हैं; पितृपूजन और तर्पण के समकक्ष कोई फल नहीं।
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यत्र श्राद्धं कृतं भक्त्या, यत्र तर्पणमर्पितम् ।
तत्रैव पितरो हृष्टाः, वदन्ति पुत्र संततिम् ॥ ६८॥
अर्थः: जहाँ श्रद्धाभाव से श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, वहाँ पितर प्रसन्न होकर पुत्र और वंश की वृद्धि की वाणी देते हैं।
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अन्नं जलं फलैः पूज्यं, दत्तं स्वधाभिधानतः ।
पितरः प्रीतिमायान्ति, पावयन्ति कुलं ध्रुवम् ॥ ६९॥
अर्थः: अन्न, जल एवं फल ‘स्वधा’ नाम से अर्पित करने पर पितर प्रसन्न होकर कुल को पवित्र बनाते हैं।
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तस्मात् श्रद्धां समालम्ब्य, तर्पयेत् पितृगणकान् ।
तेषां प्रसादतो नित्यं, सुखं सौभाग्यमृच्छति ॥ ७०॥
अर्थः: अतः श्रद्धा के साथ पितृगणों को तर्पण करना चाहिए; उनके प्रसाद से सदा सुख और सौभाग्य प्राप्त होता है।
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पितृभ्यो मे कृपां दृष्ट्वा, सर्वसुखान् समाप्नुयात् ।
सन्तानसमृद्धिं दत्त्वा, जीवनं मे यशस्विनम् ॥ ७१॥
अर्थः: पितरों की कृपा देखकर मुझे सभी सुख प्राप्त हों; संतानसमृद्धि देते हुए मेरा जीवन यशस्वी हो।
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पुण्यमाययाद्येनैव, पितृष्वपि वंशजा क्रिया ।
धर्मसंस्थापनार्थं च, सर्वदा मम भवेत् ॥ ७२॥
अर्थः: पितरों के वंशज धर्म की स्थापना के लिए पुण्य कर्म करें; मेरा जीवन सदैव शुभ हो।
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प्रजापतिविधिप्रमुखं, यज्ञदाननिर्वृतिप्रियम् ।
मम पितरि सदा भूयात्, कृपया पूज्यान्निवेशितम् ॥ ७३॥
अर्थः: जो पितर यज्ञ, दान और प्रजापति के विधान में निपुण हैं, वे सदा कृपा पूर्वक पूज्य और पूजित रहें।
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सर्वपापप्रशमनं च, पितृकृपा साधकं वयम् ।
पूजापूर्वकं प्रति तेषां, स्मरतः फलमाप्नुयात् ॥ ७४॥
अर्थः: पितृकृपा पाप नाशक है; हम जो श्रद्धा और भक्ति से पितरों का पूजन करें, वे फल-प्रदायक हों।
🍁यं पठेत् स्तोत्रमेतत् तु, श्रद्धया भक्तिसंयुतः ।
स पितृकृपया नित्यं, सर्वसौख्यमवाप्नुयात् ॥ ७५॥
अर्थः: जो श्रद्धा और भक्ति से इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह सदा पितृकृपा से सभी सुख प्राप्त करे।
🍁
इति स्तुत्वा पितॄन् भक्त्या श्रद्धया परया नरः।
प्रीणयत्यचिरात्सर्वान् कुलपितामहान्बुधः॥७६।।
अर्थ:
जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से पितरों की इस प्रकार स्तुति करता है, वह शीघ्र ही सभी कुलपितामहों को संतुष्ट कर देता है।
🍁
धनं धान्यं च सौभाग्यं, पुत्रपौत्रसमन्वितम् ।
प्राप्नोति सततं भक्त्या, पितृकृपास्तुतिं जपन् ॥ ७७॥
अर्थः: इस स्तोत्र की भक्ति से धन, धान्य, सौभाग्य और संतान-पौत्र की प्राप्ति होती है।
🍁
पितृणां सन्ततं प्रीतिर्भवति स्तोत्रपाठतः ।
तस्मात् सम्पूज्य पितरः, सर्वदा रक्षिता नृणाम् ॥ ७८॥
अर्थः: इस स्तोत्र के पाठ से पितर प्रसन्न होते हैं और सदा वंशजों की रक्षा करते हैं।
🍁
इदं पितृकृपा-स्तोत्रं, सर्वपापप्रणाशनम् ।
पठन् भक्त्या लभेत् नित्यं, पितृलोकान् सदा शुभान् ॥ ७९॥
*अर्थः: यह पितृकृपा स्तोत्र सभी पापों का नाश करता है; जो भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं उन्हें शुभ पितृलोक प्राप्त होता है।*
*इति शुभम्।*
*यशवीरशास्त्रीविरचितं श्रीपितृकृपास्तोत्रं संपूर्णम्॥*
🕉️~*वैदिक पंचांग* ~🕉️
🌷 *विघ्नों और मुसीबते दूर करने के लिए* 🌷
👉 *10 सितम्बर 2025 बुधवार को संकष्ट चतुर्थी (चन्द्रोदय रात्रि 08:19)*
🙏🏻 *शिव पुराण में आता हैं कि हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी ( पूनम के बाद की ) के दिन सुबह में गणपतिजी का पूजन करें और रात को चन्द्रमा में गणपतिजी की भावना करके अर्घ्य दें और ये मंत्र बोलें :*
🌷 *ॐ गं गणपते नमः ।*
🌷 *ॐ सोमाय नमः ।*
🙏🏻
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌷 *श्राद्ध विशेष* 🌷
🌞 *पूर्वजों को पितर पक्ष में इस मंत्र के द्वारा सूर्य भगवान को अर्ध्य देने से यमराज प्रसन्न होकर पूर्वजों को अच्छी जगह भेज देते हैं ।*
🌷 *ॐ धर्मराजाय नमः ।*
🌷 *ॐ महाकालाय नमः ।*
🌷 *ॐ म्रर्त्युमा नमः ।*
🌷 *ॐ दानवैन्द्र नमः ।*
🌷 *ॐ अनन्ताय नमः ।*
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌷 *पितृ पक्ष* 🌷
🙏🏻 *धर्म ग्रंथों के अनुसार, विधि-विधान पूर्वक श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। वर्तमान समय में देखा जाए तो विधिपूर्वक श्राद्ध कर्म करने में धन की आवश्यकता होती है। पैसा न होने पर विधिपूर्वक श्राद्ध नहीं किया जा सकता। ऐसे में पितृ दोष होने से कई प्रकार की समस्याएं जीवन में बनी रहती हैं। पुराणों के अनुसार, ऐसी स्थिति में पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर कुछ साधारण उपाय करने से भी पितर तृप्त हो जाते हैं।*
➡ *न कर पाएं श्राद्ध तो करें इनमें से कोई 1 उपाय, नहीं होगा पितृ दोष*
🙏🏻 *जिस स्थान पर आप पीने का पानी रखते हैं, वहां रोज शाम को शुद्ध घी का दीपक लगाएं। इससे पितरों की कृपा आप पर हमेशा बनी रहेगी। इस बात का ध्यान रखें कि वहां जूठे बर्तन कभी न रखें।*
🙏🏻 *सर्व पितृ अमावस्या के दिन चावल के आटे के 5 पिंड बनाएं व इसे लाल कपड़े में लपेटकर नदी में बहा दें।*
🙏🏻 *गाय के गोबर से बने कंडे को जलाकर उस पर गूगल के साथ घी, जौ, तिल व चावल मिलाकर घर में धूप करें।*
🙏🏻 *विष्णु भगवान के किसी मंदिर में सफेद तिल के साथ कुछ दक्षिणा (रुपए) भी दान करें।*
🙏🏻 *कच्चे दूध, जौ, तिल व चावल मिलाकर नदी में बहा दें। ये उपाय सूर्योदय के समय करें तो अच्छा रहेगा।*
🙏🏻 *श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन कराएं या सामग्री जिसमें आटा, फल, गुड़, सब्जी और दक्षिणा दान करें।*
🙏🏻 *श्राद्ध नहीं कर सकते तो किसी नदी में काले तिल डालकर तर्पण करें। इससे भी पितृ दोष में कमी आती है।*
🙏🏻 *श्राद्ध पक्ष में किसी विद्वान ब्राह्मण को एक मुट्ठी काले तिल दान करने से पितृ प्रसन्न हो जाते हैं।*
🙏🏻 *श्राद्ध पक्ष में पितरों को याद कर गाय को हरा चारा खिला दें। इससे भी पितृ प्रसन्न व तृप्त हो जाते हैं।*
🙏🏻 *सूर्यदेव को अर्ध्य देकर प्रार्थना करें कि आप मेरे पितरों को श्राद्धयुक्त प्रणाम पहुँचाए और उन्हें तृप्त करें।*
🕉️ ~ *वैदिक पंचांग* ~ 🕉️


*🌹क्या गया में श्राद्ध के बाद भी करते हैं तर्पण, जानिए विद्वानों की राय🌹*
*⭕धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध पक्ष में हर हिंदू धर्मावलंबी को अपने पितरों का श्राद्ध करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं और वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। मान्यता है कि गयाजी में श्राद्ध के बाद पितर देवलोक गमन कर जाते हैं। इससे श्राद्ध और तर्पण पर कई तरह की बातें प्रचलित हो गईं हैं, जैसे कई लोगों का कहना है कि गया में श्राद्ध के बाद तर्पण की जरूरत नहीं होती तो आइये जानते हैं इस पर क्या कहते हैं अधिकांश पुरोहित…*
धर्म ग्रंथों के अनुसार हर साल पितृ पक्ष में हिंदुओं को पितृ पक्ष में श्राद्ध जरूर करना चाहिए। लेकिन इस मान्यता के कारण कि गया में श्राद्ध करने के बाद पितर देवलोक प्रस्थान कर जाते हैं। कुछ विद्वान गया श्राद्ध को अंतिम श्राद्ध मानते हुए आगे श्राद्ध न करने का परामर्श देते हैं तो वहीं कुछ विद्वान ब्रह्मकपाली को अंतिम श्राद्ध मानते हैं।
कुछ पुरोहितों के अनुसार गया श्राद्ध के बाद बदरीका क्षेत्र के ‘ब्रह्मकपाली’ में श्राद्ध करना चाहिए। उनका मानना है कि ब्रह्मकपाली अंतिम श्राद्ध है। यह ब्रह्मकपाली वही स्थान है जहां शिवजी के त्रिशूल के प्रहार से ब्रह्माजी का कटा सिर गिरा था। उनका कहना है कि गया श्राद्ध करने के बाद केवल पितरों के निमित्त ‘धूप’ छोड़ना बंद करना चाहिए। गया के बाद ब्रह्मकपाली में श्राद्ध करना चाहिए।
इसी के साथ ब्रह्मकपाली में श्राद्ध करने के बाद तर्पण और ब्राह्मण भोजन की बाध्यता समाप्त हो जाती है। हालांकि शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है कि गया और ब्रह्मकपाली में श्राद्ध करने के बाद भी अपने पितरों के निमित्त तर्पण और ब्राह्मण भोजन अथवा आमान्न (सीधा) दान करना श्रेष्ठ है।
*⚜️गया के बाद भी हर साल करना चाहिए श्राद्ध*
वाराणसी के पुरोहित पं. शिवम तिवारी के अनुसार श्राद्ध, श्रद्धा से पितरों के लिए किया गया कर्म है। गया में श्राद्ध के बाद पितरों को देवलोक में एक स्थान प्राप्त हो जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके लिए किया जाने वाला कर्म बंद कर देना चाहिए। जैसे हम हर देवता के लिए पूजा पाठ करते रहते हैं, वैसे ही पितरों के लिए श्राद्ध पक्ष में पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन जरूर कराना चाहिए और अच्छे कर्म करने की कोई सीमा नहीं होती।
*⚜️इसका रखें ख्याल*
कई ज्योतिषाचार्यों की मानें तो गया में श्राद्ध के बाद पूर्वजों से दूर होने से नुकसान उठाना पड़ता है। गया में श्राद्ध करने के बाद भी घर में वार्षिक तथा पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध करना चाहिए। इस दौरान न खरीदारी करें और नहीं निषिद्ध व्यवहार करें।
*⚜️गया और ब्रह्मकपाली श्राद्ध के बाद भी यह करें*
पंडितों का कहना है कि गया और ब्रह्मकपाली श्राद्ध के बाद भी पितृ पक्ष के दौरान सेवा कार्य करना चाहिए, जरूरतमन्दों की सहायता दान-धर्म की और रुझान रखना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन गाय, कुत्ते, कगवास (पक्षी) अतिथि और भिक्षुक को भोजन कराएं।
🙏🚩🙏
🔔 श्रीरामचरितमानस 🔔
॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
सप्तम सोपान : उत्तरकांड
उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप।
ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप॥47॥
भावार्थ:- (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! अयोध्या में रहने वाले पुरुष और स्त्री सभी कृतार्थस्वरूप हैं, जहाँ स्वयं सच्चिदानंदघन ब्रह्म श्री रघुनाथजी राजा हैं॥47॥
👉 श्री राम-वशिष्ठ संवाद, श्री रामजी का भाइयों सहित अमराई में जाना :–
एक बार बसिष्ट मुनि आए।
जहाँ राम सुखधाम सुहाए॥
अति आदर रघुनायक कीन्हा।
पद पखारि पादोदक लीन्हा॥1॥
भावार्थ:- एक बार मुनि वशिष्ठजी वहाँ आए जहाँ सुंदर सुख के धाम श्री रामजी थे। श्री रघुनाथजी ने उनका बहुत ही आदर-सत्कार किया और उनके चरण धोकर चरणामृत लिया॥1॥
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी।
कृपासिंधु बिनती कछु मोरी॥
देखि देखि आचरन तुम्हारा।
होत मोह मम हृदयँ अपारा॥2॥
भावार्थ:- मुनि ने हाथ जोड़कर कहा- हे कृपासागर श्री रामजी! मेरी कुछ विनती सुनिए! आपके आचरणों (मनुष्योचित चरित्रों) को देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह (भ्रम) होता है॥2॥
महिमा अमिति बेद नहिं जाना।
मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना॥
उपरोहित्य कर्म अति मंदा।
बेद पुरान सुमृति कर निंदा॥3॥
भावार्थ:- हे भगवन्! आपकी महिमा की सीमा नहीं है, उसे वेद भी नहीं जानते। फिर मैं किस प्रकार कह सकता हूँ? पुरोहिती का कर्म (पेशा) बहुत ही नीचा है। वेद, पुराण और स्मृति सभी इसकी निंदा करते हैं॥3॥
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही।
कहा लाभ आगें सुत तोही॥
परमातमा ब्रह्म नर रूपा।
होइहि रघुकुल भूषन भूपा॥4॥
भावार्थ:- जब मैं उसे (सूर्यवंश की पुरोहिती का काम) नहीं लेता था, तब ब्रह्माजी ने मुझे कहा था- हे पुत्र! इससे तुमको आगे चलकर बहुत लाभ होगा। स्वयं ब्रह्म परमात्मा मनुष्य रूप धारण कर रघुकुल के भूषण राजा होंगे॥4॥
तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।
जा कुहँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन॥48॥
भावार्थ:- तब मैंने हृदय में विचार किया कि जिसके लिए योग, यज्ञ, व्रत और दान किए जाते हैं उसे मैं इसी कर्म से पा जाऊँगा, तब तो इसके समान दूसरा कोई धर्म ही नहीं है॥48॥
जप तप नियम जोग निज धर्मा।
श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा॥
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन।
जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥1॥
भावार्थ:- जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने (वर्णाश्रम के) धर्म, श्रुतियों से उत्पन्न (वेदविहित) बहुत से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इंद्रियनिग्रह), तीर्थस्नान आदि जहाँ तक वेद और संतजनों ने धर्म कहे हैं (उनके करने का)-॥1॥
आगम निगम पुरान अनेका।
पढ़े सुने कर फल प्रभु एका॥
तव पद पंकज प्रीति निरंतर।
सब साधन कर यह फल सुंदर॥2॥
भावार्थ:- (तथा) हे प्रभो! अनेक तंत्र, वेद और पुराणों के पढ़ने और सुनने का सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनों का भी यही एक सुंदर फल है कि आपके चरणकमलों में सदा-सर्वदा प्रेम हो॥2॥
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ।
घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ॥
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥3॥
भावार्थ:- मैल से धोने से क्या मैल छूटता है? जल के मथने से क्या कोई घी पा सकता है? (उसी प्रकार) हे रघुनाथजी! प्रेमभक्ति रूपी (निर्मल) जल के बिना अंतःकरण का मल कभी नहीं जाता॥3॥
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित।
सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित॥
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई।
जाकें पद सरोज रति होई॥4॥
भावार्थ:- वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पंडित है, वही गुणों का घर और अखंड विज्ञानवान् है, वही चतुर और सब सुलक्षणों से युक्त है, जिसका आपके चरण कमलों में प्रेम है॥4॥
नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु।
जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु॥49॥
भावार्थ:- जहे नाथ! हे श्री रामजी! मैं आपसे एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिए। प्रभु (आप) के चरणकमलों में मेरा प्रेम जन्म-जन्मांतर में भी कभी न घटे॥49॥
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए।
कृपासिंधु के मन अति भाए॥
हनूमान भरतादिक भ्राता।
संग लिए सेवक सुखदाता॥1॥
भावार्थ:- ऐसा कहकर मुनि वशिष्ठजी घर आए। वे कृपासागर श्री रामजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। तदनन्तर सेवकों को सुख देने वाले श्री रामजी ने हनुमान्जी तथा भरतजी आदि भाइयों को साथ लिया,॥1॥
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए।
गज रथ तुरग मगावत भए॥
देखि कृपा करि सकल सराहे।
दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे॥2॥
भावार्थ:- और फिर कृपालु श्री रामजी नगर के बाहर गए और वहाँ उन्होंने हाथी, रथ और घोड़े मँगवाए। उन्हें देखकर कृपा करके प्रभु ने सबकी सराहना की और उनको जिस-जिसने चाहा, उस-उसको उचित जानकर दिया॥2॥
क्रमश:–
सीताराम सीताराम 🙏
नमः पार्वतीपतये हर हर महादेव 🚩
🙏🚩🙏
🙏🏻🌷🌻🌹🍀🌺🌸🍁💐🌹🌷🙏🏻
जिनका आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं बधाई और शुभ आशीष
दिनांक 10 को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 1 होगा। आप राजसी प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। आपको अपने ऊपर किसी का शासन पसंद नहीं है। आप साहसी और जिज्ञासु हैं। आपका मूलांक सूर्य ग्रह के द्वारा संचालित होता है।
आप सौन्दर्यप्रेमी हैं। आपमें सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला आपका आत्मविश्वास है। इसकी वजह से आप सहज ही महफिलों में छा जाते हैं। आप अत्यंत महत्वाकांक्षी हैं। आपकी मानसिक शक्ति प्रबल है। आपको समझ पाना बेहद मुश्किल है। आप आशावादी होने के कारण हर स्थिति का सामना करने में सक्षम होते हैं।
आपके लिए खास
शुभ दिनांक : 1, 10, 20, 28
शुभ अंक : 1, 10, 20, 28, 37, 46, 55, 64, 73, 82
शुभ वर्ष : 2026, 2044, 2053, 2062
ईष्टदेव : सूर्य उपासना तथा मां गायत्री
शुभ रंग : लाल, केसरिया, क्रीम,
आपकी जन्मतिथि के अनुसार भविष्यफल
स्वास्थ्य की दृष्टि से यह वर्ष उत्तम रहेगा। पारिवारिक मामलों में महत्वपूर्ण कार्य होंगे। अविवाहितों के लिए सुखद स्थिति बन रही है। विवाह के योग बनेंगे। नौकरीपेशा के लिए समय उत्तम हैं। पदोन्नति के योग हैं। बेरोजगारों के लिए भी खुशखबर है इस वर्ष आपकी मनोकामना पूरी होगी। यह वर्ष आपके लिए अत्यंत सुखद रहेगा। अधूरे कार्यों में सफलता मिलेगी।
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मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
आज के दिन भी सुख शांति की कमी रहेगी। आज आप जिस भी कार्य को करेंगे उसमे भाग दौड़ अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक करनी पड़ेगी। सेहत में उतारचढ़ाव बना रहेगा। स्नायु तंत्र कमजोर रहने से विविध समस्या उपजेगी। काम धंधा आज लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक करायेगा। धन को लेकर मन विचलित रहेगा। आज आप अपने जीवनी की समीक्षा भी करेंगे जिससे मन हीनभावना से ग्रस्त रहेगा। व्यावसायिक अथवा अन्य पारिवारिक-धार्मिक कारणों से यात्रा के योग बनेंगे अगर संभव हो तो यात्रा आज ना ही करें वाहन से चोटादि का भय है। सेहत अचानक खराब हो सकती है। चक्कर-वमन अथवा अन्य पेट मस्तिष्क संबंधित समस्या खड़ी होगी।
वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
आज के दिन आप लापरवाह अधिक रहेंगे फिर भी लाभ आज किसी ना किसी रूप में अवश्य हो जाएगा। कार्य व्यवसाय में अव्यवस्था सुधारने में मध्यान तक व्यस्त रहेंगे सहकर्मीयो की मनमानी व्यवहार के कारण क्रोध आएगा फिर भी स्थिति बिगड़ने नही देंगे। आर्थिक रूप से दिन शुभ रहेगा परन्तु हाथ खुला होने से ज्यादा देर टिकेगा नही। उधारी के व्यवहार ज्यादा ना बढ़ाएं अन्यथा उलझने बढ़ेंगी। सामाजिक व्यवहार दिखावा मात्र ही रहेंगे। परिवार में सुख शान्ति की अनुभूति होगी लेकिन महिला वर्ग का स्वभाव अचानक बदल सकता है सतर्क रहें। घर मे शान्ती बनाये रखने के लिए परिजनों की आवश्यकता पूर्ति करनी पड़ेगी।
मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)
आज आपका ध्यान मनोरंजन पर अधिक रहेगा आज आपकी मानसिकता भी कम परिश्रम से अधिक लाभ पाने की रहेगी।इसके कारण कार्यो पर उचित ध्यान नही दे पाएंगे परन्तु फिर भी आकस्मिक लाभ के योग बन रहे है। दौड़ धूप अधिक रहने से शारीरिक शिथिलता बनेगी। मध्यान के बाद किसी अभीष्ट सिद्धि के योग बन रहे है आलस्य ना करें अन्यथा लाभ से वंचित रह सकते है। प्रियजनों के साथ आनंद के क्षण बिताने का समय मिलेगा। घर मे स्थिति सामान्य रहेगी। आज आर्थिक मामलों के प्रति बेपरवाह भी रहेंगे। आवश्यक कार्य संध्या से पहले करले इसके बाद विविध हानि के योग बनने लगेंगे।
कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
आज का दिन आपके लिए सुख-समृद्धि दायक रहेगा। आज आप जिस भी कार्य को करने का मन बनाएंगे आरम्भ में लाभ-हानि को लेकर भ्रम पैदा होगा परन्तु शीघ्र ही स्थिति स्पष्ट होने लगेगी। आज लाभ कमाने के लिए आपको जोखिम लेना ही पड़ेगा इसका परिणाम आपके पक्ष में ही रहेगा। व्यावसायिक क्षेत्र से जुड़ी महिलाओ को पदोन्नति के साथ प्रोत्साहन के रूप में आर्थिक सहायता भी मिल सकती है। सामाजिक कार्यो में रुचि ना होने पर भी सम्मिलित होना पड़ेगा मान-सम्मान बढेगा। परिजनों का मार्गदर्शन आज प्रत्येक क्षेत्र पर काम आएगा। प्रेम प्रसंगों में निकटता रहेगी।
सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
आज अधूरे कार्यो को पूर्ण करने का दिन है अगर आज आलस्य किया तो बाद में पछताना पड़ेगा। सभी प्रकार के कागजी अथवा सरकारी कार्य अधिकारी वर्ग की मेहरबानी से निर्विघ्न पूर्ण होंगे। कार्य व्यवसाय से भी आशानुकूल लाभ मिल सकेगा। आज आपका मन लंबी यात्रा की योजना बनाएगा शीघ्र ही इसके फलीभूत होने की सम्भवना है। चल- अचल संपत्ति से लाभ होगा। प्रतिस्पर्धी आज आपके आगे ज्यादा देर नही टिक पाएंगे। हृदय में आज कोमलता अधिक रहेगी परोपकार के लिए प्रेरित होंगे। महिलाओ का जिद्दी स्वभाव कुछ समय के लिये घर पर अशांति कर सकता है। फिर भी पिछले कुछ दिनों की तुलना में आज शान्ति अनुभव करेंगे।
कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
आज का दिन भी आपके लिए शुभफलदायी रहेगा। पूरानी रुकी योजना आज सिरे चढ़ने से राहत मिलेगी। कार्य क्षेत्र पर आज प्रतिस्पर्धा कम रहने से इसका लाभ उठायेंगे आज का दिन आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करेगा। व्यापार विस्तार की योजना सफल रहेगी। नौकरी पेशा जातक अधिकारी वर्ग से आसानी से काम निकाल सकेंगे। सामाजिक क्षेत्र हो या पारिवारिक अथवा अन्य सभी जगह आपकी जय होगी। अपरिचित भी आपसे संपर्क बनाने को उत्सुक रहेंगे। महिलाओं का स्वभाव अधिक नखरे वाला रहेगा इस वजह से हास्य की पात्र भी बनेंगी।
तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
आज भी परिस्थितियां आपकी आशाओ के अनुकूल रहेंगी। लेकिन आज आपका सनकी स्वभाव कुछ ना कुछ हानि भी करायेगा। धन संबंधित कार्य आपकी व्यवहार शून्यता के कारण उलझेंगे परन्तु शीघ्र ही किसी के सहयोग मिलने से सुलझ जाएंगे। कार्य व्यवसाय से प्रारंभिक परिश्रम के बाद दोपहर के समय से धन की आमद शुरू हो जाएगी जो संध्या तक रुक रुक कर चलती रहेगी। मितव्ययी रहने के कारण खर्च भी हिसाब से करेंगे। महिलाये किसी मनोकामना पूर्ति से उत्साहित होंगी। महिला वर्ग से कोई भी काम निकालना आसान रहेगा मना नही कर सकेंगी। दाम्पत्य सुख में भी वृद्धि होगी। पर्यटन की योजना बनेगी।
वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
आज के दिन आपकी वैचारिक स्थिति प्रखर रहेगी सार्वजनिक कार्यो में सम्मानित होंगे आपकी छवि भी बुद्धिमानो जैसी बनेगी। परन्तु आर्थिक रूप से इसका लाभ नही ले पाएंगे। कार्य व्यवसाय मंदा रहने से उदासीनता आएगी। आज आपका मन भी एक जगह केंद्रित नही रहेगा। धैर्य से कार्य करते रहें संध्या तक संतोषजक लाभ अवश्य मिलेगा पारिवार में भी आपके विचारो की प्रशंसा होगी लेकिन केवल व्यवहार मात्र के लिए ही। आर्थिक विषयो को लेकर किसी से विवाद ना करें धन डूबने की आशंका है। गृहस्थ में प्रेम स्नेह तो मिलेगा परन्तु स्वार्थ सिद्धि की भावना भी अधिक रहेगी। महिलाये अधिक बोलने की समस्या से ग्रस्त रहेंगी।
धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)
आज का दिन आपको धैर्य से बिताने की सलाह है। आज आप निरंतर मिल रही असफलता अथवा कलह-क्लेश के वातावरण से क्षुब्ध होकर अनुचित कदम उठा सकते है जिसका स्वयं एवं पारिवारिक प्रतिष्ठा पर गलत प्रभाव पड़ेगा। परिजनों की असंतोषी प्रवृति के कारण घरेलू वातावरण आज लगभग अशांत ही रहेगा। कार्य क्षेत्र पर सहकर्मी अथवा अन्य लोगो के आश्रित रहना पड़ेगा फिर भी जरूरत के अनुसार लाभ अवश्य हो जायेगा। किसी भी महत्त्वपूर्ण निर्णय को लेने से पहले एक बार लाभ हानि की समीक्षा अवश्य करें।महिलाये आज व्यवहार संयमित रखें मान हानि की संभावना है। आडम्बर के ऊपर खर्च होगा।
मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)
आज के दिन आपको धन लाभ के योग बन रहे है लेकिन आज आपके बनते कार्यो में टांग अड़ाने वालो का भी सामना करना पड़ेगा। व्यवसायी वर्ग आज निवेश का जोखिम ले सकते है अवश्य लाभ होगा। शेयर सट्टे आदि कार्यो में धन दुगुना होकर मिलेगा। परिवार में सुख के साधनों की वृद्धि होगी इसपर खर्च भी अधिक रहेगा। आध्यत्म अथवा साधना क्षेत्र से जुड़े जातको को साधना में सिद्धि की दिव्य अनुभूति होगी। नौकरी पेशा लोगो का आज काम के समय भी मन इधर उधर ज्यादा भटकेगा। मन में चल रही कामना अतिशीघ्र पूर्ण होने के योग है। ध्यान रहे आज किसी भी कार्य में आलस्य किया तो दोबारा अवसर नही मिल सकेगा।
कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)
आज आपका संतोषी स्वभाव आपको बेवजह की उलझनों से दूर रखेगा फिर भी आज किसी के दबाव में आकर आपको कोई अप्रिय कार्य करना पड़ेगा मन में इसका पश्चाताप भी रहेगा। आमदनी आज स्थिर रहेगी संचित कोष से खर्च चलाने पड़ेंगे। मित्र परिचितों के साथ संध्या के समय मौज शौक पूरे करेंगे परन्तु रंग में भंग पड़ने वाली स्थिति बन सकती है सतर्क रहें। विपरीत लिंगीय वर्ग से आकर्षण बढेगा। प्रेम प्रसंगों में नजदिकी आएगी। संताने जिद पर अड़ेंगी जिससे घर मे अशांति फैलेगी। असंयमित दिनचार्य के कारण स्वास्थ्य प्रतिकूल होने की संभावना है। बुजुर्गो की चिंता रहेगी।
मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
आज का दिन आपको मिला जुला फल देगा। मन आज मनोरंजन की ओर अधिक आकर्षित रहेगा इसपर फिजूल खर्ची करने से पीछे नही हटेंगे। कार्य व्यवसाय से आर्थिक लाभ पाने के लिये ज्यादा परिश्रम करना पड़ेगा। स्वास्थ्य में कमी रहेगी कमजोरी अथवा पेट संबंधित व्याधि परेशान करेगी। घर एवं व्यवसाय में तालमेल बैठाने के कारण दुविधा में रहेंगे। एक कार्य को करने के चक्कर मे अन्य आयवश्यक कार्य अधूरे रहेंगे। सरकारी अथवा किसी भी प्रकार के जमीन-जायदाद संबंधित कार्य मे उलझने पड़ेंगी यथा संभव आज टालें। आध्यात्मिक गतिविधियों में भाग लेने से थोड़ी मानसिक शांति मिलेगी। धन के व्यवहारों में जबरदस्ती ना करें।

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